कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

बोल भाई बोल…

0
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

-तारकेश कुमार ओझा||
बोलना एक कला है, यह तो सभी जानते हैं, लेकिन इसके साथ कई विशेषताएं , विडंबनाएं और विरोधाभास भी जुड़े हैं. जिसकी ओर लोगों का ध्यान कम ही जाता है. मसलन ज्यादातर अच्छे – भले कर्मयोगी अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप अच्छा बोल नहीं पाते. कभी एेसी नौबत आती भी है तो वह कांपते हुए बस जैसे – तैसे मौका देने वालों के प्रति आभार व धन्यवाद ज्ञापन कर बैठ जाते हैं. वहीं कई फांदेबाज टाइप के लोग इतना अच्छा बोलते हैॆं कि समां ही बांध देते हैं. ये कुछ बोलने के मौके ढूंढते रहते हैं. यह और बात है कि इनकी कथनी और करनी का फर्क जल्द ही सामने आ जाता है.neta ji

भारतीय राजनीति में न जाने कितने अच्छा बोलने वाले जल्दी ही मुंह के बल गिरे . वहीं एक चुप हजार चुप के अंदाज वाले कुछ राजनेता न सिर्फ अपनी बल्कि पार्टी और सरकार की गाड़ी भी सालों – खींच ले गए. नए दौर में दिल्ली वाले केजरीवाल चैनलों पर इतना अच्छा बोलते थे कि मन करता था कि वह बस बोलते रहें, और हम उन्हें सुनते रहे. मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में भी न वे सिर्फ देर तक बोले बल्कि गाना भी गाया, लेकिन यह क्या चंद हफ्तों में ही उनकी बोलती बंद हो गई. इससे हमें घोर निराशा हुई. एेसे में हमें अनायास ही पूर्व प्रधानमंत्री स्व. पी. वी. नरसिंह राव याद आ गए जो जहां एक शब्द बोलने से काम चल जाए , वहां वे दो शब्द भी नहीं बोलते थे. लेकिन विकट परिस्थितयों के बावजूद अपने प्रधानमंत्रीत्व काल का पांच साल पूरा कर लिया.

उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ मंत्री जब बोलने को माइक हाथ में पकड़ते हैं तो डर लगने लगता है कि पता नहीं आज यह कौन सा बम फोड़ बैठे. बचपन में हम धक्के खाते हुए भी बड़े राजनेताओं की जनसभाओं में जाते थे.जबकि उस दौर में देश – समाज की हमें न्यूनतम समझ भी नहीं थी. लेकिन उस भीड़ का हिस्सा बन कर हमें अपार खुशी मिलती थी, जो बड़े राजनेता को साक्षात बोलते सुन – देख कर अपने को धन्य समझती थी.

बोलना व्यवसाय और पेशा भी है तो वंश परंपरा का संवाहक भी. कुछ लोगों का काम ही बोलना होता है. वे जहां भी जाएं या जहां भी रहें, उनसे कुछ न कुछ बोलने की अपेक्षा ही की जाती है. यह और बात है कि कभी – कभी यह बोल बच्चन उनके गले की फांस भी बन जाता है. पता नहीं यह बोलने की कला सिर्फ विकासशील देशों में ही क्यो ज्यादा है.यूरोपीय देशों में सत्ता से हटने के बाद किसी भूतपूर्व माननीय को बहुत कम बोलते सु ना जाता है. बोलने की समृद्ध परंपरा सिर्फ अपने देश में ही है, एेसी बात नहीं. पड़ोसी देशों में भी यह कला खूब प्रचलित है. अब पाकिस्तान के पूर्व हुक्मरान जनरल परवेज मुशर्रफ को ही लीजिए. जनाब के ग्रह – दशा आजकल अच्छे नहीं चल रहे. लेकिन बोलना कैसे रुक सकता है. लिहाजा एक चैनल को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बोलना शुरू किया… हम भी एेसे वैसे नहीं…. न्यूक्लियर पावर है, हमें कोई कम न समझे…. हम भी 30 करोड़ हैं…. अब एेसे बोलों से जनरल साहब की ग्रह – दशा सुधरती है या नहीं , यह देखने की बात होगी. अलबत्ता अपनी ओर से वे कोशिश तो पूरी कर ही रहे हैं.

वंश परंपरा के उदीयमान नक्षत्रों के लिए बोलना एक मजबूरी है. भले ही एेसा करके वे पप्पू का तमगा पाते हों. पाकिस्तान में ही एक कोई बिलावल हैं, जिन्हें अपने पूवर्जों की तरह राजनीति में अपना कैरियर बनाना है, तो आजकल वे भी खूब बोल रहे हैं. अब पाकिस्तान में रह कर बोलने के लिए कश्मीर से अच्छा मुद्दा और क्या हो सकता है. लिहाजा इसके जरिए अपने भविष्य की वे खूब नेट प्रेक्टिस कर रहे हैं. क्योंकि अपना लक्ष्य पाने के लिए उन्हें तो बस बोलना है. एेसे में हम तो बस यही कहेंगे, बोल भाई बोल….

Facebook Comments
Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
Share.

About Author

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

%d bloggers like this: