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हाँ मैं एल्कोहोलिक हूँ..

By   /  November 3, 2014  /  No Comments

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-मनीष शुक्ला||
अपने देश की प्रधान सेवक हर महीने के पहले रविवार को पूरे देश के साथ अपने ‘मन की बात’ साझा करते हैं. इत्तफाकन एक चर्चा देख/सुन रहा था, जिसमें इसी बात पर चर्चा चल रही थी. पता चला कि अगले ‘मन की बात’ में युवाओं में बढ़ती नशाखोरी पर बात की जायेगी. इससे निपटने के लिए जनता का सुझाव भी आमंत्रित किया गया है.
रिमोट का एक बटन टीपते ही चैलन चेंज- अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म ‘शौकीन’ का गाना आ रहा था. नायक नाच-गा-बजाकर, डंके की चोट पर कह रहा है कि “हाँ मैं एल्कोहोलिक हूँ,अपना पीता हूँ, किसी के बाप का नहीं.” अब तो ‘पटियाला पैग’ भी गुजरे ज़माने की बात हो गयी. आजकल “चार बोतल बोद्का, काम मेरा रोजका”. घर तो घर ‘इन द बार-इन द कार’ जहाँ मन करे वहाँ पीजिये सरकार. ‘जानी-जानी’ का नया वर्जन तो आप सबने सुना ही होगा, बच्चों की कविता का भी ऐसा संशोधित रूप. क्या स्पीड है अपनी. नर्सरी से ही. अच्छा है.Akshay-Kumar-In-The-Shaukeens-Poster-Wallpaper-5301

मूरख हैं वे जो यह सोचते/कहते हैं कि फ़िल्में इत्यादि नयी पीढ़ी को बिगाड़ रहे हैं, उनकी बातों में कुछ हद तक सच्चाई हो सकती है. फिल्मों से आज वही लोग सीख रहे हैं जो तथाकथित विकास के आख़िरी पायदान पर खड़े हैं. बाकी लोग तो फिल्मों को सिखा रहे हैं, उनके लिए मशाला दे रहे हैं. अगर फ़िल्में उनकी सच्चाई दिखा दें तो ‘घूरे पर रखा चादर हट जायेगा’. ओह माफ़ कीजिये – अगर फ़िल्में सच्चाई दिखा दें तो देश के सामर्थ्यवान युवा वर्ग जो देश के ईंधन और इंजन हैं, उनके पराक्रम और क्षमता से पूरा विश्व अभिभूत हो जायेगा. अभी तो सिर्फ विश्वविद्यालय ही अभिभूत हो रहे हैं.

आज का जो युवा है वह हर लम्हे को एक तारीख बनाने की जिद से साथ जगता है. दिन के हर छोटे-बड़े कतरे को जोड़कर लार्ज कोक्टेल के बिना जीने को वह जीना नहीं मानता है. दिन के जुनून का झंझावत तो ‘रेड बुल’ संभाल लेता है लेकिन 8 PM के बाद उसकी ‘Royal Stag’ की इच्छा लाजमी है. बूढ़े मठाधीशों (Old Monk) की समझ से परे है यह बात. आखिर बाजार में Arrack, Baijiu, Gin, Mezca, Palinka, Rum, Vodka, Whiskey, Brandy, Horilka, Cognac, Tequila, Guaro जैसे दर्जनों विकल्प और फिर उनके सैकड़ों ब्रांड उपलब्ध हैं और इन सबके साथ न्याय करने के लिए हिस्से में आती है सिर्फ एक जिन्दगी. उस पर यह नैतिक पाबंदी. आखिर कहाँ का न्याय है यह?

एक सीधी बात – साहब आपने ‘रेवेन्यू’ के बारे में क्या सोच रखा है. क्या आपको इस बात का इल्म नहीं हैं कि पीने वाले अपनी जान को जोखिम में डालकर देश का कितना भला करते हैं. लोककल्याण की भारी-भरकम योजनाओं के रकम का इन्तजाम कहाँ से होता है. माना ढेरों अन्य प्राप्तियाँ हैं लेकिन इस महत्वपूर्ण योगदान को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. हमारी तो यही ख्वाहिश है कि हमें रोजगार देने वाली कम्पनियाँ अपना ‘पैकेज’ बढ़ाएं और सरकार एल्कोहल पर ‘ड्यूटी’ बढ़ाये ताकि हम सब पानी से ज्यादा शराब पिएँ और देश के विकास में खून-पसीने और शराब से अपना योगदान से सकें.

ठीक है, सीधी बात समझ में नहीं आती तो जरा फ्लैशबैक बैक में जाइये. वैदिक काल के ‘सोमरस’ और कबीर के ‘कलाली’ की बात नहीं कर रहा, ये सब ज्यादा पुरानी बात हो जाएगी. आप तो बस आजादी के आस-पास से ही देखना शुरू कीजिये और हमें बताइए कि क्या ‘मधुशाला’ हमारी पीढी के लोगों ने लिखा है. समय निकाल कर इन गीतों को भी सुन लीजियेगा, नशा और नशाखोरी का अदिरूप देखने के लिए! इनकी लिस्ट तो काफी लम्बी है लेकिन दो सुरीले गाने ही चुने हैं.

“छेड़ा मेरे दिल ने तराना तेरे प्यार का, जिसने सुना खो गया- पूरा नशा हो गया.”
“ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए. ख़ूबसूरत सी कोई हमसे खता हो जाए..”

मुझे पता है आपके पास बहानों की कमी नहीं है. आप कहेंगे की यहाँ नशा जरूर है लेकिन एक तरह की सात्विकता भी है, जो ‘कमांडर’ का काम करती है. जनाब यह तो वही बात हुयी कि “आप करें तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला”. जबकि फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी स्पीड थोड़ी ज्यादा हो गयी है और आप गठिया-बाई-बताश से पीड़ित हैं. कोई नहीं. उम्र है. समय है. होता है.

तो मित्रों मुख्य सबक यह है कि आप सब जमकर सिगरेट और शराब का सेवन कीजिये और देश के विकास में महत्वपूर्ण भागीदार बनिए. हाँ नाखूनों के बीच में दबाकर या नोट के रोल से नाक के रस्ते लिए जाने वाले नशों से बचिए. इससे हमारी सरकार को कोई लाभ नहीं मिलता. मतलब रेव पार्टीज में आप जो कुछ लेते हैं, उसको चाहें तो छोड़ सकते हैं. तो फिर आज शाम का क्या प्लान है?

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  • Published: 3 years ago on November 3, 2014
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  • Last Modified: November 3, 2014 @ 8:32 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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