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भिंडरावाला प्रकरण से सबक ले भाजपा नेता..

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-पवन कुमार बंसल||

नई दिल्ली, वोट बैंक की राजनीति के चलते नेता तथा राजनीतक दल डेरो के बाबाओ तथा धार्मिक मठो के प्रमुखों की हाजिरी लगाते है. तत्कालीन पधानमंती इंदिरा गांधी ने पंजाब में अकाली दल को प्रभावहीन करने के लिए पहले तो निरंकारियों को प्रोत्शाहन दिया. फिर जरनैल सिंह भिंडरावाला को भी संरक्षण दिया. अकाली भी भिंडरावाला की पूजा करते थे. लेकिन इसका देश को कितना नुक्सान हुआ उसका अंदाज भी नहीं लगाया सकता. हरियाणा में भी पंजाब जैसे हालत बनते जा रहे है.bhinderwala

बरवाला के सतलोक आश्रम के संत रामपाल तथा सिरसा के सच्चा सौदा डेरे के राम रहीम काफी समय से सरकार के लिए मुसीबत बने हुए है. हरयाणा की हर पार्टी के नेता चुनाव के समय , सिरसा जाकर बाबा चरणो में माथा टेक कर आते है. वक्त और हालातों के अनुसार डेरा अलग अलग राजनीतक दलों को समर्थन देता रहा है. पंजाब तथा हरियाणा विधानसभा चुनाव में डेरा पहले कांग्रेस को समर्थन दे चुका है. इस बार विधानसभा चुनाव से पहले चूँकि केंद्र में भाजपा की सरकार बन चुकी थी, इसलिए डेरे ने भाजपा को समर्थन दे दिया. हालाँकि समर्थन के लिए कांग्रेस के नेता भी बाबा रामरहीम के दरबार में बाकायदा हाजिरी लगा आये थे. समर्थन का चुनाव में भाजपा को काफी लाभ हुआ.

ramraheemराजनतिक हलको में कहा जा रहा है कि मनोहर लाल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने रामपाल वाले मामले में देर इसलिए करवाई  कि क्योंकि वो समझ नहीं पा रही थी कि आने वाले दिनों में सिरसा के डेरा सच्चा सौदा को लेकर भी यदि कोई ऐसे हालत बनते है तो सरकार वहा क्या करेगी.

काबिलेगौर है कि पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने सच्चा सौदा के गुरु रामरहीम पर एक सो साठ साधुओ को नपुंसक बनाने के मामले की जाँच हरियाणा सरकार को देकर अदालत में रिपोर्ट पेश करने को कहा है. डेरा के संत रामरहीम अक्सर विवादों में रहते है हरियाणा विधानसभा के चुनाव में सच्चा सौदा के समर्थको ने भाजपा का समर्थन
किया था. इस एहसान का बदला चुकाने के लिए पिछले दिनों ही भाजपा के तीस विधायक डेरा में जाकर रामरहीम के चरणो में शीश नवा कर आये है.

भाजपा नेताओं को संत जरनैल सिंह के प्रकरण से सबक लेना चाहिए. कही ऐसा न हो की आने वाले दिनो में कही रामरहीम भाजपा सरकार के लिए जबर्दस्स्त चुनौती न बन जाये.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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