/सुप्रीम कोर्ट ने किया महान कोल ब्लॉक का आवंटन रद्द, महान के ग्रामीणों में खुशी की लहर..

सुप्रीम कोर्ट ने किया महान कोल ब्लॉक का आवंटन रद्द, महान के ग्रामीणों में खुशी की लहर..

सिंगरौली, आज कोयला घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आए फैसले से सालों के संघर्ष के बाद, महान वन क्षेत्र के लोगों ने राहत की सांस ली. कोयला घोटाले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महान कोल ब्लॉक सहित 214 कोल ब्लॉक के आवंटन को रद्द कर दिया है. महान वन क्षेत्र में प्रस्तावित कोयला खदान के आसपास बसे ग्रामीण लगातार एस्सार और हिंडाल्को को प्रस्तावित कोयला खदान का विरोध कर रहे थे. प्रस्तावित खदान से उनकी महान जंगल पर निर्भर जीविका खतरे में आ गयी थी.mahan coal block

महान संघर्ष समिति के सदस्य व अमिलिया गांव के निवासी कृपानाथ यादव ने इस फैसले पर खुशी जताते हुए कहा, “हमलोगों ने कई तरह की धमकियां, अवैध गिरफ्तारी और छापेमारी को झेला लेकिन अंत में माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने हमारे साथ हुए अन्याय के खिलाफ न्याय किया है”.

ग्रीनपीस ने विश्वास जताया कि न्यायालय के फैसले से नयी सरकार द्वारा आर्थिक विकास के इंजन के रुप में कोयला शक्ति पर जरुरत से ज्यादा निर्भरता कम होगी. अवैध रुप से एस्सार व हिंडाल्को को आवंटित महान जंगल को उच्चतम न्यायालय के फैसले से राहत मिली है.

ग्रीनपीस की जलवायु और ऊर्जा कैंपेनर विनुता गोपाल ने कहा, “यह ऐतिहासिक फैसला है जो भारत में सस्ते कोयले के युग के अंत का संकेत है. यह एक भ्रष्टाचार विरोधी और आर्थिक विकास के एजेंडे पर सत्ता में आई मोदी सरकार के लिए जागने का समय है. आज के फैसले ने कोयले के गंदे रहस्य पर से पर्दा हटाते हुए यह संकेत दिया है कि राज्य और कंपनियों के बीच मिलीभगत का अंत होना चाहिए. अब सरकार के पास बुनियादी रुप से दो ही पसंद है या तो वो लोगों के पक्ष में, ग्रीन आर्थिक मॉडल को विकसित करे या फिर एक भ्रष्ट, महंगा और गंदे ऊर्जा स्रोत के साथ रहना चाहे”.

महान वन क्षेत्र में प्रस्तावित कोयला खदान से करीब पाँच लाख पेड़ और हजारों लोगों के उपर विस्थापित होने का खतरा मंडरा रहा था. इस खदान के खिलाफ ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति लंबे अरसे से आंदोलन कर रही थी.
विनुता गोपाल ने कहा, “महान देश के सबसे प्राचीन साल जंगलों में से एक है. महान में खनन का मतलब है जैवविविधता और जीविका का खत्म हो जाना. सरकार को कॉल ब्लॉक के आंवटन के मानदंड और जंगल के भीतर फैले कोल ब्लॉक को आवंटित करने के निर्णय की समिक्षा करनी चाहिए”.
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है और कहा कि नये सिरे से आवंटित होने वाले कोल ब्लॉक से पहले सभी पर्यावरण कानून और वन अधिकार कानून का पालन किया जाये.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.