/सारे जहां का दर्द..

सारे जहां का दर्द..

हिंदी के नायाब व्यंग्यकार शरद जोशी ने 31 साल पहले एक मारक व्यंग्य लिखा था, जब देखा कि इंदिरा गांधी बहुत विदेश जाती हैं। आज वह व्यंग्य कितना प्रासंगिक जान पड़ता है जब नरेंद्र मोदी ने छह महीने में हर प्रधानमंत्री का कीर्तिमान तोड़ दिया है। बरबस वह आलेख याद आया। शरदजी की बेटी नेहा शरद का आभार जिन्होंने तुरंत उपलब्ध करवा दिया। शरदजी आज होते तो शायद कलम ही न तोड़ देते! 

-शरद जोशी||
देश के लिए यह सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की, मगर यह सच है कि भारत के प्रधानमंत्री के पद का दर्जा कुछ महीनों से बहुत तेजी से उठ गया है। जो साधारण सड़कछाप वोटर इस गलतफहमी में थे कि वे अपने लिए एक एमपी या देश का प्रधानमंत्री चुन रहे हैं, उन्हें यह पता लगना चाहिए कि दरअसल उन्होंने एक विश्वनेता चुना था, जो इस समय संसार की समस्याएं सुलझाने में लगा है।sharad joshi
संसार में समस्याएं बहुत अधिक हैं, मगर खेद है कि यह देश अपनी संवैधानिक मजबूरियों के कारण केवल एक प्रधानमंत्री संसार को सप्लाई कर सकता है। काश, हमारे पास चार-पांच प्रधानमंत्री होते, तो हम उन्हें पूरी दुनिया में फैला देते। और तब शायद यह भी संभव होता कि उनमें से एक प्रधानमंत्री हम अपने देश के लिए भी रख लेते, जो असम समस्या, अकाली समस्या, सूखा समस्या, भूखा समस्या टाइप की जो छोटी-मोटी समस्याएं हैं, उनसे माथापच्ची कर लेता। हमारे पास सिर्फ एक प्रधानमंत्री है। इतने सारे देश हैं। उससे जितना बनता है, वही तो करेगा। मुहावरे में कहा जाए, तो अकेली जान क्या-क्या करे! ….
संसार के देश तो चाहते हैं कि हमारे भारत का प्रधानमंत्री पूरे वक्त उनके मुल्कों में ही घूमता रहे और विश्वशांति, परस्पर सहयोग, छोटे देशों की कड़की दूर करने में बड़े देशों का योग आदि नियमित विषयों पर पूरे उत्साह से भाषण देता रहे। अच्छे भाषण सुनना कौन नहीं चाहता! अच्छी अंगरेजी सुनना कौन नहीं चाहता! पर हमारी मजबूरी है कि हमारी प्रधानमंत्री पूरे साल बाहर नहीं रह सकतीं। उन्हें कुछ दिनों देश में भी रहना पड़ता है। लोकसभा का सेशन होता है, कश्मीर में चुनाव आ जाता है। या दीगर ऐसी कुछ बातें हैं, जब भारत के प्रधानमंत्री को भारत में रहना जरूरी है, मजबूरी है। कई बार जवाबी कार्रवाई करने किसी दूसरे देश का प्रधानमंत्री भारत में टपक पड़ता है। तू हमारे देश में भाषण देगा, तो हम तेरे देश में भाषण देंगे बदले की भावना के साथ। उस समय उसका स्वागत तथा दीगर औपचारिकताएं बरतने भारत के प्रधानमंत्री को भारत लौटना पड़ता है। …
भारत का प्रधानमंत्री ऐसी ऊंची चीज है कि वह अब दुनिया का नेता है। वह भारत के काम का नहीं रहा। एक तो ऐसी टुच्ची देसी समस्याओं में उसका माइंड खराब करवाना भी ठीक नहीं है। अगर चाहते ही हो कि भारत का प्रधानमंत्री भारत की समस्या पर ध्यान दे, तो समस्या का लेवल उठाओ। उसे इतनी बड़ी बनाओ कि वह भारत के प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के काबिल लगे। आप चाहते हो कि बंबई की कपड़ा मिलें बंद पड़ी हैं, तो भारत का प्रधानमंत्री उस छोटी-सी बात में लगा रहे। फिर तीसरी शक्ति के देशों की ओर पहली और दूसरी शक्ति का ध्यान कौन चौथी शक्ति खींचेगी, अगर प्रधानमंत्री की एनर्जी बंबई के मजदूरों पर सोचने में चली गई। समस्या का स्तर उठाओ। जब तक वह अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का दर्जा नहीं प्राप्त कर लेती, तब तक कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का नेता उर्फ भारत की प्रधानमंत्री उस पर कैसे ध्यान देंगी?
दूसरी तरीका यह है कि आपस में निपट लो। शांति और सद्भाव से निपटो, तो अच्छी बात है। नहीं, कोई जरूरी नहीं, क्योंकि ये चीजें तो अंतरराष्ट्रीय मामलों में जरूरी होती हैं। जैसे चाहो निपट लो। जब हमारा प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मामले निपटाने में लगा है, तो हम आपसी मामले तो निपटा ही सकते हैं। एक व्यस्त भारतीय प्रधानमंत्री के साथ उसके देश के निवासी इतना सहयोग तो कर ही सकते हैं। उसे तंग मत करो। खुद कर लो, क्या करना चाहते हो।
… वह (विदेश) जाता है। बार-बार एक ही बात को कहने जाता है। और न जाए तो बेचारा क्या करे! इस घटिया देश की दो कौड़ी की समस्याओं में सिर चटवाने से तो किसी अंतरराष्ट्रीय जमघट में बड़ी समस्या पर भाषण देना अच्छा है। भारत का प्रधानमंत्री यही करता है। देश की हालत कुछ भी हो, पर यही हमारी महानता है। सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है।
(साप्ताहिक ‘रविवार’: 24-30 जुलाई, 1983/किंचित सम्पादित)

(वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की फेसबुक वाल से)

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