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राष्ट्रीय मीडिया को पुकार रहा है बिहार..

By   /  October 29, 2014  /  1 Comment

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हम दिलीप और अरुण, दोनों भाई आपको अपने गॉंव – तेमहूँआ , पोस्ट – हरिहरपुर, थाना – पुपरी, जिला – सीतामढ़ी, पिन – 843320 , राज्य – बिहार, आने का निमंत्रण देते हैं, क्योकि मै आपको वहां ले जाना चाहता हूँ जहाँ की फिजा में 48 दलित मुसहर भाई – बहन की अकाल मृत्यु की सांसों से मेरा दम घुटता है. मै आपको उन्हें दिखाना चाहता हूँ जो मारना तो चाहते है मगर अपने बच्चे, अपने परिवार के खातिर किसी तरह जी रहे है. मैं आपको उनसे मिलाना चाहता हूँ जो जिन्दा रहना तो नहीं चाहते मगर जीवित रहने रहने के लिए मजबूर हैं| मै आपको उस वादी में ले जाना चाहता हूँ जहाँ के लोग या तो भूखे है या फिर भोजन के नाम पर जो खा रहे है उसका शुमार इंसानी भोजन में नहीं किया जा सकता हैं! मै आपको उन कब्रो तक ले जाना चाहता हूँ जिसमे दफ़न हूँए इंसानो के भटकते रूह इस मुल्क की सरकार से यह आरजू कर रही है, की कृपया हमारे बच्चो के जिन्दा रहने का कोई उपाय कीजिये. मै आपको हकीकत की उस दहलीज़ पे ले जाना चाहता हूँ जहाँ से खड़ा होकर जब आप सामने के परिदृश्य को देखेंगे तो आपके आँखों के सामने नज़ारा उभर कर यह आएगा क़ि आज़ाद भारत में आज भी इंसान और कुत्ते एक साथ एक ही जूठे पत्तल पर अनाज के चंद दाने खा कर पेट की आग बुझाने को मज़बूर हैं. मै आपको उस बस्ती से रु-ब-रु करना चाहता हूँ जो बस्ती हर पल हर क्षण हर घड़ी भारत के राष्ट्रपति से यह सवाल पूछ रही है कि बता हमारे बच्चे कालाजार बीमारी से क्यूँ मर गए ? मै आपको उन बदनसीब इंसानो से मिलाना चाहता हूँ जो अपनी शिकायत या समस्या का हल ढूंढने में खुद को लाचार पाता है.musaher

मै आपको यहाँ इसलिए बुलाना चाहता हूँ क्योकि पिछले 10 सालो में 3600 से अधिक पत्रो द्वारा की गई हमारी फरियाद उस पत्थर दिल्ली के आगे तुनक मिज़ाज़ शीशे की तरह टूट कर चूर – चूर हो जाती है.

मैं आपको यह सब इसलिए कह रहा हूँ क्योकि बचपन से लेकर आज तक मैं ऐसे लोगो से घिरा हूँआ हूँ जो अपनी जिंदगी की परछाइयों में मौत की तस्वीर तथा कब्रो के निशान देखते है. जो भोजन के आभाव में और काम की अधिकता के कारण मर रहे है ! जिनका जन्म ही अभाव में जीने और फिर मर जाने के लिए हूँआ है. ये लोग इस सवाल का जवाब खोज रहे है कि मेरी जिंदगी की अँधेरी नगरी की सीमा का अंत कब होगा ? हम उजालों की नगरी की चौखट पर अपने कदम कब रखेंगे ?

लिहाजा ऐसी निर्णायक घड़ी में आप हमारे आमंत्रण को ठुकराईए मत क्योकि यह सवाल क्योकि यह केवल हमारे चिंतित होने या न होने का प्रश्न नहीं है. यह केवल हमारे मिलने या न मिलने का प्रश्न नहीं है. बल्कि यह हमारे गावं में कालाजार बीमारी से असमय मरने वाले नागरिक के जीवन मूल्यों का प्रश्न है. यह उन मरे हूँए लोगो के अनाथ मासूमों का प्रश्न है ! यह उन मरे हूँए इंसानो के विधवाओं एवं विधरो का प्रश्न है. यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र सरकार की संवैधानिक जिम्मेवारी का प्रश्न है ! यह हमारे द्वारा भेजे गए उन हजारो चिठ्ठियों का प्रश्न है जिसमें हमने अपने गावं के गरीबों की जान बचाने की खातिर मुल्क के राष्ट्रपति से दया की भीख मांगी थी.
इसलिए देश और मानवता के हित में कृपया हमारा आमंत्रण स्वीकार करे !
धन्यवाद
दिलीप कुमार
अरुण कुमार
सीतामढ़ी (बिहार)
+919334405517

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  • Published: 3 years ago on October 29, 2014
  • By:
  • Last Modified: October 29, 2014 @ 10:16 am
  • Filed Under: मीडिया

1 Comment

  1. mahendra gupta says:

    मीडिया को वहां पहुँचने की फुर्सत कहाँ हैं?वह तो शहरों में ही नेताओं के पीछे चक्कर लगाती है,सुशासन बाबू के राज में, और अब उनकी खड़ाऊँ सरकार में ऐसा सुन देख कर बड़ा अचरज होता है. गरीबों के मसीहा लालू राज में भी यही हाल रहा केंद्र सरकार कहाँ कहाँ जाएगी चाहे वह किसी भी दल की क्यों न हो। वस्तुतः यह दशा समाज और सरकार दोनों के लिएचिंतनीय व लज्जाजनक है

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