/ताजमहल, आज़म ख़ाँ और देश..

ताजमहल, आज़म ख़ाँ और देश..

ताजमहल किसका है? आज़म ख़ाँ कहते हैं, मुसलमानों का है, इसलिए ताजमहल पर वक़्फ़ वालों का हक़ है. नौ साल पहले भी यूपी सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने ताजमहल को अपनी मिल्कियत बताया था. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और दावा ख़ारिज हो गया. तो अब नौ साल बाद आज़म ख़ाँ क्यों फिर वही बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं. क्या यह असदुद्दीन उवैसी की पार्टी मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन को रोकने की तैयारी है, जिसने उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव में उतरने का एलान कर दिया है? क्या ‘लव जिहाद’ के बाद ताजमहल को चुनावी आग में झोंकने की व्यूह रचना की जा रही है?

-क़मर वहीद नक़वी||
ताजमहल किसका है? देश में शिगूफ़ों की राजनीति के महानायकों में से एक जनाब आज़म ख़ाँ साहब ने अपने पिटारे में से झाड़-पोंछ कर एक पुराना फटीचर शोशा फिर से उछाला है! नौ साल पहले यह विवाद उठ चुका है. उठ कर सुप्रीम कोर्ट में पिट भी चुका है. उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने तब ताजमहल पर अपना दावा ठोका था. ठीक यही बात कही थी, जो आज़म ख़ाँ साहब आज कह रहे हैं. यही कि ताजमहल दो मुसलमानों का मक़बरा है. वहाँ मुसलमानों की क़ब्रें हैं, इसलिए वक़्फ़ बोर्ड का ही हक़ उस पर बनता है. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया. और वहाँ ख़ारिज हो गया.tajmahal

तब कहा था, ताजमहल तोड़ देंगे!

कहा जाता है कि जो सज्जन उस समय यूपी वक़्फ़ बोर्ड के मुखिया थे, वह आज़म ख़ाँ के क़रीबी माने जाते थे! और आज वही आज़म ख़ाँ उसी फुँके कारतूस को दुबारा दाग़ने की कोशिश कर रहे हैं! क्यों? थोड़ी हैरानी होती है. ख़ास कर इसलिए कि अभी साल भर पहले ही ख़ाँ साहब यह कह रहे थे कि अगर बाबरी मसजिद के बजाय कोई भीड़ ताजमहल ध्वस्त करने के लिए निकलती तो वह ख़ुद उसका नेतृत्व करते! क्यों? क्योंकि ताजमहल जनता के पैसे के दुरुपयोग का नमूना है और ‘शाहजहाँ को कोई हक़ नहीं था कि वह अपनी प्रेमिका की याद के लिए जनता के करोड़ों रुपये लुटा दे!’ वाह ख़ाँ साहब वाह! कभी तो ताजमहल एक शहंशाह के सामन्ती शोषण का प्रतीक बन जाये और कभी वही मुसलमानों का मक़बरा बन जाये! क्या राजनीति है आपकी?

क्या एमआइएम का डर सता रहा है?

अपने देश की राजनीति ऐसे ही शिगूफ़ों से चलती है. ताजमहल को मुसलमानों का मक़बरा बनाने का फ़ितूर अचानक क्यों जागा? सीधा-सा जवाब है. मुसलमानों के वोट चाहिए. डर इस बार हैदराबाद की तरफ़ से लग रहा है! जी हाँ, असदुद्दीन उवैसी की मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन (एमआइएम) ने उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनावों में उतरने की तैयारी कर ली है! महाराष्ट्र में पार्टी बिना किसी ख़ास तैयारी के उतरी और दो सीटें जीत गयी. काफ़ी मुसलिम वोट काटे भी. अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव होने में काफ़ी वक़्त है. एमआइएम अगर अभी से तैयारी में जुटेगी तो आज़म ख़ाँ की सियासी ज़मीन दरक सकती है! समाजवादी पार्टी का वोट बैंक उससे बिदक सकता है! इसलिए सपा के लोग आज़म के बयान पर चुप हैं. वैसे 2005 में भी जब वक़्फ़ बोर्ड ने ताजमहल पर दावा ठोका था, सपा वाले तब भी चुप ही थे यह कह कर कि अदालत जो फ़ैसला करे, तो करे, हमें कुछ कहना नहीं है. आख़िर मामला मुसलमानों का जो है. सपा की राजनीति ऐसी ही साम्प्रदायिक तिकड़मों पर टिकी है.
तो क्या ‘लव जिहाद’ के बाद अब ताजमहल उत्तर प्रदेश की राजनीति में जलेगा? संघ परिवार तो काफ़ी लम्बे समय से ताजमहल को ‘तेजो महालय’ सिद्ध करने की नाकाम कोशिशों में जुटा है. और अब अचानक वह पुराने परचे, पैंफलेट, पुस्तिकाएँ और किताबें फिर से निकलना शुरू हो गयी हैं, जिन्हें लोगों ने अब तक कभी भी यक़ीन करने लायक़ नहीं माना. और उधर, लखनऊ के मौलाना ख़ालिद रशीद फिरंगीमहली के बाद दारुल उलूम देवबन्द के भी कुछ मौलानाओं को आज़म ख़ाँ के समर्थन में उतार कर चिनगारी को हवा देने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद अच्छी बात यह कि कम से कम अभी मुसलमानों का बड़ा तबक़ा आज़म ख़ाँ से क़तई सहमत नहीं कि ताजमहल को वक़्फ़ के हवाले कर दिया जाये. ताजमहल देश की और दुनिया की एक बेमिसाल और अनमोल धरोहर है और साम्प्रदायिक राजनीतिबाज़ो, मेहरबानी करके इसे यही रहने दो.

बीजेपी क्यों हुई ‘मुलायम’?

लेकिन दिक़्क़त यह है कि हमारे यहाँ राजनीति का कोई धरम-ईमान नहीं है. और हास्यास्पद स्थिति यह है कि जनता सब जानते-समझते हुए भी जानबूझ कर कुछ नहीं समझती. अब अनुच्छेद 370 का मामला ही ले लीजिए. अब तक बीजेपी को किसी क़ीमत पर अनुच्छेद 370 बर्दाश्त नहीं था. देश भर में कितना ज़हर बोया गया इस नाम पर. लेकिन अब जम्मू-कश्मीर में पार्टी सरकार बनाने का सपना देख रही है. तो मामला ‘मुलायम’ हो गया! अब पार्टी सबसे चर्चा करेगी, फिर तय होगा कि अनुच्छेद 370 रहे या जाये! अब इसमें जितना समय लगता हो लगे, कोई जल्दी नहीं! तो फिर इतने दिनों से आग क्यों उगल रहे थे?
और सिर्फ़ 370 क्यों, समान नागरिक संहिता को लेकर भी बीजेपी बड़ा शोर मचाया करती थी. एनडीए में ‘सेकुलर’ दलों की मौजूदगी की वजह से पार्टी ने अपने इस एजेंडे को ठंडे हस्ते में डाल दिया था. ठीक है. मजबूरी थी. मान लिया. लेकिन अब तो बीजेपी के लिए कोई ‘सेकुलर’ मजबूरी नहीं है. फिर अब उसने समान नागरिक संहिता की बात भी करना क्यों बन्द कर दिया? ठीक है कि अभी उसके पास इतनी राजनीतिक ताक़त नहीं है कि फ़ौरन वह इसको असली जामा पहना पाये, लेकिन इस पर चर्चा कराने, इसके लिए माहौल बनाने से उसे अब कौन रोक रहा है? ज़ाहिर है कि कोई नहीं! फिर भी पार्टी बिलकुल चुप है? क्यों? क्योंकि अभी यह बात उसके राजनीतिक जोड़-घटाव में कुछ काम की नहीं!

वो उर्दू वाले, ये संस्कृत वाले!

अभी संस्कृत पर राजनीति हो रही है. इससे ‘हिन्दुत्व की मन्द-मन्द सेंकाई’ होती रहेगी. केन्द्रीय विद्यालयों के बाद अब सीबीएससी स्कूलों में भी संस्कृत पढ़ाये जाने की माँग संघ के संगठनों की ओर से हो रही है. अब देखिए, मुलायम सिंह आते हैं तो उत्तर प्रदेश में मुसलमान छात्रों को उर्दू पढ़ाये जाने, उर्दू शिक्षकों की भरती वग़ैरह-वग़ैरह पर सरकारी ज़ोर लग जाता है. समझ में नहीं आता कि उर्दू पढ़ने से मुसलमान बच्चों का क्या भला होगा? जिस भाषा से आप रोज़गार नहीं पा सकते, अपना कारोबार नहीं चला सकते, उसे ज़बरदस्ती पढ़ कर क्या करेंगे? पढ़ लिया, समय लगाया, धन लगाया और बाद में जीवन भर उस भाषा में कोई काम नहीं किया, तो पढ़ा-लिखा सब भूल गये. जो समय, श्रम और धन लगा, सब बेकार गया. मैंने भी त्रिभाषा फ़ार्मूले के तहत स्कूल में उर्दू पढ़ी. स्कूल से निकलने के बाद उस भाषा में कभी कोई काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ी. आज उस पढ़ाई का मेरे लिए क्या काम? और केवल मैं ही नहीं, मुझे लगता है कि त्रिभाषा फ़ार्मूले के तहत हिन्दीभाषी क्षेत्रों में अब तक जितने भी छात्रों ने उर्दू या संस्कृत पढ़ी, उसे उन्होंने स्कूल से बाहर आ कर कभी नहीं पढ़ा. तो फ़ायदा क्या हुआ?
सामान्य शिक्षा तो विकास के लिए होनी चाहिए. ऐसी शिक्षा, जिससे आर्थिक विकास हो. यह तर्क बिलकुल ग़लत है कि संस्कृत पढ़ना इसलिए ज़रूरी है कि भारतीय संस्कृति से छात्रों का परिचय हो. संस्कृति से परिचय ज़रूरी है, लेकिन वह तो किसी भाषा में भी कराया जा सकता है. उर्दू या संस्कृत के पचड़े को छोड़ कर हमें शिक्षा को अति आधुनिक, आज की अति प्रतिस्पर्धी दुनिया में तेज़ी से आगे बढ़ने, जीत हासिल करने लायक़ बनाने पर पूरा ज़ोर लगाना चाहिए. अपने अतीत को, अपने इतिहास को, अपनी जड़ों को, अपने गौरव को और अपनी संस्कृति को जानना, मानना और समझना बेहद ज़रूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उसके लिए अतीत के उपकरणों में ही जीते रहें.

ऐसी पढ़ाई-लिखाई किस काम की?

इसलिए शिक्षा ऐसी हो, जो वैचारिक दरवाज़े और खिड़कियाँ खोलती हो, जिससे नयी उजास से जीवन जगमगाता हो, न कि ऐसी जो ऐसे तर्क जने जो लड़कियों को इसलिए लाइब्रेरी में आने से रोकता हो कि इससे एक लड़की पर चार लड़कों की भीड़ आ जायेगी! पढ़-लिख जाने के बाद भी ऐसी ही सोच बनी रहे तो ऐसी पढ़ाई-लिखाई भला किस काम की? फिर आप में और मुज़फ़्फ़रनगर की उस खाप पंचायत में क्या फ़र्क़ है जो लड़कियों के जीन्स पहनने, मोबाइल फ़ोन रखने, इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करने पर रोक लगाती है! और पंचायत वालो, ऐसी रोक सिर्फ़ लड़कियों पर क्यों? कभी आप लड़कों पर भी ऐसी रोक लगा कर देखो न! और ज़मीरुद्दीन शाह साहब, पहले तो यह सोच ही ग़लत है कि लड़के-लड़कियों को एक-दूसरे से काट कर रखा जाये. दुनिया अब बहुत बदल चुकी है. फिर भी अगर मान लें कि आपका ऐसा सोचना सही भी है तो क्यों ऐसा नहीं हो सकता था कि आपकी लाइब्रेरी हफ़्ते में एक या दो दिन सिर्फ़ लड़कियों के लिए ही खुलती और उस दिन लड़कों के वहाँ आने पर पाबन्दी लग जाती! आप ऐसा भी तो सोच सकते थे!
लेकिन क्या करें. धर्म और संस्कृति के चश्मे से हमेशा ऐसा ही दिखता है, देखनेवाला चाहे कोई हो!

(लोकमत समाचार, 22 नवम्बर 2014)

(रागदेश)

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