/काले धन का टेंटुआ कोई क्यों पकड़े..

काले धन का टेंटुआ कोई क्यों पकड़े..

तो सवाल यह है कि क्या काले धन को हम सही जगह ढूँढ भी रहे हैं या बस ढूँढते रहने का नाटक ही कर रहे हैं? काला धन क्या केवल विदेशी बैंकों में ही है? काला धन क्या देश में नहीं है? विदेश में काला पैसा पकड़ पाना इतना आसान नहीं है, यह बात बिलकुल साफ़ है! फिर भी चलिए, जब आप वहाँ से पकड़ पाइएगा, तो पकड़िएगा, लेकिन पहले तो आप यह बताइए कि देश में जमा काला धन पकड़ने के लिए पिछले छह महीनों में आपने क्या किया? आप कहेंगे कि पिछले 67 साल में किस सरकार ने क्या किया? आपका सवाल बिलकुल सही है. किसी ने कुछ नहीं किया. आपसे भी यह सवाल बिलकुल नहीं किया जाता, अगर आपने अपने चुनाव प्रचार में बड़े-बड़े दावे न किये होते!

-क़मर वहीद नक़वी||
सुना है, सरकार काला धन ढूँढ रही है. उम्मीद रखिए. एक न एक दिन काला धन आ कर रहेगा! अगर कहीं मिल जायेगा, तो ज़रूर आ जायेगा! न मिला तो सरकार क्या कर सकती है? उसका काम ढूँढना है, काले धन का पता लगाना है, सूँघना है कि काला धन किस विदेशी बिल (बैंक) में छिपा हो सकता है! सरकार सूँघ रही है. उसे गन्ध लग गयी तो सारा काला धन खींच लायेगी! लोग बेमतलब सरकार पर शक कर रहे हैं कि सरकार को साँप सूँघ गया! हो सकता है कि काले धन को ही साँप सूँघ गया हो, इसलिए अब वह किसी विदेशी बैंक में दिख नहीं रहा है!image5

फिर वही लिस्ट!
पहले यूपीए की ‘करमजली’ और ‘निठल्ली’ सरकार ढूँढ रही थी! उसे भी काला धन नहीं मिला. एक लिस्ट मिली कुछ बरस पहले. तब से वह सरकार उसे सूँघने में लगी थी. फिर अलादीन का चिराग़ लेकर मोदी सरकार आ गयी! पूर्ण बहुमत वाली! मज़बूत! पक्के इरादों वाली! लोग बड़ी raagdesh-the-story-of-Indian-and-foreign-black-moneyउम्मीद से थे. देखना अब चुटकी बजाते ही चमत्कार हो जायेगा! लेकिन बेचारी सरकार के पास तो बस एक लिस्ट थी, जो उसे पिछली सरकार से मिली थी. सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने अपना काम सम्भालते ही जून में एसआइटी बना दी और लिस्ट उसे सौंप दी! तालियाँ बजीं! इसे कहते हैं चुस्त सरकार! अब आ जायेगा सारा काला धन! छह महीने बाद सुप्रीम कोर्ट के कहने पर सरकार ने बड़ी ना-नुकुर के बाद फिर वही पुरानी लिस्ट कोर्ट में जमा कर दी. वाया सुप्रीम कोर्ट वही लिस्ट फिर से एसआइटी के पास पहुँच गयी!
बस तब से अब तक में एक फ़र्क़ है. तब नहीं खुली थी, लेकिन अब लिस्ट की पोल खुल चुकी है! यही कि लिस्ट में आधे तो एनआरआइ ही हैं, जिन पर देश के टैक्स क़ानून तो लागू ही नहीं होते! बाक़ी बची लिस्ट में बहुत-से खातों में एक दमड़ी भी नहीं है. सारा पैसा बरसों पहले ही कहीं और ठिकाने लगाया जा चुका है. बाक़ी बचे कुछ खातों में कुछ तो क़ानूनी रूप से बिलकुल सही बताये जा रहे हैं, कुछ पर कार्रवाई हो कर पहले ही जुर्माना वग़ैरह वसूला जा चुका है और जो बचे-खुचे ‘काले’ खाते हैं भी, उनमें कुछ ज़्यादा बड़ी रक़म नहीं पड़ी है!

न राई निकली, और न निकलेगी!
यानी कहा आपने पहाड़, निकली राई भी नहीं! और निकलेगी भी नहीं! पिछले बीस-पच्चीस बरसों में अब तक की तमाम सरकारें टैक्स चोरों को पकड़ने के लिए अस्सी से ज़्यादा देशों के साथ सन्धियाँ कर चुकी हैं. लेकिन इन सन्धियों के बावजूद कितना काला धन पकड़ा जा सका? कितने टैक्स चोर पकड़े जा सके? चलिए मान लिया कि एनडीए की पिछली वाजपेयी सरकार के साथ-साथ यूपीए, नेशनल फ़्रंट, थर्ड फ़्रंट वग़ैरह-वग़ैरह की तमाम सरकारें बड़ी ढीली थीं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकीं. मोदी सरकार बड़ी कड़क है. कुछ न कुछ ज़रूर करेगी. बस धीरज रखिए. सरकार को थोड़ा समय दीजिए. बिलकुल ठीक बात है. छह महीने में कोई सरकार कुछ भी चमत्कार नहीं दिखा सकती. समय लगता है. जी हाँ, समय तो लगेगा बशर्ते कि सरकार ने कुछ शुरुआत तो की हो? और फिर क्या काला धन वहीं है, जहाँ सरकार उसे ढूँढ रही है? और फिर क्या काले धन को ढूँढते-ढूँढते सरकार जब तक वहाँ पहुँचेगी, क्या तब तक काला धन वहीं पड़ा रहेगा कि आइए सरकार और मुझे पकड़ लीजिए!

खाते बन्द करने की सलाह!
अभी हाल में ही ख़बर आयी है कि कई स्विस बैंकों ने अपने ग्राहकों को सलाह दी है कि अगर वह अपना नाम सामने नहीं आने देना चाहते तो अगले दो महीनों में अपने खाते बन्द कर दें. ज़ाहिर है कि यह पैसा या तो वहाँ से सरकाया जा चुका है या बस अब सरकने ही वाला है! तो इस बात का किसके पास क्या हिसाब है कि विदेशी निवेश के रास्ते शेयर बाज़ार के ज़रिए कितना काला धन देश में पहले ही वापस लौट चुका है! और इस बात का कौन हिसाब लगा सकता है कि देश में सोने के भंडार में लगातार होती रही बढ़ोत्तरी के पीछे काले को सफ़ेद करने की कितनी कहानी है?

देसी काला धन क्यों नहीं ढूँढते?
तो सवाल यह है कि क्या काले धन को हम सही जगह ढूँढ भी रहे हैं या बस ढूँढते रहने का नाटक ही कर रहे हैं? काला धन क्या केवल विदेशी बैंकों में ही है? काला धन क्या देश में नहीं है? विदेश में काला पैसा पकड़ पाना इतना आसान नहीं है, यह बात बिलकुल साफ़ है! फिर भी चलिए, जब आप वहाँ से पकड़ पाइएगा, तो पकड़िएगा, लेकिन पहले तो आप यह बताइए कि देश में जमा काला धन पकड़ने के लिए पिछले छह महीनों में आपने क्या किया? आप कहेंगे कि पिछले 67 साल में किस सरकार ने क्या किया? आपका सवाल बिलकुल सही है. किसी ने कुछ नहीं किया. आपसे भी यह सवाल बिलकुल नहीं किया जाता, अगर आपने अपने चुनाव प्रचार में बड़े-बड़े दावे न किये होते!
सब जानते हैं. बच्चा-बच्चा जानता है कि अपने देश में काला धन कहाँ खपता है. रियल एस्टेट में, फ़र्ज़ी कम्पनियों में, नाना प्रकार के रंग-बिरंगे ट्रस्टों में और राजनीति में! अब आप बताइए कि इन चार जगहों पर काले धन की खपत रोकने के लिए अब तक क्या क़दम आपने उठाये हैं? और अगर अब तक नहीं उठाये हैं तो क्यों? क्या काला धन यहाँ नहीं है, इसलिए इसकी ज़रूरत नहीं! या ये क़दम इतने कठिन हैं कि उठ नहीं सकते? बड़ी पुरानी कहावत है. अच्छे काम की शुरुआत पहले अपने से करो! तो क्यों न पहले राजनीति से काले धन के सफ़ाये के लिए ‘स्वच्छता अभियान’ चलाया जाये?

राजनीति, रियल एस्टेट और बेनामी कम्पनियाँ
आसान काम है! राजनीतिक दल एक भी पैसा बेनामी न लें. पाँच रुपये का चन्दा भी लें तो देनेवाले की पहचान, नाम, पता सब रिकार्ड में हो. आडिट हो तो दानदाताओं की पहचान स्थापित हो सके. यह पहला क़दम है. क्यों नहीं उठ सकता है? क्या दिक़्क़त है? तो पहले अपने आपको काले धन से ‘मुक्त’ कीजिए, फिर दूसरों का काला धन पकड़ना बहुत आसान हो जायेगा!
फिर रियल एस्टेट! देश में सबसे ज़्यादा काला धन अगर कहीं लगा है तो यहीं लगा है. आम आदमी से लेकर धन्ना सेठों और छोटे-बड़े राजनेताओं तक रियल एस्टेट के कितने सौदे काले पैसे के बिना नहीं होते, यह किससे छिपा है? राबर्ट वाड्रा जैसे कितने राजनेताओं या उनके रिश्तेदारों का रियल एस्टेट के धन्धे से क्या रिश्ता है, यह कौन नहीं जानता? तो क्या इसीलिए इस सेक्टर में काले पैसे की बाढ़ रोकने के लिए न तो पिछली सरकारों ने कुछ ठोस किया और न मौजूदा ‘करिश्मों’ वाली सरकार ने?
काला धन फ़र्ज़ी और बेनामी कम्पनियों के ज़रिए भी धुलता है! (अब यह अपने गडकरी जी की दरियादिली ही रही होगी कि उन्होंने ‘सफ़ेद धन’ वाली कम्पनी में भी अपने ड्राइवर को डायरेक्टर बना रखा था! बड़े लोगों के बड़े दिल होते हैं!) बहरहाल, अब एक और नया काम इन ‘बेनामी’ कम्पनियों से जुड़ गया है. घूस लेने का. फ़र्ज़ी कम्पनी बना लो, फिर कई और फ़र्ज़ी कम्पनियों के मकड़जाल से होते हुए ‘घूस’ के पैसे को कम्पनी में ‘निवेश’ या ‘क़र्ज़’ के रूप में दिखा दो. घूस भी हो गयी और काले का सफ़ेद भी हो गया. अब यह बड़ी-बड़ी घूस किनको दी जाती है? या तो बड़े-बड़े राजनेताओं को या बड़े-बड़े अफ़सरों को? क्या इसलिए ऐसी कम्पनियों की निगरानी की ज़रूरत कभी महसूस नहीं की गयी? फिर आते हैं बड़े-बड़े ट्रस्ट. इनमें से बहुत-से ‘धार्मिक’ ट्रस्ट हैं या फिर ‘समाजसेवी.’ अब इन पर कौन हाथ डाले?
तो अब बात आपको समझ में आ गयी होगी कि काले धन के ख़िलाफ़ ‘असली’ मुहिम आज तक कभी क्यों नहीं शुरू हुई और कभी भी क्यों शुरू नहीं होगी? काला पैसा देश में हो या विदेश में, राजनीति और राजनीतिक दलों से उसके गहरे रिश्ते हैं. इसलिए पार्टी कोई हो, सरकार कोई हो, बातें कितनी भी हों, काले धन का टेंटुआ कोई क्यों पकड़े? वरना अगर ऐसी बात नहीं तो क्या परेशानी है? आज के डिजिटल युग में कोई सरकार इसे रोकना चाहे तो चुटकियों में रोक सकती है! हमारे प्रधानमंत्री जी तो डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, उनके लिए तो यह काम बेहद आसान है, बशर्ते कि वह करना चाहें!

(राग देश)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.