कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

ग्रीनपीस ब्रिटेन का सदस्य भारत से निर्वासित..

0
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

नई दिल्ली,  पर्यावरण के लिये काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस के उपर सरकार द्वारा एक बार फिर से दबाव बनाने की कोशिश की गई है. ग्रीनपीस के ब्रिटिश कर्मचारी को भारत सरकार ने देश में घुसने से मना कर दिया है.greenpeace_20140614.jpg

इस हफ्ते स्थानीय ग्रीनपीस ऑफिस में एक बैठक के लिये भारत आए ब्रिटेन के नागरिक बेन हर्गरिव्स को दिल्ली एयरपोर्ट पर ही आव्रजन अधिकारियों ने रोक दिया और उनसे कहा गया कि वो भारत में प्रवेश नहीं कर सकते जबकि इससे पहले वो बिना किसी समस्या के भारत में यात्रा करते रहे हैं.

हर्गरिव्स के पास वैध व्यापार वीजा होने के बावजूद वापस लंदन भेज दिया गया और उन्हें निर्वासन के बारे में कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया.
ग्रीनपीस ब्रिटेन के कार्यकारी निदेशक जॉन सोवेन ने ब्रिटेन के विदेश सचिव को पत्र लिखकर भारतीय विदेश मंत्रालय से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगने का आग्रह किया है. उन्होंने ग्रीनपीस इंडिया की यात्रा पर आये अन्य ब्रिटिश नागरिकों से भारतीय एयरपोर्ट पर की गई पूछताछ और उनकी गिरफ्तारी के संबंध में चिंता जाहिर की.
बेन हर्गरिव्स का निर्वासन उसी श्रृंखला का हिस्सा है जिसके तहत भारतीय सरकार लगातार पर्यावरण समूह के कार्य में बाधा डालने का प्रयास कर रही है. कुछ दिन पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को अवरुद्ध किये अंतरराष्ट्रीय चंदे को ग्रीनपीस के खाते में डालने का आदेश दिया था. इस फंड को बिना किसी स्पष्टीकरण और गलत कार्यों के सबूते के बिना ही अवरुद्ध कर दिया गया था.

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए जॉन सोवेन ने कहा, “हमलोग यह समझने में असमर्थ हैं कि बेन को क्यों नहीं भारत में प्रवेश करने दिया गया जबकि उसके पास सभी उपयुक्त परमिट मौजूद था. यह पहली बार नहीं है कि हमारे कर्मचारियों को भारत में प्रवेश करते हुए अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ा है. यह अस्वीकार्य है. हमलोगों ने ब्रिटिश सरकार को लिखकर इस मुद्दे को दिल्ली के अधिकारियों के सामने उठाने की मांग की है. ग्रीनपीस का संचालन दुनिया के 30 देशों में होता है. हम वैश्विक सीविल सोसाइटी का वैध हिस्सा हैं. यह परेशान करने वाला है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मनमाने तरीके से काम करें.”

ग्रीनपीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक समित आईच ने कहा, “यह सरकार द्वारा ग्रीनपीस और उसके कर्मचारियों पर अपनाये जा रहे व्यवस्थित कठोर नीति का एक और उदाहरण है, लेकिन इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई से हम डरने वाले नहीं हैं. हमें अपनी विरासत और अहिंसा के मूल्यों पर गर्व है. हमें डराने की किसी भी कोशिश से हमारा पर्यावरण को बचाने का संकल्प टूट नहीं सकता और हम ऐसे कार्रवाई पर उच्च अधिकारियों से सवाल पूछने में पीछे नहीं रहेंगे.”

हाल के वर्षों में ग्रीनपीस ने मध्यप्रदेश के महान वन क्षेत्र में सामुदायिक अधिकारों और प्रचानी जंगलों को बचाने के लिये अभियान शुरू किया है, जहां ब्रिटेन में पंजीकृत कंपनी एस्सार के प्रस्तावित खदान से लोगों की जीविका और जैवविविधता पर खतरा मंडरा रहा है.

पिछले महीने उच्चतम न्यायालय ने कथित रुप से कोल आवंटन घोटाले के दौरान 1993 से 2010 तक के बीच हुए सभी कोल ब्लॉक आवंटन को अवैध घोषित कर दिया है, जिसमें महान भी शामिल है.

Facebook Comments
Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
Share.

About Author

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

%d bloggers like this: