कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

सफ़ाई सिर्फ़ धन की या मन और वतन की भी..

0
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

-अभिरंजन कुमार||

अभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दुनिया का सबसे लंबा चुनाव-प्रचार चल रहा है. 5 साल लंबा चुनाव-प्रचार. मोदी के कुर्सी संभालने के कुछ ही दिन के भीतर यह बात समझ में आने लगी थी कि 2019 के चुनाव के लिए अभी से ही अगले पांच साल तक वे हर रोज़ अपना प्रचार किया करेंगे. वे चाहे देश में रहें या विदेश में, इसका कोई मौका नहीं चूकने वाले. लेकिन इसके लिए विरोधी राजनीतिक दलों की तरह मैं जल नहीं रहा हूं, बल्कि उनकी तीक्ष्ण राजनीतिक बुद्धि को सलाम करता हूं.pm_modi

देश में साफ़-सफाई होनी चाहिए, इससे कोई असहमत नहीं हो सकता, लेकिन इस सहमति के बावजूद मेरे मन में कई सवाल हैं. मसलन

— कहीं मोदी का सफाई अभियान भी तो ठीक उसी तरह सरकार+मीडिया प्रायोजित शिगूफ़ा भर तो नहीं, जैसे अन्ना+मीडिया प्रायोजित भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान का कुछ महीने शोर रहा, फिर सब टांय-टांय फिस्स हो गया? वैसे भी इस देश का हर आम आदमी रोज़ाना झाड़ू लगाता है. ख़ुद मैं भी अपने घर में झाड़ू लगाता हूं. बचपन में अपने स्कूल में भी लगाता था. हमारे गांवों में तमाम पर्व-त्योहारों पर सारे बड़े-बुज़ुर्ग आज भी झाड़ू लगाते हैं. अब फोटो सेशन के लिए झाड़ू लगाने वाली न तो दूरदर्शिता सबमें होती है, न हैसियत.

— सफ़ाई की मुहिम प्रधानमंत्री, मंत्रियों और नेताओं के फोटो-सेशन से कितना आगे बढ़ पाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये सारे महामहिम दो पल झाड़ू चलाकर बड़प्पन झाड़ना चाहते हैं कि देखो हम कितने बड़े हैं कि इतने बड़े होकर भी किसी काम को छोटा नहीं समझते और तुम लोग कितने छोटे हो कि छोटे होकर भी अपने को बड़ा समझने से बाज़ नहीं आते.

— क्या ग़रीबी और अशिक्षा पर निर्णायक प्रहार किये बिना गंदगी मिटाई जा सकती है? अमीरों के बंगलों के संगमरमर और टाइल्स चमकते रहते हैं, जबकि ग़रीबों की बस्तियां गंदी हैं. ग़रीबों के लिए चलाए जाने वाले स्कूल और अस्पताल गंदे हैं, जबकि अमीरों के स्कूल और अस्पताल चकाचक रहते हैं. चौड़ी सड़कें साफ़-सुथरी रहती हैं, जबकि संकरी गलियां गंदी रहती हैं.

क्या सरकार यह समझ पा रही है कि गंदगी के लिए ग़रीब नहीं, ग़रीबी और अशिक्षा ज़िम्मेदार है. सरकार के पास इन्हें मिटाने के लिए क्या ठोस योजनाएं हैं? क्या अंबानी, अडानी, टाटा, बिड़ला- सबने सरकार को ग़रीबी और अशिक्षा मिटाने की योजनाओं में सहयोग करने का वचन दे दिया है? या हम देश के ग़रीबों को सिर्फ़ उपदेश पिलाने वाले हैं कि साफ़-सुथरा रहना चाहिए और रोज़ दस बार साबुन से हाथ धोना चाहिए.

— इस देश में आम लोग अधिक गंदगी फैला रहे हैं या फिर ख़ास लोग? किसान और मज़दूर अधिक गंदगी फैला रहे हैं या फिर कल-कारखाने चलाने वाले? देश के आम शहरी अधिक गंदगी फैला रहे हैं या फिर उन शहरों को साफ़ रखने के लिए ज़िम्मेदार नगर निगम और नगर पालिकाएंं? जो लोग देश को साफ़-सुथरा रखने के लिए जनता के पैसे से तनख्वाहें ले रहे हैं और करोड़ों-अरबों का वारा-न्यारा कर रहे हैं, वे अपनी ड्यूटी कब निभाएंगे?

— गंदगी आपको सिर्फ़ ज़मीन वाली दिखाई दे रही है, आकाश और पाताल में जो गंदगी आप फैला रहे हैं, उसका क्या होगा? वायु-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण, भूजल प्रदूषण रोकने के लिए आपके पास क्या योजनाएं हैं?

चीटियों की तरह रेंगती गाड़ियों और कल-कारखानों के धुएं और शोर से शहरों को कौन बचाएगा? नदियों को बांधकर, उनमें औद्योगिक कचरे बहाकर उन्हें नालों की जैसी शक्ल दे दी गई है, उन्हें लाखों करोड़ पीकर भी आप ठीक नहीं कर पाएंगे- यह तय है. उत्तराखंड और कश्मीर में जो गंदगी फैलाई गई, उसे बुहारने के लिए तो कुदरत को झाड़ू चलानी पड़ रही है. आपकी झाड़ू से तो सिर्फ़ पॉलीथीन और सूखी पत्तियां बटोरी जा सकती हैं.

— भ्रष्टाचार, नाइंसाफ़ी, लालफीताशाही और राजनीति के अपराधीकरण से भी बड़ी गंदगी इस देश में कुछ और है क्या? इन गंदगियों को आप कब साफ़ करेंगे? कहां हैं वो फास्ट ट्रैक अदालतें, जहां सारे दागी सांसदों को एक साल के भीतर सज़ा दिलाकर संसद से बाहर करने का वादा था? कहां हैं देश के वे कर्णधार, जो विदेशों से काला धन वापस लाने वाले थे? उन सपूतों की फ़ौज किसी सरकारी दफ़्तर में, पुलिस में, अदालतों में क्यों दिखाई नहीं दे रही, जो न ख़ुद खाते हैं, न दूसरों को खाने देते हैं?

कुल मिलाकर मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सफाई सिर्फ़ जनता के धन की होगी या लोगों के मन की भी होगी और प्रकारांतर से वतन की भी होगी?

Facebook Comments
Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
Share.

About Author

Comments are closed.

%d bloggers like this: