/राजस्थान हाईकोर्ट ने लगाई क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों के बैंकिंग कारोबार पर रोक..

राजस्थान हाईकोर्ट ने लगाई क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों के बैंकिंग कारोबार पर रोक..

-दलपतसिंह राठौड़||

राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी एवं न्यायमूर्ति प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने बुधवार को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक लगा दी हैं. हाईकोर्ट ने क्रेडिट सोसायटियों द्वारा ऋण देने एवं एटीएम लगाने जैसे बैंकिंग व्यवसाय करने वाली गतिविधियों पर भी रोक लगा दी हैं.

adarsh-credit-cooperative-society-long-term-deposit-policy-1-638बाड़मेर निवासी एडवोकेट सज्जनसिंह भाटी ने सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड से पंजीकृत क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा आकर्शक लुभावनी योजनाएं लाॅंच कर ग्राहकों से करोड़ों की जमाएं स्वीकार करने एवं उंची ब्याज दरों पर कर्ज देने के मामले मे पीआईएल दायर की थी. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने पैरवी की.

अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों का लालच देकर आम ग्राहकों से जमाएं प्राप्त की जाती थी. ऐसी कईं सोसायटियां बाद मे रफू हो गई और लोगों के करोड़ों डूब गये. मारवाड़ सहित पूरे राजस्थान मे सैकड़ों की संख्या मे ऐसी क्रेडिट कोऔपरटिव सोसायटियां खोल दी गई हैं. याचिका के मुताबिक सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड के तहत पंजीकृत इन सोसायटियों के पास अपने ही सीमित सदस्यों से जमाएं प्राप्त कर उनके आर्थिक स्वावलंबन के काम करने का अधिकार होता हैं. जबकि ये सहकारिता कानून की आड़ मे सरेआम बैंकिंग व्यवसाय कर रहे हैं. इन सोसायटियों द्वारा अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं होर्डिंग्स लगा कर जमाओं के आॅफर आमजन को दिये जा रहे है.

राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी एवं न्यायमूर्ति प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने बुधवार को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक लगा दी हैं. हाईकोर्ट ने क्रेडिट सोसायटियों द्वारा ऋण देने एवं एटीएम लगाने जैसे बैंकिंग व्यवसाय करने वाली गतिविधियों पर भी रोक लगा दी हैं.

बाड़मेर निवासी एडवोकेट सज्जनसिंह भाटी ने सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड से पंजीकृत क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा आकर्षक लुभावनी योजनाएं लाॅंच कर ग्राहकों से करोड़ों की जमाएं स्वीकार करने एवं उंची ब्याज दरों पर कर्ज देने के मामले मे पीआईएल दायर की थी. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने पैरवी की.

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अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों का लालच देकर आम ग्राहकों से जमाएं प्राप्त की जाती थी. ऐसी कईं सोसायटियां बाद मे रफू हो गई और लोगों के करोड़ों डूब गये. मारवाड़ सहित पूरे राजस्थान मे सैकड़ों की संख्या मे ऐसी क्रेडिट कोऔपरटिव सोसायटियां खोल दी गई हैं. याचिका के मुताबिक सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड के तहत पंजीकृत इन सोसायटियों के पास अपने ही सीमित सदस्यों से जमाएं प्राप्त कर उनके आर्थिक स्वावलंबन के काम करने का अधिकार होता हैं. जबकि ये सहकारिता कानून की आड़ मे सरेआम बैंकिंग व्यवसाय कर रहे हैं.

इन सोसायटियों द्वारा अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं होर्डिंग्स लगा कर जमाओं के आॅफर आमजन को दिये जा रहे हैं. जबकि बैंकिंग कारोबार के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेन्स लेना अनिवार्य होता हैं. सोसायटियों मे जमाकर्ताओं के निवेश रूपयों की कोई सिक्युरिटी रिजर्व बैंक मे नही रहती. याचिका मे ऐसी कईं सोसायटियों का उल्लेख किया गया था जो जमाएं लेकर बंद कर दी गई और संचालक फरार हो गये.

याचिका मे संजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, नवजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी एवं सांईकृपा क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, मारवाड़ क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी को भी पक्षकार बनाया गया था. हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया था.

बुधवार को सुनवाई दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने दलील दी कि इस तरह की सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों पर कमजोर वर्गो के लोगों को कर्ज दिया जाता हैं तथा उनसे ही जमाएं प्राप्त की जाती हैं. आॅफर दौरान पहुंचने वाले इन लोगों को बैकडोर से सदस्य बना लिया जाता हैं, जबकि सहकारी कानून मे ऐसे सदस्य बनाये जाने का कोई प्रावधान नही हैं. जबकि बैंकिंग कारोबार के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेन्स लेना अनिवार्य होता हैं. सोसायटियों मे जमाकर्ताओं के निवेश रूपयों की कोई सिक्युरिटी रिजर्व बैंक मे नही रहती.

याचिका मे ऐसी कईं सोसायटियों का उल्लेख किया गया था जो जमाएं लेकर बंद कर दी गई और संचालक फरार हो गये.

याचिका मे संजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, नवजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी एवं सांईकृपा क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, मारवाड़ क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी को भी पक्षकार बनाया गया था. हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.