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सुख की ओट में छिपा दुख

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-सैयद एस.तौहीद||
लघु फिल्म बनाने वाले उभरते व युवा फिल्मकारों के समक्ष अपने प्रोजेक्ट को लेकर अनेक दुविधाएं होती हैं. वो कल को लेकर असमंजस में रहते हैं. फिल्म का निर्माण, अंतिम प्रारूप किस तरह का होगा, क्या वो फिल्म सामारोहों का मुंह देख सकेगी ? दर्शकों की प्रतिक्रिया क्या होगी ? क्या दर्शक उसे स्वीकार करेंगे? इस किस्म के बहुत से सवाल युवा फिल्मकारों के मन में होते हैं. साहस के धनी लोग सभी आशंकाओं को पार कर फिर भी फिल्में बनाते हैं. जुनून के धुनी लोगों के काम को प्रशंसा भी मिलने लगती है. आशंकाओं का अंधकार मिट भविष्य की राहें आसान सी हो जाती हैं. इस संदर्भ में युवा फिल्मकार Jon Olav Stokke की फिल्म ने सराहनीय काम किया. मन में कभी कभी सवालों का जखीरा सा रहता है. जिंदगी की धूप-छांव को देखकर सवाल बनने लगते हैं. सुख किसे कहते हैं ? सुख की परिभाषा क्या हो सकती है? क्या व्यक्ति की क्षणिक खुशी को सुख कह सकते हैं ?
इत्र की बूंद का असर सारे पानी को खुश्बूदार कर देता है. इत्र की तरह ही खुशी का एक टुकडा भी महान होता है. खुशी से भरा एक लम्हा सुख से परिचय बन जाया करता है. मन उसके सांचे ढल जाता है. खुशी के लम्हें कभी कभी पल में पराया कर दिया करते हैं. खुशी छीन जाने का डर सुख का अनुभव बाधित कर देता है. व्यक्ति वर्त्तमान का मजा ठीक से नहीं उठा पाता है. क्योंकि लोग यह भी मानकर चलते हैं कि खुशी अथवा सुख के विपरीत छोर पर उदासी अथवा दुख खडा रहता है.Jon Olav Stokke

फिर जब मायूसी अथवा उदासी गले पड जाए तो उसे भी ठीक से पहचान नहीं पाते हैं. क्या यह वही दुख था जो मिलना था ? यह उलझन पेश न आए इसलिए खुशनुमा लम्हों में गम के काजल लगा कर चलना बेहतर होता है. सुख को पूरा पा लेने का हट उसके लम्हे का मजा नहीं उठाने देगा. समुद्र से सारे सिक्के पा लेने की चाहत में हांथ में आया सिक्का भी काला पड सकता है. अंधकार के लिए हम भी जिम्मेदार होते हैं. दर असल आदमी के हिस्से का सुख-दुख उसकी आशंकाओं व विश्वास में छिपा होता है. धूप-छांव सवालों की ओट में सांस लेती रहती है. मन में घिरने वाली अनावश्यक आशंकाएं विश्वास को भीतर से डामाडोल कर देने के लिए पर्याप्त होती हैं . सवालों के जवाब कभी मिलते कभी नहीं मिला करते हैं . लेकिन मन में उठने वाले सभी सवाल बेकार नहीं हुआ करते. सवाल करना चाहिए,जब जबान पर तरसता रहे फिर समय नही देखना चाहिए. आदमी के मन मंदिर में उभरने वाले सवालों के ताने-बाने में उलझी जान स्टोक की शार्ट फिल्म ‘The Station Master’ देखने लायक है. फिल्म महोत्सवों में चर्चा बटोर चुकी इस फिल्म की बारिकियों को देखकर नहीं कह सकेंगे कि इसे बीस-इक्कीस बरस के युवा विद्यार्थी ने बनाया है. मूलत: नार्वे निवासी स्टोक ने इसे स्नातक के अंतिम वर्ष में प्रोजेक्ट स्वरुप बनाया था . आज से दो बरस पहले बनी इस लघु फिल्म से गुजरते हुए महान फिल्मकारों की याद आएगी. जान भी इसे उस गंभीरता से नहीं ले रहे थे जो महान चीजों से जुडी होती है. बेशक कडी मेहनत की…दिल लगा कर काम किया. छात्र होने के नाते तमाम दुविधाओं ने घेरा…लेकिन पार हो गए.the station master

प्रस्तुत फिल्म का हर शाट एक मंझे हुए फिल्मकार की आहट देती है. पचास दशक के सुदूर इंगलिश गांव में स्थित रेलवे स्टेशन पर यह कहानी पेश आई है. कहानी अकेले अनजान स्टेशन में कार्यरत स्टेशन मास्टर की है. पटकथा उसकी नीरस जिंदगी के किसी दिन की है. वो इस सुदूर जगह में पिछले दो दशक से कार्यरत था. यह आदमी सरीखा इंगलीश लोगों के मिजाज का था. आशय उदास शांत एकांत में रहने वाला शख्स . ईश्वर से मिली किस्मत व हालात को चुपचाप मान लेने वाला आदमी. ऊपरवाले ने जिस हालात में रखा उसी हाल में रहो… इस किस्म का व्यक्तित्व. स्टेशन से सटे ही उसका छोटा सा घर था. उसके मौजूदा हालात को देखकर निर्धन आदमी की तस्वीर बनती थी. सुदूर एकांत स्टेशन पर आने जाने वाली गाडियां भी गिनती की थी. सारी दुनिया से अलग पडे स्टेशन व स्टेशन मास्टर की जिंदगी में उस मेहमान के आने तक कोई हलचल नहीं थी. एक खूबसुरत मेहमान के वहां आने से कहानी रुमानियत के खुशनुमा लम्हों में चली जाती है. एक स्त्री के आने से उसकी जिंदगी रोचक मोड लेती है. उसका आना सपने सी दुनिया का आभास दे रहा था. सपनों सी यह दुनिया उसके स्टेशन पर आकर बैठी. एक दोपहर वो मेहमान वहां पहुंचा. शायद आगे भी जाना था… किसी गाडी के बारे में स्टेशन मास्टर से जानकारी ली उसने. उसे एक रूखा सपाट जवाब ‘अगली सुबह आएगी’ देकर आगे निकल गया. वहां बैठकर इंतजार करने का विकल्प ही उसके पास था. प्लेटफार्म में एकांत इंतजार करने लगी. स्टेशन मास्टर ने उसे अपने घर ठहरने का न्योता नहीं दिया था. दो दशक से भी अधिक समयकाल तक अकेला गुज़ार देने से जीवन को लेकर नीरसता व उदासीनता का भाव उसमें प्रबल था. एक तरह का संयासभाव उसे जिंदगी के स्वाद से वंचित रख रहा था. उस महिला अने उसके जीवन में आशावान लम्हों की शुरुआत कर दी थी. स्टेशन मास्टर की व्यर्थ सी दुनिया में हलचल दस्तक दे चुकी थी. बारिश ना पेश आई होती तो दोनों जिंदगी कभी न मिलने वाले मोड बन गए होते. बारिश ने उदास स्टेशन मास्टर को जिंदगी से मिलाया. बारिश में अकेली इंतज़ार कर रही इस महिला को आखिर अपने घर चलने का आग्रह करता है. जिंदगी की दो राहों के मिलने का इत्तेफाक हुआ. घर में आए मेहमान के सामने वो नपा-तुला आचरण बना कर चल रहा था. उसने सोच रखा था कि मेहमान का दिल नहीं दुखाएगा. इस खूबसुरत मेहमान ने उसकी बेजान जिंदगी में हरकत ला दी थी . उथल-पुथल के इन लम्हों में रात कब निकल गयी…मालूम न चला. अगली सुबह स्टेशन मास्टर के लिए बदला हुआ सवेरा थी. लेकिन मेहमान को आज जाना था. वो सुबह आ चुकी थी जिसके इंतजार ने दो लोगों को मिलाया था. मेहमान को स्टेशन पर विदा करने का वक्त आ गया था. गाडी का वक्त हुआ…महिला उस पर सवार हुई. इंजन ने आवाज लगाई और गाडी हरकत हुई. अभी बढी ही थी कि स्टेशन मास्टर ने ऊंची पुकार में पूछा कि क्या तुम फिर लौटोगी ? शायद उससे मिलकर बिछडने बाद फिर से मिलने की चाहत प्रबल थी. गाडी वहां से जा चुकी थी…उस दिन से आगे बहुत दिनों तक वो इंतजार करता रहा. मेहमान ने उसकी जीवन के सफर में नया मोड जोड दिया था. लंबे समय तक इंतजार बाद भी निराशा हांथ लगने पर स्टेशन मास्टर पहले से ज्यादा उदासीन हो गया. हल्की सी हलचल बाद जिंदगी फिर से पुरानी हो गयी. अपनी पुरानी दुनिया को स्वीकार करने को विवश स्टेशन मास्टर पर फिल्म समाप्त हो गई.

रेलवे ड्राईवर बेंजामीन नोबेल समेत केवल तीन किरदारों की इस शार्ट फिल्म में संवाद बेहद जरूरत के हिसाब से नजर आए. कहानी का सुत्रधार रेलवे ड्राईवर के जुबानी कही गयी . छात्र फिल्मकार जान स्टोक की कहानी प्रेम कहानियों से अलग मिजाज की रही. प्रेम कहानी का भाव लिए लेकिन फिर भी पीडा देता अंत . फिल्मकार ने कहानी एव उसके दो किनारों को अधूरे मोड पर रोक दिया…लेकिन देखने वाले की उम्मीदों को जिंदा रखा. दर्शक दोनों की आगे की जिंदगी के बारे में सपने सजाने को स्वतंत्र था. जान को अपने इस प्रोजेक्ट फिल्म की प्रेरणा अपने शिक्षक फिल्मकार जिम ओ ब्रायन से मिली. जिम की फिल्म ‘The Jewel in the Crown ’ उदगम बिंदु रही. जिम की फिल्म भारत के पुरानी रेलगाडियों में भाप इंजनों से चलने वाली को फिल्माया था. पचास दशक के समयकाल कहानी का समयकाल था. उस जमाने की रेलगाडियों को शार्ट फिल्म में सत्यता से शामिल करने का जज्बा जान को शिक्षक से मिला. पचास दशक के समकालीन विश्व में भाप इंजनों का चलन था. अभिनय के लिहाज से भी स्टेशन मास्टर शानदार थी. शीर्षक किरदार निभाने वाले शेन एटवुल की प्रशंसा करनी चाहिए कि आप ने दिल से किरदार को जीया. महिला यात्री की भूमिका नादिया केमरुन का अभिनय भी संतुलित था.

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