/सत्यमेव जयते, आमिर खान और कमाई की दूकान..

सत्यमेव जयते, आमिर खान और कमाई की दूकान..

-शम्भूनाथ शुक्ल||

सत्यमेव जयते में आमिर खान सेव लाइफ फाउंडेशन का प्रचार कर रहे थे या उसके उददेश्यों के बारे में बता रहे थे, यह साफ नहीं हुआ। इस संस्था के कर्ताधर्ता पीयूष तिवारी ने यह नहीं बताया कि उनके काम करने का तरीका क्या है अथवा संकट के समय उनकी मदद कैसे मंगाई जा सकती है। देखते ही देखते वे एक करोड़ की मदद तो इसके एक आयोजक रिलायंस फाउंडेशन से ही पा गए। और बाकी की मदद की अपील सुनने वालों से कर डाली।तिवारी जी और आमिर जी लोगों को इस कदर संवेदनशून्य बता रहे थे मानों यह पूरा देश मुर्दो की बस्ती है।satyamev jayate

हो सकता है कि तमाम लोग मुरदा ही हों पर असंख्य लोग खुद ही हाथ बढ़ाकर मदद करते हैं। मैं एक किस्सा सुनाता हूं। कोई पांच वर्ष पहले मैं अपने घर जिला गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित जनसत्ता अपार्टमेंट से अपने दफ्तर नोएडा के सेक्टर 59 स्थित अमर उजाला आफिस जा रहा था। कनावनी पुलिया पार करते ही मोबाइल की घंटी बजी और मोबाइल मैने उठा भी लिया यूं मैं गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल नहीं उठाता। बात करने के बाद फोन रखा और वो सीट पर न गिरकर नीचे गिर गया। मैं उसे उठाने लगा। चूंकि मैने सीट बेल्ट लगा रखी थी इसलिए बैलेंस बिगड़ गया और स्टीयरिंग झूल गया। गाड़ी डेढ़ फुट ऊंचे डिवाइडर तथा उसमें लगी तीन फुट ऊँची हेजिंग को तोड़ती हुई डिवाइडर के बीच वाले भाग में जा धँसी। धूल का गुबार उठा और कार उसमें घिर गई। इतना जोर का धमाका और धूल को देखकर लोग भागे। सबको लगा कि अंदर बैठा आदमी मर गया होगा या बेहोश हो गया होगा। मैं गाड़ी के अंदर सुरक्षित बैठा था। एसी चालू था और सारे दरवाजों की खिड़कियों के सीसे बंद। वे भी कुछ-कुछ अपारदर्शी थे। पर बाहर लोगों को बतियाने की आवाज सुनाई पड़ रही थी। एक ने कहा कि लगता है मर गया है, सीसे तोड़ो एक आदमी पास की दूकान से लोहे की राड ले आया। वह तान ही रहा था कि मैने सीसा धीरे से खोला और कहा कि भाई सीसा मत तोड़ देना। मैं धूल से बचने के लिए सीसे बंद किए था। मेरी यह बात सुनते ही सबने राहत की सांस ली और मुस्कराने लगे। गाड़ी का इंजिन बंद नहीं हुुआ था। सब ने कहा कि बाहर निकालिए। मैने गेयर लगाया और पूरी कोशिश की कि गाड़ी खिसके पर गाड़ी निकले ही नहीं। दरअसल उसके आगे बोनट धंस गया था और वह इंजिन से टकरा रहा था। सबने सोचा कि शायद मिट्टी में धँसी गाड़ी आगे नहीं निकल पा रही है इसलिए वे बोले कि आप इंजिन बंद कर दो और इंजिन बंद होते ही 15-20 लोगों ने मिलकर वह सेडॉन गाड़ी उठाई और रोड पर रख दी तथा बोले- सर आप जाइए। और फिर एकाएक सबने अपनी-अपनी बाइक स्टार्ट की और साइकिलें उठाई और फुर्र हो गए।

यहां एक बात मैने नोट की कि एक भी कार वाला मेरी गाड़ी को दुर्घटनाग्रस्त देखकर नहीं रुका। जबकि वह स्थान मेरे घर से आधे किमी से भी कम दूरी पर था। असंख्य गाडिय़ां गुजरीं जिनमें से कई तो जनसत्ता अपार्टमेंट की ही थीं पर कोई नहीं रुका जबकि मेरी गाड़ी पर लगा प्रेस का स्टिकर और वीआईपी नंबर सभी पहचानते थे। साथ ही उस मुख्यमार्ग से कई तो मेरे सहकर्मी ही गुजरते थे और जान-पहचान वाले भी। पर रुके वही जो बाइक वाले थे, आसपास के मिस्त्री थे या साइकिल पर जाने वाले कारखाना मजूदर। यानी रुकेगा वही जो पीड़ा जानता होगा। पीयूष तिवारी गाड़ी वाले हैं, उनका शगल हो सकता है लोगों की सेवा करना पर उनका मकसद नहीं। सेव लाइफ फाउंडेशन से वे पैसा बना सकते हैं या एकाध दृश्य देख कर द्रवित हो जाएं अथवा करुणा विगलित हो जाएं, जैसे कि तमाम दक्षिणपंथी और वामपंथी बुद्घिभोजी हो जाते हैं, पर इसका यह मतलब कतई नहीं कि करुणा विगलित होना उनका स्वभाव है। वे प्रचार प्रिय हैं, नाटक करना जानते हैं इसलिए सत्यमेव जयते जैसे फिजूल के कार्यक्रम में प्रचार की नीयत से आए। लेकिन मैं फिर कहूंगा कि ऐसे नाटककारों और ड्रामेबाजों को दान तब ही दें जब एक बार उनकी सेवा भी परख लें। आमिर खान पैसे की खातिर यहां पधारे हैं और जो कंपनियां उनका कार्यक्रम प्रायोजित करती हैं वे भी परले दरजे की व्यावसायिक हैं। यह तो उसी वेदांता कंपनी की तरह हुआ जिसने ओडीसा के लोगों को बरबाद कर दिया और चलते वक्त उसके मालिक अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा दान कर गए। दान करने वालों से सतर्क जरूर रहें। यह एक किस्म का ब्राह्मणवाद (श्रेष्ठतावाद) ही है।

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