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सभ्यता का जीवंत प्रवाह हैं उत्सव..

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-प्रणय विक्रम सिंह||

पर्व प्रवाही काल का साक्षात्कार है। इंसान द्वारा ऋतु को बदलते देखना, उसकी रंगत पहचानना, उस रंगत का असर अपने भीतर अनुभव करना पर्व का लक्ष्य है। हमारे पर्व और त्योहार हमारी संवेदनाओं और परंपराओं का जीवंत रूप हैं जिन्हें मनाना या यूं कहें की बार-बार मनाना, हर साल मनाना हर भारतीय को अच्छा लगता है। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां मौसम के बदलाव की सूचना भी त्योहारों से मिलती है। इन मान्यताओं, परंपराओं और विचारों में हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत सरोकार छुपे हैं। जीवन के अनोखे रंग समेटे हमारे जीवन में रंग भरने वाली हमारी उत्सवधर्मिता की सोच मन में उमंग और उत्साह के नये प्रवाह को जन्म देती है। उत्सव ‘सवन’ से उत्पन्न शब्द है। सोम या रस निकालना ही सवन है। वह रस जब ऊपर छलक आये तो उत्सवन या उत्सव है।110838

भारतीय संस्कृति में त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही काफी महत्व रहा है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां पर मनाये जाने वाले सभी त्योहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सjावना को बढ़ाते हैं। भारत में त्योहारों एवं उत्सवों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है। यहां मनाये जाने वाले सभी त्योहारों के पीछे की भावना मानवीय गरिमा को समृद्धि प्रदान करना होता है। यही कारण है कि भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों एवं उत्सवों में सभी धर्मों के लोग आदर के साथ मिलजुल कर मनाते हैं। आजकल तो नवरात्र, विजयादशमी और बकरीद की धूम है। बच्चे, बड़े सभी इन उत्सवों का हिस्सा बनते नजर आ रहे हैं। इन दिनों राष्ट्र देवी पूजा में डूबा हुआ है। चारों ओर देवीमंडप सजे हैं। जिनमें नवीनतम कला रूपों का कलाकारों, मूर्तिकारों ने प्रयोग किया है। चारों ओर तरह-तरह के सांस्कृतिक अनुष्ठानों का आयोजन हो रहा है और सारा समाज उसमें डूबा हुआ है।

इस अवसर पर गरीब और अमीर का भेद नजर नहीं आता। कितना गुथा हुआ समाज है हमारा। कोई मुस्लिम संगतराश देवी की मूर्ति को आकार देता है तो गांव का हरिचरना देवी की मूर्ति में रंग भरता है। पूरा गांव-कस्बा, मोहल्ला जमा हो जाता है जब देवी को मंडप में लाया जाता है। हर जाति-मजहब का व्यक्ति मूर्ति स्थापना में अपना सक्रिय सहयोग कर स्वयं को धन्य मान रहा होता है। देवी के संबोधन से हम अपनी बहन-बेटियों को भी संबोधित करते हैं। संबोधन की यह पवित्रता हमें अपने संस्कारों से मिली है और यह पर्व ऐसे संस्कारों को जीवंत करते हैं। दरअसल देवी उपासना का सीधा संबंध स्त्री के वजूद और परम व्यापक अस्तित्व की मन से स्वीकार्यता से ही जुड़ा है। जहां स्त्री को अपने से ऊपर और अपेक्षाकृत अधिक शक्तिमान स्वीकारा गया है और यह साफ-साफ कह दिया गया है कि इसके बगैर सृष्टि का न अस्तित्व है, न सामथ्र्य। शक्ति की प्रतीक इस परम सत्ता का ही अंश स्त्री है। इसीलिए दुर्गा स’शती में समस्त विद्याओं की प्रा’ि और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिए स्पष्ट उल्लेख है। ‘विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:, स्त्रिय: समस्ता: सकलाजगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैततु, का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति।’ किसी देवी के बिना देव में सामथ्र्य की कल्पना व्यर्थ हैं। अत: यह समझने की आवश्यता है कि यदि हम घर-परिवार में स्त्रियों का अपमान करते हैं तो देवी उपासना का न तो कोई लाभ है और न ही औचित्य। आजकल समाज में आनर किलिंग का प्रचलन बढ़ गया है। भ्रूण हत्या तो उद्योग का दर्जा लिए है। ऐसे में वर्ष में एक बार नवरात्र का आगमन हमें स्त्री शक्ति, सामथ्र्य और स्वरूप का आभास व संदेश देती है जो किसी वर्ग विशेष के लिए न होकर सम्पूर्ण सृष्टि के लिए होता है। इस समय रामलीला का मंचन भी गांव, शहर और मोहल्लों में बड़े हर्ष के साथ मनाया जा रहा है। यह मंचन भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता का जाग्रत उदाहरण है जिसमें कहीं राम के किरदार को मोहन जीता है तो सुनीता सीता बनती हैं। कलाकारों के कपड़े जुम्मन दर्जी सिलता है तो कुल रामलीला मंडली जात-पात, मजहब के तंग दायरे से निकल कर राम कथा को जीती है। उसके पश्चात आने वाला विजयादशमी का पावन पर्व भी हमें कुछ याद कराता है। त्रेतायुग ने दशानन के दस मुख दिखाए थे। लालच, ईष्याã, घमंड, द्बेष, परनारी गमन आदि के पाप गिनाये थे। आज कलयुग में भी रावण हैं। विजयादशमी की कल ही नहीं आज भी जरूरत है। आज सीता (जनता) रावण की लंका (सियासत) में कैद हो गयी। विजयादशमी का पर्व नया संदेश लाता है। दसमुख हों या सौमुख हों उनसे लड़ने को जगाता है।

कम से कम इस एक दिन तो हर बच्चा राम बनना चाहता है। आतंक, द्बेष, लालच, देशद्रोह, मक्कारी, महंगाई, गरीबी, बीमारी, छल-कपट, झूठ, बेईमानी, लम्पटता को जलाना चाहता है। इसलिए ही यह पावन पर्व आता है। राम नाम, राम राज्य, राम चरित्र की याद दिलाता है। आइये सीता (जनता) को आजाद कराने की, दशानन को मार गिराने की, दलालों को भगाने की, विभेदों को दूर हटाने की गरीबी, भुखमरी, बेकारी, बदसलूकी, गद्दारी, चोरबाजारी, आतंक, लालच, छल-कपट, मक्कारी आदि दसमुखों को दहन करने की शपथ खाएं। कितना सुखद संयोग है कि जहां एक ओर नवरात्र और विजयदशमी इस माह में लोगों को त्याग और तपस्या की सीख दे रहे हैं तो दूसरी तरफ ईद-उल-अजहा यानी बकरीद भी सत्य के अपराजित व उसके लिए हमेशा कुर्बानी देने को तैयार रहने का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहा है। इस मौके पर मुस्लिम भाई नमाज अदा करेंगे और कुरबानी देकर अल्लाह की खुशनूदी प्रा’ करेंगे। त्याग, बलिदान, आपसी मिल्लत, हमदर्दी, सामाजिक सौहार्द का पैगाम देने वाले इस पर्व को लेकर देश में खुशनुमा माहौल है। शहर के बाजारों में अच्छी खासी रौनक है। ईदगाहों व खानकाहों में सामूहिक नमाज की तैयारियां भी पूरी हो गयी हैं। नमाजों और दुआओं का दौर जारी है। चहुं ओर बड़ा ही दिलकश माहौल है। दरअसल हम भारतीय स्वभाव से ही उत्सवधर्मी हैं। तभी तो पूरे मन से इन उत्सवों का हिस्सा बनते हैं। सच, कितना कुछ बदल जाता है त्योहारों की दस्तक से हमारे जीवन में। दिनचर्या से लेकर दिल के विचारों तक। इन पर्वों की हमारे जीवन में क्या भूमिका है इसका अंदाज इसी बात से लगा लीजिये कि यह त्योहार हमारे जीवन को प्रकृति की ओर मोड़ने से लेकर घर-परिवारों में मेलजोल बढ़ाने तक, सब कुछ करते हैं और हर बार यह सिखा जाते हैं कि जीवन भी एक उत्सव ही है। हमारा मन और जीवन दोनों ही उत्सवधर्मी है। मेलों और मदनोत्सव के इस देश में ये उत्सव हमारे मन में संस्कृति बोध भी उपजाते हैं। हमारी उत्सवधर्मिता परिवार और समाज को एक सूत्र में बांधती है। संगठित होकर जीना सिखाती है। सहभागिता और आपसी समन्वय की सौगात देती है। दुनिया भर के लोगों को हिन्दुस्तानियों की उत्सवधर्मिता चकित करती है। हमारी ऐतिहाहिक विरासत और जीवंत संस्कृति के गवाह यह त्योहार विदेशी सैलानियों को भी बहुत लुभाते हैं। हमारे सरस और सजीले सांस्कृतिक वैभव की जीवन रेखा हैं हमारे त्योहार, जो हम सबके जीवन को रंगों से सजाते हैं। दरअसल रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद में एक आम इंसान के जीवन में अवसाद घिर ही आता है, इसीलिए विद्बानों ने हर ऋतु के अनुरूप, थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद त्योहारों की संरचना की, ताकि मानव जीवन में आनंद और समरसता के साथ-साथ शक्ति और प्रफुल्लता का संचार हो सके। मौज-मस्ती के बावजूद, लोग एक-दूसरे के सहायक बनें और दैनिक कार्यों को पुन: निष्ठा और उत्साह के साथ कर सकें। इसलिए त्योहारों को धार्मिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों से जोड़ दिया गया था। पवित्र और नैतिक सोच देने के अलावा, त्योहारों का मुख्य उद्देश्य था, सभी को एक सूत्र में पिरोना, क्योंकि एक साथ त्योहार मनाने से न केवल समाज की नींव मजबूत होती थी, बल्कि हर स्तर पर सौहार्द और मेल-मिलाप बढ़ता था। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के जीवन की कलुषता और स्वार्थ को मिटाने के वास्ते हमारे पूर्वजों ने त्योहारों की स्थापना की थी। पर अफसोस, आज हमारे देश में त्योहार सिर्फ शोर-शराबे का पर्याय बन गए हैं, जिनमें अनाप-शनाप खर्च करना ही लोगों की प्रवृत्ति बन गई है।

होली हो या दिवाली, ईद हो या गणेश चतुर्थी हो या क्रिसमस, हर तरफ कान फोड़ू संगीत, और तड़क-भड़क के अलावा कुछ नहीं रह गया है, जिसमें प्रत्येक जाति, वर्ग और समूह अपने रीति-रिवाजों का सड़क पर प्रदर्शन कर, अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं। पिछले डेढ़ दशक से हमारे सामाजिक कौमी बंधन के धागे काफी ढीले दिखाई पड़ रहे हैं। दंगों ने देश की गंगा-जमुनी तहजीब को तक्सीम करने की नाकाम कोशिश की है। समाज फिर अपनी धारा में वापस आने को कटिबद्ध है। आज त्योहार कटुता का पर्याय बन गए हैं, जिनकी रौनक अगर महंगाई ने छीन ली है, तो लोगों के स्वार्थपरक व्यवहार ने उन्हें बोझिल बना दिया है। पर सच्चाई यही है कि हर दौर में त्योहार हमें ये मौका देते हैं कि हम अपने जीवन को सुधारकर, खुशियों से भर सकें। मंदिर-मस्जिद में जाकर माला जपने से कहीं बेहतर है कि हम सब दुनियादारी को छोड़, कुछ समय सादगी के साथ अपनों के संग बिताएं, ताकि हमें न केवल शारीरिक बल्कि आत्मिक आनंद भी मिल सके। इंसान की सेवा में ही हर त्योहार की सार्थकता है और यही सच्ची पूजा भी है। त्योहार व्यक्ति के जीवन में नए उत्साह का संचार करते हैं, वह उत्साह इंसान के मन में सदैव बना रहे मैं यह कामना हमेशा करता हूं। इससे जीवन में गति आती है। लोग जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया रखें। किसी भी प्रकार की कठिनाई आने पर घबराएं नहीं और अपना जीवन एक सुगंधित फूल की भांति बनाएं जिसकी खुशबू से यह चमन महकता रहे।

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