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पुस्तक समीक्षा: अनसुने ईसाईयों की आवाज़..

By   /  September 28, 2014  /  Comments Off on पुस्तक समीक्षा: अनसुने ईसाईयों की आवाज़..

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-प्रेमकुमार गौतम||

आंख में चुभे तिनके सी पीड़ा महसूसता हृदय
पुस्तक समीक्षा: अनसुने ईसाइयों की आवाज

’’दूसरे की आंख में तिनका खोजने के पूर्व तू अपनी आंख का लट्ठा देख’’ पवित्र बाइबिल का यह वचन मनुष्य को जिस आत्मावलोकन की शिक्षा देता है वह जीवन निर्वाह में कम दिखाई देता है। प्रायः व्यक्ति या समाज, धर्म या जाति परनिन्दा पर ही ध्यान देता है। स्वयं के सुधार के प्रति उसकी दृष्टि प्रायः शिथिल बनी रहती है। यदा-कदा कुछ सहृदय विचारक अपना गिरेबां खुद झांकने का प्रयास करते हैं।Book Samiksha by Prem Kumar Gautam, Ansuney Isaiyo ki Aawaz

गरीब परीवार में जन्में तथा जीवन की कठोर परिक्षाओं से गुजरते ईसाई चिंतक आर.एल.फ्रांसिस ने अपनी ताज़ा पुस्तक ’’अनसुने ईसाइयों की आवाज़’’ में कुछ ऐसी ही कोशिश की है। उन्होनें दलित विमर्श को एक परिष्कृत रूप देते हुए गरीब तथा धर्मांतरित ईसाइयों की दयनीय दशा से जोड़ा है। जैसा कि पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट होता है कि लेखक का उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार करना नहीं बल्कि इसके अधिकारविहीन, वंचित, शोषित लोगों की पीड़ा की चिंता करना है। लेखक जो ईसाई समाज को एक समाज सुधारक की दृष्टि से देख रहा है पुस्तक में गरीब भाई बहनों की वेदना तर्कपूर्ण, सुसंगल ढंस से प्रकट करता है।

दुनिया में सिर्फ दो ही जातियां है अमीर और गरीब। फ्रांसिस इसी दृष्टि से गरीब ईसाई व्यक्तियों का आकलन करते हैं। वे ईसाई धर्म के दो मतों कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट पर कोई खास चर्चा नहीं करते। वे प्रभु यीशु तथा कार्ल मार्क्स के समानता के सिद्धान्त को पुस्तक की चर्चा का केन्द्र बनाते है। बताना लाजिमी होगा कि ’’अनसुने ईसाइयेां की आवाज’’ पुस्तक की सामग्री सायास, सप्रयास रची नहीं गई। पुस्तक लेखक फ्रांसस के विभिन्न सम्मेलनों में प्रस्तुत वक्तव्यों तथा पढ़े पर्चों का संकलन मात्र है। अस्सी पृष्ठ की पुस्तक के 11 भागों में प्रत्येक भाग जातिवाद तथा शोषण के खात्में की वकालत करता है। लेखक ईसाई धर्म (संस्था) के टूटते मानवीय ढांचे की ओर इशारा करता है।

जाहिर है कि ईसाई धर्म सेवा तथा जातिमुक्त भावना को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है जिसे तमाम संतों, सेवक-सेविकाओं ने अपने क्रियाकलापों से सिद्ध भी किया है। ’’सिस्टर ऑफ चैरिटी’’ की संस्थापक मदर टेरेसा इसकी बुलंद नज़ीर हैं। सेवकाई में समानता और उदारता का मूल तत्व चर्च व्यवस्था के अधिकार सम्पन्न प्रमुख, पुरोहित वर्ग के मध्य धुंधला पड़ता दीख रहा है। फ्रांसिस इस धर्म के धुंधलके की बात मंचों के बाद अपनी पुस्तक में कर रहे हैं। पुस्तक ईसाई समाज में व्याप्त गैर बराबरी और वर्गभेद की घोर अलोचना करती है।

पुस्तक के प्रथम भाग के पृष्ठ 13 पर ’’चर्च में डायवर्सिटी की जरूरत’’ शीर्षक के तहत चर्चा में लेखक चर्च को जातिवाद से बचने की सलाह देता है। ’’चर्च नेतृत्व ने जातिप्रथा का कोढ़ ईसाईयत पर हावी कर दिया है’’ जैसा वाक्य लिख लेखक ईसाई समाज के व्यवस्थित, अनुशासित, मानवीय तंत्र के क्षय की आशंका प्रकट कर रहा है। वह कहता है – चर्च दलित इसाईयों के साथ वर्तमान मे ंवैसा ही खेल खेल रहा है जैसा फरीसियों ने लॉर्ड जीसस के साथ खेला था। यह चर्च व्यवस्था की नहीं बल्कि चर्च में पनपती काई की आलोचना है।

लेखक ने पुस्तक के सातवें भाग में ’’पोप के नाम’’ दलित ईसाईयों का पत्र’’ नामक विषय में एक बारीक षड़यंत्र का पर्दाफाश किया है। भारतीय चर्च में वंचित वर्ग (पृ0 54) पर पोप को लेखक बताता है – समानता के नाम पर आपके नेतृत्व वाले कैथोलिक चर्च अधिकारियों ने उनका अपने स्वार्थो के लिए जमकर दोहन किया है, और जिस जातिवादी एवं गैरबराबरी वाली व्यवस्था से छुटकारे की आशा लेकर यह वंचित वर्ग चर्च की शरण में आए थे वह उन्हें नही मिल पाई उल्टा वह उससे भी भयानक गैर बराबरी के चक्रव्यूह में फंस गए हैं। पुस्तक में भारतीय चर्च के 70 प्रतिशत वंचित वर्गों के धर्मांतरित ईसाईयों के प्रति बरते जाने वाले भेदभाव और अपेक्षा की तार्किक बात कही गई है। ये ईसाई जातिप्रथा के सताए, भूख, गरीबी के मारे वो लोग हैं जिन्हें ईसाइयत का सब्जबाग चर्च की ओर खींच ले गया। इनमें अधिकांश वंचति आदिवासी, ग्रामीण क्षेत्रों से आए हैं। इनका जल, जंगल, जमीन से रिश्ता तो टूटा ही बल्कि ईसाइयत की नाव की सवारी का भी लाभ न मिल सका।

पुस्तक के अंतिम भाग 11 में जनजातियों की संस्कृति पर मंडराता खतरा में लेखक आदिवासी समाज में धर्मांतरण से उपजी वैमनस्यता तथा शोषण के प्रति गम्भीर हैं। वह छोटा नागपुर, झारखण्ड की नजीर पेश कर आगाह करता है – चर्च ईसा मसीह की जीवनी तथा शिक्षाओं से भटक गया है। पुस्तक में ईसा के अनुसरण से भटके, चर्च के सुधार की नीयत दिखती है। प्रथम दृष्टया पुस्तक में ईसाइयत की चिंता झलकती है किंतु सम्पूर्णता में इसका ऐसा कोई विशेष उद्देश्य नजर नहीं आता। पुस्तक में धर्म, जाति के नाम पर छले जा रहे गरीब वंचित व्यक्ति की तस्वीरें पेश की गई हैं लिहाजा इसे व्यापक मानवीय दृष्टि की दरकार है।

तमाम समाज सुधारकों स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय का जो अभिप्राय था वही पुस्तक के लेखक का भी है। धर्म के मूल तत्व की क्षति, विरोध या चर्च को आघात पहुँचाने का लेखक ने कोई प्रयास किया हो ऐसा नही लगता। ’’बुधिया – एक सत्यकथा’’ जैसी गम्भीर कृति के लेखक, विचारक पी.बी. लोमियों के सम्पादन में प्रकाशित फ्रांसिस की पुस्तक में मि. लोमियों के तेवर साफ दिखाई देते हैं। सामग्री में व्यक्तिगत आक्षेप, दुर्भावना या अतिवादी दृष्टिकोण से परहेज किया गया है। यही भावना दो हजार वर्ष पूर्व ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह की भी तत्कालीन रोमन व्यवस्था के प्रति रही होगी। दुर्भाग्य! उदार ईसा को कांटों का ताज और सूली नसीब हुई।

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