/चौटाला ने साबित किया कि शेर पिंजरे में भी शेर होता है..

चौटाला ने साबित किया कि शेर पिंजरे में भी शेर होता है..

-पवन कुमार बंसल||

नई दिल्ली, कोई चाहे ओम प्रकाश चौटाला की नीतियों से सहमत हो अथवा नही. लेकिन अस्सी साल की उम्र में ओम प्रकाश चौटाला ने यह साबित कर दिया है कि वे शेर हैं. और बेशक शेर को पिंजरे में बंद कर दो वो शेर ही रहता है और पिंजरे में बंद होकर गीदड़ नहीं बन जाता.om-prakash-chautala

असल में ओम प्रकाश चौटाला अपने राजनीतक जीवन का सबसे कठिन संकट का सामना कर रहे है. ऐसा नहीं है कि उनके लम्बे राजनीतक जीवन में उन्हें कोई चुनौती नहीं मिली. लेकिन इस बार की चुनौती जबरदस्त थी. ओम प्रकाश चौटाला के पिता चौ. देवीलाल के जीवन में भी कई संकट आये थे. बंसीलाल सरकार की ज्यादित्यो से निराश होकर देवीलाल भी एक बार तो राजनीती छोड़ कर अपने तेजखेड़ा फार्महाउस में जाकर सन्यास लेकर बैठ गए थे. तब भाजपा नेता मंगलसेन उन्हें वहा से वापिस लाये थे तथा हरियाणा में संघर्ष समिति का गठन किया था.

दिल्ली हाई कोर्ट में पेश होते हुए तथा तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण करने के लिए जाते हुए चौटाला के चेहरे पर कोई शिकन होने की बजाये आत्मविश्वास झलक रहा था. चौटाला दस साल की सजा काट रहे है. यह उन्हें भी पता है कि  क़ानूनी अड़चनों के चलते वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते. बेशक उनकी पार्टी को सरकार बनाने लिए बहुमत भी मिल जाए.

इसके बावजूद भी उन्होंने यह कह कर की वे तिहाड़ जेल से ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे अपने कार्यकर्ताओं में जान फूंक दी. अस्सी साल की उम्र और फिर उस पर जेल . कोई और नेता होता तो अपना आत्म विश्वास खो बैठता. लेकिन यह ओम प्रकाश चौटाला है कि जिन्होंने शिक्षक भर्ती कांड पर आक्रामक रुख अपनाते  हुए इसे अपने हक़ में बदल लिया.

इसे मामले से चौटाला को सहानुभूति मिलते देख कर ही मजबूर होकर मुख्यमंत्री भूपिदर सिंह हूडा को कहना पड़ा की यदि चौटाला को तीन हज़ार नौकरी देने पर दस साल
की सजा हुई है तो उन्हें तो फिर फांसी होनी चाहिए कयोकि उन्होंने तो साठ हज़ार नौकरियां दी है.

इससे पहले चौटाला ने देवीलाल के मुख्यमंत्री रहते अपने भाई रंजीत सिंह की साजिशो का सामना किया था. १९९० में हुए मेहम विधानसभा के चुनाव में आज़ाद उमीदवार अमीर सिंह की हत्या के बाद उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. फिर १९९१ में उनकी सरकार चली गयी लेकिन उन्होंने हिमत नहीं हारी. फिर सेकि या आयोग की
रिपोर्ट में उनके बारे की गयी टीपणी ने उन्हें हिला दिया था. लेकिन उन्होंने फिर भी हिमत नहीं हारी.

मुयख्यमंत्री रहते उन्होंने अपने बेटो अजय अभय में भी सत्ता का संतुलन बना कर रखा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.