/एक संत के अंत से उपजे प्रश्न..

एक संत के अंत से उपजे प्रश्न..

-नीर गुलाटी||
एक संत का एक राष्टद्रोही के रूप में अंत होना निश्चित ही एक दुखदाई घटना है. जब में दर्शन के विद्यार्थी के रूप में समाज और इतिहास को पड़ना शुरू किया और दर्शन के मूल बहुत सिद्दांतो और प्रश्नो को समझना शुरू किया तो मेने कई नए तथ्य देखे, जो सामान्य चिंतन में कभी नही आते.
उनमे निम्नलिखित प्रमुख हैं जिनके आधार पर हम संत रामपाल के प्रकरण को समझ सकते हैं.baba-rampal
मनुष्य पहले दुसरो के सम्पतियों को हड़पने के लिए प्रपञ्चात्मक व्यवहार करता है और फिर द्वंद से बचने के लिए प्रपञ्चात्मक व्यवहार करता है.

मनुष्य भौतिक विकास के प्रति जितना सवेंदनशील है उतना सांस्कृतिक विकास के प्रति नही है.
और सबसे मजेदार तथ्य तो यह है कि इतिहास गतिशील है और ऐतिहसिक चिंतन स्थिर.
अब आइये इस प्रकरण पर. एक व्यक्ति साधारण परिवार में पैदा होता है. पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी करता है. धर्म के प्रति आकर्षित होता है कबीर पंथ का अनुयाई बनता है और एक संत बन जाता है.

यहाँ जिस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान रखना जरूरी है वो यह कि 15 शताब्दि में पैदा हुआ कबीर वैदिक चिंतन का एक मुख्य आलोचक था. और भारत में वैदिक चिंतन के खिलाफ प्रतिक्रिया स्वरूप बौद्ध और जैन दर्शन भी पैदा हुए थे. दूसरा 19वीं शताब्दि में आर्यसमाज की स्थापना हुई थी जो वैदिक चिंतन को पुनर्स्थापित करना चाहता था. चूँकि संत रामपाल कबीरपंथ का प्रचारक है और कबीर वैदिक चिंतन का एक आलोचक था इसलिए वैदिक चिंतन और आर्यसमाज कि आलोचना विरासत में मिली थी. और यह आलोचना और आर्यसमाज के साथ मुठभेड़ की घटनाओं ने एक संत को देश द्रोही बना दिया.

बेशक वर्तमान संदर्भ में जिस प्रकार से संत के समर्थको ने पुलिस पर जवाबी हमला किया है उसको देख कर लगता है कि संत ने पहले से इस कि तैयारी कर रखी थी.. इसलिए पुलिस को संत को पकड़ने में इतना समय लग रहा है. इसलिए अब यह मामला सिर्फ अदालत कि अवमानना का नही रहा बल्कि सीधे सीधे देश द्रोह का बन गया है.
एक संत का नैतिक रूप से तो अंत हो ही चुका है. यदि वो शारीरक रूप से जीवित भी है तो इतनी बड़ी घटना के बाद मुझे नही लगता कि वो जीवित पुलिस के हाथ लगेगा और अगर लग भी गया तो देश द्रोह के जुर्म में उसको फांसी कि सजा होना लाज़िमी है.

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जहाँ तक इस प्रकरण में मीडिया से हुई बदसलूकी का प्रश्न है तो निश्चित है यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक है. बेशक इस प्रकार की घटनाओं के फिल्मांकन का मैं भी समर्थन नही करता लेकिन ऐसे हालत में मीडिया को कमेंट्री करने कि छूट तो दी ही जा सकती है.

बहरहाल यह बीजेपी सरकार के लिए एक बहुत बड़ा सबक है कि वो विविध मतों के बीच चल रही बहस मुबाहसे को किस अर्थ में लेती है. क्योंकि बीजेपी भी वैदिक चिंतन को आदर्श मानती है और उसे पुनर्स्थापित करना चाहती है. जबकि वास्तव में ऐसा हो नही सकता. चाहे मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी टैंक पर सवार होकर भारत भ्रमण भी क्यों न कर ले.

अभी तो एक संत है जिसने आर्यसमाज की आलोचना की और प्रशासन ने उसके साथ अन्याय किया और वो देश द्रोही बन गया. वैदिक चिंतन कि आलोचना करते हुए तो भारत में कई प्रकार के मत पैदा हुए हुए है और यदि सब के साथ अनुचित प्रशासनिक व्यवहार होगा तो देश में अराजकता पैदा होना लाज़िमी है. क्योंकि यदि हम आज एक संत को देश द्रोही बनते हुए देख रहे है तो उसका कसूर तो इतना है कि वो एक कबीरपंथी है. और कबीर प्राचीन भारत का एक संत था जिसने वैदिक चिंतन की आलोचना की थी.

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