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एक सुबह ऐसी भी..

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-ईश मधु तलवार||

क्या ऐसे भी किसी की रोज सुबह होती है ? उस सुबह के अद्‌भुत नज़ारे हमेशा जेहन में रहते हैं. पानी में उछलती मछलियाँ, दोस्त की तरह सुबह -सुबह मिलने आते कव्वे, गिरगिल और कबूतर….कुलांचे भर कर दौड़ती गायें और चिंघाड़ते हाथी.10306549_899417103409993_1366979155848565059_n

ऐसी ही एक सुबह के लिये जयपुर में पंजाबी समाज के अध्यक्ष रवि नय्यर ने मुझे दावत दी. सुबह साढ़े छह बजे अपने घर आने को कहा. मैं पहुंचा तो सड़कों पर उस समय नीम अंधेरा पसरा था. रवि नय्यर ठीक साढ़े छह बजे कार के अंदर बैठे मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे. मैं उनके साथ बैठ गया. कार थोड़ी दूर जा कर रुकी और एक आदमी एक बड़ा कार्टन गाड़ी की पीछे की सीट पर रख गया. इसमें कई तरह के अनाजों की बनी रोटियाँ थीं. फिर ईदगाह पहुंचे. एक आदमी कार देखते ही चारे के कई गठ्ठर लाया और उन्हें कार के पीछे की सीट पर रख दिया. इसके बाद हम सीधे आमेर पहुंचे.
हाईवे से आमेर में प्रवेश से पहले ही गायों का एक झुण्ड दिखा. रवि ने कार का शीशा नीचे किया और आवाज़ लगाई- ”आओ, आओ, आओ…” इसके साथ ही गाड़ी आगे बढ़ा दी. गायों ने कार के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया. रवि ने आगे जा कर कार रोकी और आगे के दोनों तरफ की खिड़कियों के शीशे नीचे कर दिये. दोनों तरफ गायों ने खिड़कियों के अंदर अपने मुंह घुसा दिये, जिन्हें रवि अपने हाथ से रोटियाँ खिलाते रहे. गायें एक दूसरी को हटा कर अपना मुंह खिड़की के अंदर घुसाने के लिये संघर्ष करती रहीं . रवि ने बताया कि कई बार उनकी कार की खिड़कियों के शीशे टूट चुके हैं और गाड़ी में डेंट पड़ चुके हैं. रवि फिर गायों को चारा डाल कर आगे बढ़ गये और रास्ते में तीन-चार जगह ऐसे ही गायें उनके पास दौड़-दौड़ कर आती रहीं. फिर रास्ते में एक हाथी मिला. रवि ने गाड़ी रोकी. हाथी ने अपनी सूँड कार की खिड़की के अंदर घुसाई. रवि ने उसमें चार-पांच रोटियाँ रख दी. हाथी ने रोटियाँ सूँड में लपेटीं और सूँड बाहर निकाल लिया. आगे जा कर फिर एक हाथी मिला. फिर सब कुछ वही.
अब हम आमेर के मावठे में आ गये. सुबह खुलनी शुरू हो गयी थी और मावठे की झील में लहरें मचल रहीं थी. यहाँ रवि ने मछलियों के लिये पानी में आटे की गोलियाँ डालना शुरू किया जो उनकी माताजी ने सुबह चार बजे उठ कर बनायीं थीं. झील में आटे की गोलियाँ केच करने के लिये मछलियाँ पानी के ऊपर तक उछल रही थीं.झील के किनारे सुबह-सुबह मछलियों का उत्सव देखते ही बनता था.

यहाँ से अब हम हाईवे पर रवि के एक रिसोर्ट में आ गये. यहाँ लान में टेबिल पर उन्होंने चावल रख कर कव्वों को नाश्ता कराया. कव्वे रोज ऐसे ही यहाँ पंख फ़डफ़डाते हुए आते हैं और टेबिल पर नाश्ता करते है. एक जगह रवि ने दाने डाले तो ढेर सारी लाल चोंच वाली गिरगिल भी नाश्ते के लिये आ पहुँचीं . रिसोर्ट में नौकरों की कमी नहीं थी, लेकिन कबूतरों का अनाज रवि ने खुद बोरी में भरा और कंधे पर बोरी लटका कर आ गये. उन्हें कबूतरों के एक कमांडर तक की पहचान थी, जो सबसे पहले आता है और बाकी कबूतर उसके पीछे-पीछे. रवि ने चींटियों के रास्ते पर घर से लाया आटा भी डाला. हम जब वापस लौट रहे थे तो कार की सीटों और रवि के कपड़ों पर हरे चारे के पत्ते बिखरे पड़े थे.
पंजाब के डेरा बाबा नानक में आतंकवादियों की गोलियों से कई बार बचने के बाद जयपुर में आकर अपनी बड़ी पहचान बनाने वाला कारोबारी पशुओं और परिंदों को जिस तरह प्यार कर रहा था, ऐसा प्यार तो लोग आज इंसानों को भी नहीं करते. सुबह जब सर्दी में बहुत से लोग बिस्तरों में दुबके पड़े होंगे तब तक रवि चींटी से ले कर हाथी तक को भोजन करा कर घर लौट चुके थे. बरसों से वो ऐसा ही करते आ रहे हैं.

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