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सलील दा एक उम्दा संगीतज्ञ ही नहीं बेहतरीन इन्सान भी थे..

By   /  November 19, 2014  /  No Comments

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-सैयद एस.तौहीद||

बंगाल का मार्क्सवादी आंदोलन, हृषीकेश मुखर्जी फिर देश की पहली गीत रहित फिल्म कानून, मलयालम की महान प्रस्तुति चीमन एवं असम के चाय बगानों को एक सुत्र में पिरोने वाले…सलील चौधरी याद आ रहे हैं. असम के चाय बगानों के सान्निध्य में आपका बचपन बीता,पिता यहां पर चिकित्सक थे. मोज़ार्ट-हेडन-बिथोवन की पश्चिमी क्लासिक धुनों में लडकपन गुजार दिया. मुल्क के मुस्तकबिल पर सोंचने वाले पिता की छाया से प्रेरणा पाते हुए चाय बगानों के मजदूरों की दुर्दशा को करीब से जाना.salil_conducting

चालीस दशक के भीषण अकाल ने बंगाल को झकझोर दिया था. विश्व युध से उपजी सिसकियों के बीच राजनीति का क्रूर रंगमंच सलील दा के अनुभवों से गुजरा. भीतर का पीडित अभिवयक्त होने के लिए एक मंच तलाश रहा था. संयोग से मार्कस्वादी विचारों का इप्टा वहां था. सदस्यता लेकर आपने देशभर भ्रमण किया. आमजन की पीडा को गीतों के माध्यम से अभिवयक्त किया… जागरण के गीत का नाम दिया.

फिल्मी दुनिया में सलील दा अपने गुरू बिमल राय के संग आए. बिमल दा की यथार्थवादी ‘दो बीघा जमीन’ से यहां धमक जमाई. तब से लेकर जीवन में सक्रिय रहने तक पचहत्तर से अधिक फिल्मों में संगीत दिया. हिन्दी के अतिरिक्त आपने मलयालम,तमिल,बंगाली,मराठी,गुजराती एवं उडिया फिल्मों में भी सेवाएं दी. पश्चिमी क्लासिक संगीत को भारतीय लोकसंगीत में मिलाकर कारगर फयुजन बनाया.

चलन से हटकर चलने का हौसला लेकर आए थे. इस जोखिम में काम कम मिला… हम साथियों की नक्ल नहीं की. मुडकर देखिए कि आपके संगीत से सजी अनेक फिल्में क्लासिक भी बनी. याद करें दो बीघा जमीन से लेकर मधुमती फिर कानून एवं आनंद व मेरे अपने सरीखा फिल्मों को. इस मार्ग में सलील दा को कलात्मक रूप से बेहद समपन्न फिल्मकारों की फिल्में मिली. बिमल राय बलराज चोपडा बासु चटर्जी राजकपूर हृषीकेश मुखर्जी एवं गुलजार का साथ मिला.

सलील दा की बेहतरीन धुनों पर बात करे तो दो बीघा जमीन से लता जी की लोरी ‘आ जा रे निंदिया’ याद आती है. मधुमती का पुकारता गीत ‘आजा रे परदेसी’ जिसे लता जी ने ही आवाज दी भी खास था. इंतजार के इस ओर खडी मधु के प्यार की राह में जज्बात को शब्दों व संगीत में महसूस किया जा सकता है. वतन की मिटटी से दूर होने की तडप को समझना हो तो काबुलीवाला का ‘अए मेरे प्यारे वतन’ को सुनें. देशभाव के गीतों में मन्ना डे के इस गीत का बडा ऊंचा मुकाम है. देशभक्ति से रूमानियत की तरफ चलने पर मधुमती का लता-मुकेश का युग्ल ‘दिल तडप तडप के’ का गीत सामने आता है. रूमानी गीतों में मधुमती का यह गीत आज भी सुना जाता है. वहीं ‘मेरे अपने’ का ‘हाल चाल ठीक है’ युवाओं की बेरोजगारी एवं उससे जुडी खीज व उन्माद व्यंग्यात्मक रूप में व्यक्त हुए थे. किशोर दा व मन्ना डे के सुरों ने युवाओं के हालात को बडे रोचक तरीके से रखा. मोज़ार्ट के धुनों दीवाने को लेकर आपकी दीवानगी को छाया के गीत ‘इतना ना मुझसे तु प्यार’ में देखा जा सकता है. यह गीत मोज़ार्ट की चालीसवीं धुन से प्रेरित था. इस युग्ल को तलत महमूद व लता मंगेशकर ने आवाजें दी थी.salil and lata

फिल्म ‘छाया’ का ‘जा उड जा रे पंछी देश हुआ बेगाना’ लता जी के गायकी का उत्कृष्ट उदाहरण था. सलील दा के बेहतरीन धुनों में से एक. योगेश की कविताई में ‘कई बार युं ही देखा है,यह जो मन की सीमारेखा’ बासु चैटर्जी की ‘रजनीगंधा’ के बाकी गीतों की तरह उत्तम दर्जे का था. मुकेश ने इसे आवाज देकर अमर बना दिया था. गायकी के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. अतीत व वर्त्तमान की उलझन में जकडी नायिका की मन:स्थिति को वयक्त करने में सफल हुआ था. सत्तर दशक की बेहतरीन कामेडी फिल्मों में शुमार ‘छोटी सी बात’ का ‘जानेमन जानेमन तेरे यह दो नयन’ यशुदास व हेमलता का उत्साह व थिरकन भरा जिंदादिल गीत था.

आनंद का ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ सलील दा की बेहतरीन धुनों में से एक बना. अपने जीवन का अवलोकन करते हुए आनंद ने यह गीत गुनगुनाया था. इससे गुजरते हुए हम हंसमुख आनंद सहगल के दूसरे पहलू से परिचित हो जाते हैं. फिल्म के हरेक गीत का कहानी से एक व्याख्यात्मक रिश्ता था. पात्रों के हालात से निकले कहानी को दिशा देते गीत बोझिल नहीं होते. वहीं मेरे अपने का ‘कोई होता जिसको हम अपना’ किशोर कुमार के संवेदनशील गायकी का बेहतरीन नमूना था. सत्तर दशक के दर्द भरे गीतों में इसका शुमार किया जा सकता है. आनंद में ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ सरीखा दर्दभरे गीत के सामानांतर खुशनुमा ‘मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने’ गीत भी था. गुलजार की यह कविताई दिलों की उदासी को तोड कर खुशनुमा रंगों का संचार करने में कारगर है. यह आनंद सहगल के हंसमुख चरित्र का जिंदादिल विस्तार समान था. पियानो प्यारी धुनों से सजी एक सार्थक कविता. लता मंगेशकर ने अनेक युग्ल गीतों को आवाज दी लेकिन ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे’ एक चमकता सितारा रहेगा. प्यार को त्यागने अथवा उससे अलग होने का एक तरीका इसमें युवतियों ने महसुस किया होगा. अपनी कहानी को नायिका की कहानी बनते देखा होगा. मानसून के खुशनुमा माहौल से लबरेज ‘ओ सजना बरखा बहार’ में मौसम से उपजे भावों को कहा गया था. प्रकृति के समीप इस गीत को भी सलील दा ने लता मंगेशकर को दिया था. गीत में प्रयुक्त ध्वनियां व विजुअल्स हमें मौसम के बेहद करीब ले आते हैं. असम की चाय बगानों में बीते दिनों ने सलील दा को प्रकृति के करीब ले आया था. फिजाओं में सांस ले रही ध्वनियों का पीछा करना सीख लिया था. इसे आप मधुमती के बोलते गीत ‘सुहाना सफर’ में देख सुन सकते हैं. किसान की पुकार… सुखी पत्तियों की आवाजें…बहती नदिया की चाल…चिडियों की चहचहाहट से मुखडा लेती मुकेश की गायकी में आज भी वही बात नजर आती है. प्रकृति से संवाद करते बेहतरीन गीतों में बडा ऊंचा मुकाम देंगे आप इसे.

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  • Published: 3 years ago on November 19, 2014
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  • Last Modified: November 19, 2014 @ 3:39 pm
  • Filed Under: मनोरंजन

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