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राजनीतिक दलों का साझा चूल्हा..

By   /  September 27, 2014  /  Comments Off on राजनीतिक दलों का साझा चूल्हा..

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-तारकेश कुमार ओझा||
अपने देश में गठबंधन की राजनीति के लड़ाई – झगड़े बिल्कुल पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद जैसे होते हैं. एक ही समय में दोनों पक्षों के कर्णधार आपस में हाथ मिला रहे होते हैं, तभी सीमा पर दोनों तरफ के सैनिक दांत पीसते नजर आते हैं. कभी हुआ कि अब लड़े … कि अब लड़े, फिर पलक झपकते आपसी सामंजस्य बढ़ाने का साझा बयान जारी हो गया. लेकिन लड़ाई कभी – कभी असली भी होती है. बिल्कुल भाजपा – शिवसेना या कांग्रेस – एनसीपी गठबंधन की तरह. इन दलों के बीच न जाने कितनी बार एेसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई कि लगा कि अब दोनों को अलग हुए बिना कोई नहीं रोक सकता है. लेकिन जैसे – तैसे गठबंधन चलता रहा.unnamed

गठबंधन की राजनीति का सबसे पहला व सफल प्रयोग पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट दलों के बीच देखने को मिला. वाममोर्चा के घटक दल तमाम किंतु – परंतु के साथ लगातार 34 साल तक सरकार में बने रहे. एेसा नहीं कि इनके बीच हमेशा सौहार्द ही बना रहा. कार्यकर्ताओं के बीच खूनी लड़ाई – झगड़े तक हुए. बैठकों में तनातनी और आंखें तरेरने का सिलसिला भी लगातार चलता रहा. यह तनातनी समय और परिस्थतियों के हिसाब से नरम – गरम होती रही .

वाम शासन काल के बिल्कुल अंतिम दौर में नंदीग्राम हिंसा को लेकर जब माकपा बुरी तरह से घिर गई थी, तब घटक दलों ने भी इसकी खूब लानत – मलानत की. लेकिन गठबंधन आज भी कायम है. सत्ता परिवर्तन के बाद भी प्रदेश में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन रहा, लेकिन यह बमुश्किल एक साल ही चल पाया. लगभग अच्छे दिनों में ही दोनों दलों ने अपने – अपने चूल्हे अलग कर लिए.

90 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. वी. पी. सिंह के दौर के कथित तीसरे मोर्चे को आखिर कोई कैसे भूल सकता है. जिसमें तमाम बेमेल विचारधारा वाले दल कुछ समय के लिए एक छत के नीचे रहने को मजबूर रहे. लेकिन जल्द ही उनमें अलगौझी हो गई. आज भी लगभग हर चुनाव के दौरान चौथे मोर्च की चर्चा उसी दौर की याद दिलाता है. महाराष्ट्र में भी सत्ता व विरोधी दोनों खेमों का गठबंधन टूट गया. अस्तित्व में आने के बाद से अब तक न जाने कितनी बार भाजपा – शिवसेना और कांग्रेस – एनसीपी के बीच लट्ठ -लट्ठ की नौबत आई. लेकिन किंतु – परंतु के साथ कुनबा बरकरार रहा. कदाचित यह प्रेशर पॉलिटिक्स का ही परिणाम रहा कि अच्छे और बुरे दिन वाले दोनो खेमों की दोस्ती टूट गई.

शायद दबाव की राजनीति दोधारी तलवार की तरह होती है, जो दोनों तरफ से काटती है. जब कोई दल सत्ता में होता हैं तब भी साझेदार अधिक सीटों के लिए दबाव बनाते हैं कि ये अच्छे दिन सिर्फ आपकी वजह से नहीं आए, इसमें हमारा भी कुछ योगदान है. और जब बुरा दौर चलता है तब भी कि बात नहीं मानी गई तो हमारा रास्ता अलग. वैसे भी अब आपकी हैसियत ही क्या है.

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  • Published: 6 years ago on September 27, 2014
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  • Last Modified: September 27, 2014 @ 7:35 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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