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अवसरवादी राजनीति के दो प्रत्यक्ष उदाहरण..

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-अनुराग मिश्र||
कहा जाता है कि राजनीति में न कोई स्थायी दुश्मन होता है न दोस्त। विगत दिनों में घटे दो राजनैतिक घटनाक्रम इसकी पुष्टि भी करते है। पहली घटना मुंबई विधानसभा की है जहाँ बीजेपी के बहुमत के रास्ते को आसान करने के लिए महाराष्ट्र में बीजेपी की चिर दुश्मन रही एनसीपी ने सदन से वाक् आउट कर दिया। और दूसरी घटना कुछ दिन पहले की है जब केन्द्रीय राजनीति एक दूसरे को फूटी आँख ना सुहाने वाले तीन राजनैतिक दल सपा, राजद और जनता दल यूनाइटेड ने हाथ मिला लिया।namo pawar
दरअसल उपरोक्त दोनों घटनाये अवसरवादी राजनीति का प्रत्यक्ष उदाहरण है जहाँ राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए सारी मर्यादाएं तोड़ दी जाती है और कहा ये जाता है कि जनता के हित के लिए ये फैसला लिया गया है।
आज अगर एनसीपी ने बीजेपी को महाराष्ट्र में बचाया तो उसके पीछे सीबीआई का वो डंडा है जिसका उपरी सिरा मोदी के रूप में बैठी बीजेपी की केन्द्रीय सरकार के हाथ में है और लालू, मुलायम और शरद यादव ने हाथ मिलाया तो उसके पीछे मोदी आंधी में खिसकते जनधार और उस जनधार के दम पर बने अपने राजनैतिक अस्तित्व को बचाने की छटपाटाहट है। ऐसे में जनहित कहाँ छुपा है ?
वस्तुतः ये राजनैतिक विघटन काल का दौर है जहाँ वैचारिक सिद्धांतों की राजनीति काफी पीछे छूट गयी है और साथ रह गयी है तो सिर्फ अवसरवादी राजनीति। इस अवसरवादी राजनीति से कोई भी दल और उसका नेता अछूता नहीं रहा है। फिर वो चाहे जनहित को सर्वोपरि मानने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही क्यों न हो।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावो के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि जब तक महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस रहेगी महाराष्ट्र का भ्रष्ट्राचार मुक्त हो पाना असंभव है।
फिर आज ऐसी क्या मज़बूरी आ पड़ी कि आपको कि अपनी सरकार बनाने के लिए उसी भ्रष्टाचारी पार्टी का सहारा लेना पड़ा जिसकी आलोचना कल तक सार्वजनिक रूप से करते थे। क्यों नहीं आप अपने सिद्धांतों पे अडिग रह पायें? क्यों नहीं आप ये कह पायें कि भले ही महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग जाये या फिर से चुनाव हो जायें हम एनसीपी जैसी भ्रष्टाचारी पार्टी का सहयोग नहीं लेंगे?
अपने समर्थन में आप ये कह सकते है कि पुनः चुनाव में जाने पर जनता पर एक और चुनाव का बोझ पड़ता जो महाराष्ट्र के हित में नहीं था, पर सच तो यह है आप भी उसी रास्ते पर चलना चाहते हैं जिस रास्ते पर 70 दशक के बाद से भारतीय राजनीति चलती आ रही है। पर समय बदल चुका है और जनता हर खेल को  बाखूबी समझ रही है।
वो ये जरुर जानना चाहेगी कि परदे के पीछे की राजनीत क्या है ? एनसीपी के अप्रत्यक्ष व अघोषित समर्थन का क्या और कितना मूल्य महाराष्ट्र की सरकार चुकाएगी और इसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कितना मूल्य जनता को चुकाना होगा क्योकि राजनीत में हमेशा गिव एंड टेक का फार्मूला चलता है। किन्तु प्रतीत तो ये होता है कि आप महाराष्ट्र बदलने आये थे और खुद ही बदल गए।
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