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चाय बेचने वाले की बेटी ने एशियाड में पदक जीत कर पूरा किया पिता का सपना..

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-रमेश सर्राफ धमोरा||
झुंझुनू, 20 अक्टूबर. हाल ही में दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में  सम्पन्न हुये 17 वें एशियन खेलों में महिलाओं की हैमर थ्रो स्पर्धा में एक चाय बेचने वाले की बेटी ने रजत पदक जीत कर अपने पिता के सपना पूरा किया ही है. साथ ही उसने भारत व राजस्थान का नाम भी रोशन किया है.MANJUBALA MAAN-1

चूरू जिले के राजगढ़ तहसील में चांदगोठी गांव की मंजूबाला का यह पहला एशियाड है और पहली ही बार में उन्होंने देश के लिए पदक जीत लिया. एक जुलाई 1989 को जन्मी मंजूबाला ने पहले ही प्रयास में 60.47 मीटर की दूरी तय कर ली थी. मंजू का सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत प्रदर्शन 62.74 मीटर का है, जो उन्होंने इसी साल जून में लखनऊ में हुई चैंपियनशिप में बनाया था.
मंजूबाला के पिता विजयसिंह चांदगोठी गांव के बस स्टैंड पर एक चाय की दुकान चलातें हैं. जिससे उनका घर का खर्चा चलता है. कुछ आमदनी खेती से हो जाती है. परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर भले है लेकिन उन्होंने बेटी के सपने को कभी कमजोर नहीं पडऩे दिया.

मंजूबाला के पिता विजय सिंह का कहना है कि मंजू की सफलता में मेरे से ज्यादा उसकी मां संतोष देवी का योगदान रहा. उसकी मां पढ़ी-लिखी नहीं है, इसके बावजूद मंजू को हमेशा प्रोत्साहित किया. सच कहूं, तो एक मां ही बेटी को बाहर भेज सकती है, पिता में ऐसा साहस नहीं होता. बेटी ने भी इंचियोन में अपने ख्याब पूरे कर दिए. मंजू  राष्ट्रीय स्तर पर कई रिकॉर्ड बना चुकी है. करीब दो दर्जन गोल्ड मेडल उसके घर में सजे हैं लेकिन एशियाड में पहली बार गई है.

मंजू के पिता ने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि कई बार ऐसा  हुआ, जब मंजू को टूर्नामेंट या ट्रेनिंग में भेजने के लिए गांववालों से ही उधार पैसे लेने पड़े. दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भी उसकी ट्रेनिंग के लिए पैसे उधार लिए. मुझे उसका अफसोस नहीं है, क्योंकि बेटी ने ऐसा काम कर दिया, जिसके सामने यह कर्ज कुछ भी नहीं है. विजय सिंह ने बताया कि मंजूबाला ने वॉलीबॉल से अपना खेल कॅरिअर शुरू किया था. वे  जूनियर स्टेट खेली हुई हैं. नौवीं क्लास में उन्होंने वॉलीबॉल के साथ ही शॉटपुट भी खेलना शुरू कर दिया था. इस दौरान वे एक टूर्नामेंट के सिलसिले में बाहर गईं. वहां पर पहली बार हैमर थ्रो देखा. घर आकर बोली कि अब मैं हैमर थ्रो खेलना चाहती हूं. बस यहां से वे इसी इवेंट में आगे बढ़ती गईं.

अपने खेल के बारे में मंजूबाला ने बताया कि उनके गांव में ऐसा कोई मैदान  नहीं था जहां वह हैमर थ्रो का अभ्यास कर सके. इस लिये समय मिलते ही वह गांव के बाहर जाने वाले कच्चे रास्ते पर अभ्यास में जुट जाती. कई बार राहगीर उसे अभ्यास करते देख हंसते थे तो कई लोग उसके अभ्यास से रास्ते में व्यवधान होने से नाराज भी होते थे. मगर उसने हिम्मत नहीं हारी व अपना अभ्यास जारी रखा. 2005 में उसका चयन राष्ट्रीय टीम में हो गया जहां मेंने स्वर्ण पदक जीता. इस स्वर्ण पदक ने मेरी किस्मत खोल दी व उसके बाद मैने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा.

2012 में मंजू की अहमदाबाद रेलवे में क्लर्क नौकरी लग गई और दो साल पहले उसकी शा दी भी कर दी. विजय के अनुसार सेना में कार्यरत मंजूबाला के पति राकेश कुमार ने भी उसका काफी हौसला अफजाई किया, इसकी कारण शादी के बाद भी वे खेल रही हैं.

राजस्थान के चूरू जिले के छोटे से गांव चांदगोठी की बेटी व झुंझुनू जिले के लाडून्दा गांव की बहू मंजूबाल पिछले दस सालों में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्र्पद्धाओं में प्रदेश के लिए अब तक करीब दो दर्जन गोल्ड मेडल जीत चुकी है. लेकिन 2005 से शुरू हुए मेडल जीतने के इस  सिलसिले में मंजू को सबसे बड़ी उपलब्धि हाल ही एशियाड में रजत पदक के रूप में हासिल हुई. उन्होंने यह मुकाम शादी के दो साल बाद हासिल किया. मेडल  जीतने के बाद मंजूबाला ने बताया कि उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में देश और प्रदेश का प्रतिनिधित्वन किया है. इस बार इंचियोन एशियाड में रजत पदक जीतकर वे बेहद खुश हैं और आगे भी ऐसा  प्रदर्शन जारी रखना चाहती हैं.

मंजू के पिता विजयकुमार ने बताया कि अपनी बेटी को इस मुकाम पर पहुंचाने  में अब तक उनको सरकार से कोई बड़ी सहायता नहीं मिली है. मंजूबाला ने जब  नेशनल गेम्स में मेडल जीता था तब राज्य सरकार ने उसे तीन लाख रुपए का पुरस्कार जरूर दिया था. इसके अलावा और किसी तरह की सहायता या सम्मान उसे  नहीं मिला.

इंचियान में रजत पदक जीतकर देश को गौरवान्वित करने वाली गांव चांदगोठी की लाडली बेटी मंजूबाला ने कहा कि अभिभावक खेलो का ऐसा वातावरण तैयार करे कि
बच्चे बिना झिझक के खेलो में अपना कॅरियर बना सकें. हरियाणा सरकार की तरह  राजस्थान में भी खेलों को प्रोत्साहन मिले. पदक लाओ,पद पाओ योजना शुरू की जानी चाहिए. कोई भी युवा प्रतिभा अवसरों व सुविधाओं से वंचित ना रहे.

मंजूबाला का कहना है कि उसका आगामी लक्ष्य अपने पति व हैमर थ्रो के  राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रमेश मान के निर्देशन में अभ्यास कर 2016 में  होने वाले ओलम्पिक खेलों में भारत के लिये स्वर्ण पदक जीतने का है.

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