/दो महत्त्वाकाँक्षाएँ, एक तीर..

दो महत्त्वाकाँक्षाएँ, एक तीर..

एक तरफ़ नमो हैं. दुनिया जीतने निकले हैं. वह विश्विजयी, दिग्विजयी नेता बनना चाहते हैं, नेहरू से भी बड़ी और बहुत बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं और देश के सबसे क़द्दावर प्रधानमंत्री के रूप में इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं. न भूतो न भविष्यति!

दूसरी ओर संघ है. ‘हिन्दू गौरव’ की ध्वजा उठाये, देश में शिक्षा, इतिहास, संस्कृति और सब कुछ बदल डालने को आतुर, हिन्दू राष्ट्र के लक्ष्य पर पूरी तरह नज़रें गड़ाये.

16 मई के चुनावी नतीजों से इन दो महत्त्वाकाँक्षाओं की दौड़ शुरू हुई. ‘स्टार्टिंग प्वाइंट’ एक था, लेकिन ‘फ़िनिशिंग प्वाइंट’ दो हैं!

नमो और संघ: फ़ार्मूला दो की दौड़!

 

-क़मर वहीद नक़वी||

चुनाव एक था, और क़िस्मत की चाबियाँ दो थीं! क़िस्मत खुली. चाबियाँ चलीं, दौड़ीं, फ़र्राटे से. और तेज़, और तेज़, और तेज़. चाबियाँ दौड़ रही हैं, फ़र्राटा भर रही हैं. ज़बर्दस्त रफ़्तार है! फ़ार्मूला वन से भी ज़्यादा! पर यहाँ फ़ार्मूला एक नहीं, बल्कि दो है! दौड़ का ‘स्टार्टिंग प्वाइंट’ एक था, लेकिन ‘फ़िनिशिंग प्वाइंट’ दो हैं! इसलिए फ़ार्मूले भी दो हैं! और सवाल भी दो हैं! एक, क्या दो के दोनों, हाथों में हाथ डाले दो ‘फ़िनिशिंग प्वाइंट’ पर पहुँच सकते हैं? दो, अगर नहीं तो क्या होगा, कौन किस पर भारी पड़ेगा?

सात महीने पहले लिखा था!

कोई बड़ी कठिन पहेली नहीं बुझा रहा हूँ मैं. मई के चुनावी नतीजों ने क़िस्मत की एक चाबी नमो के लिए खोली है, दूसरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस या संघ के लिए. जो लोग इस स्तम्भ के नियमित पाठक हैं, उन्हें शायद याद हो कि चुनावी नतीजे आने के क़रीब डेढ़ महीने पहले इसी स्तम्भ मे लिखा गया था—‘एक चुनाव है, क़िस्मत की दो चाबियाँ हैं! एक नमो के लिए, एक आरएसएस के लिए….(नमो) की चरम महत्त्वाकांक्षाएँ इस चुनाव में दाँव पर हैं…और उधर दूसरी तरफ़ (आरएसएस की) हिन्दू राष्ट्र की कार्ययोजना…संघ को लगता है कि….अबकी बार मोदी सरकार बन गयी तो हिन्दू राष्ट्र ज़्यादा दूर नहीं!’ (देखें: ‘एक चुनाव और क़िस्मत की दो चाबियाँ!’ 5 अप्रैल 2014).

 

और सात महीने पहले, मैंने जो ‘भविष्यवाणी’ की थी, वह आज हूबहू, वैसी की वैसी घटित हो रही है!

न मोदी से पहले, न मोदी के बाद!

एक तरफ़ नमो हैं. अपने विश्वविजय अभियान पर. दुनिया जीतने निकले हैं. जीत भी रहे हैं. दुनिया के नेताओं पर, मीडिया पर धाक जमा रहे हैं. अच्छा है! और इसी बहाने, अच्छी या बुरी, जैसी भी हो, एक विदेश नीति भी दिख रही है. आप सहमत हों, असहमत हों, प्रशंसा करें, निन्दा करें, दुनिया के देशों के साथ संवाद की एक नयी भाषा तो दिख रही है! लेकिन इस नयी-नवेली कूटनीति की एक साफ़-साफ रणनीति और भी साफ़ दिख रही है! ‘सेल्फ़ी’ की! ‘सेल्फ़ी’ का ज़माना है! अपनी फ़ोटो आप खींचो. अपना ब्रांड बनाओ! सो कूटनीति भी हो रही है, और ब्रांडिंग भी! ब्रांड मोदी की घनघोर मार्केटिंग भी. कोई मौक़ा छूटे नहीं, कोई मौक़ा चूके नहीं. झकास आयोजन हो, आह्लादित भीड़ हो, तालियों की गूँज हो, मेगा इवेंट हो, क्रेज़ी फ़ैन्स हों, और हो ‘मोदी राॅक्स’ की धूम! यत्र तत्र सर्वत्र ‘सुपर पीएम’ की वाहवाही हो! न भूतो, न भविष्यति! मोदी जैसा कोई नहीं. न मोदी से पहले, न मोदी के बाद! मोदी सरकार की पिछली छह महीने की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है. उनकी विदेश यात्राएँ!image3
अब आप बहस करते रहिए, सवाल उठाते रहिए कि ‘इंडिया फ़र्स्ट’ या ‘नमो फ़र्स्ट!’ मोदी कहेंगे, उनके समर्थक कहेंगे कि मोदी तो ब्रांड इंडिया बना रहे हैं, उसके साथ ब्रांड मोदी तो बनेगा ही! इसमें आपत्ति कैसी? लेकिन देखेंगे, तो फ़र्क़ साफ़ दिखता है. आज से पहले किस प्रधानमंत्री ने अपनी ऐसी मार्केटिंग की, करायी? बहरहाल, यहाँ मुद्दा यह नहीं कि मोदी को ऐसा करना चाहिए या नहीं, या वह ग़लत कर रहे हैं या सही, यह अलग बहस का विषय है. मुद्दे की बात यह है कि नमो ऐसा कर रहे हैं क्योंकि वह विश्विजयी, दिग्विजयी नेता बनना चाहते हैं, नेहरू से भी बड़ी और बहुत बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं और देश के सबसे क़द्दावर प्रधानमंत्री के रूप में इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं. न भूतो न भविष्यति! उनकी यह महत्त्वाकांक्षा अब किसी से छिपी नहीं है. तो मोदी का लक्ष्य बिलकुल साफ़ है.

संघ: लहजे में अब ‘पावर’ है!

उधर संघ की महत्त्वाकांक्षा भी अब कहीं छिपी हुई नहीं है. उसका लक्ष्य भी बिलकुल साफ़ है. वह भी अपनी पूरी रफ़्तार में है. सरकार में, अफ़सरशाही में, समूचे शासन तंत्र में, शिक्षा में, संस्कृति में, साहित्य में, राजनीति में, समाज में और हर मंच पर संघ की पकड़, उसका दख़ल लगातार बढ़ता जा रहा है. सरकार कैसे काम करे, क्या करे, क्या न करे, हर जगह संघ की निगाह है, संघ की सलाह है, संघ का हस्तक्षेप है, संघ का निर्देश है. अभी छह महीने पहले तक संघ कभी-कभार ही ख़बरों में होता था, बोलता भी बहुत कम था. वाजपेयी जी की एनडीएसरकार के ज़माने में भी संघ अकसर पर्दे के पीछे ही रहा. बहुत ज़रूरी हुआ तो कभी कोई सन्देसा चुपचाप भेज दिया, बस. लेकिन नमो सरकार के छह महीनों में संघ खुल कर मुखर है, रोज़ ख़बरों में है, रोज़ बोल रहा है, लहजे में अब ‘पावर’ दिखने लगा है!
मिसाल के तौर पर ‘शैक्षणिक बदलावों’ पर चर्चा के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के साथ पिछले छह महीनों में संघ के नेताओं की छह बैठकें हो चुकी हैं. इसके लिए संघ ने बाक़ायदा एक शिक्षा समूहबनाया है. अब अगले महीने उज्जैन में एक बड़े सेमिनार की तैयारी है, जिसमें आज़ादी के बाद से अब तक बने तमाम शिक्षा आयोगों की सिफ़ारिशों और उनकी ‘प्रासंगिकता’ के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्तता, विज्ञान और आध्यात्मिकता जैसे तमाम विषयों पर विचार किया जायेगा.

आठ सौ साल बाद ‘हिन्दू शासन’!

तो शिक्षा और पाठ्यक्रम बदलने को लेकर संघ पूरे जी-जान से जुटा है. ये बदलाव क्या होंगे, दीनानाथ बतरा की किताबों से इसकी झलक पायी जा सकती है! इतिहास फिर से लिखने की बड़ी परियोजना पर उसने काम शुरू कर ही दिया है. क्योंकि किसी देश की संस्कृति बदलने के लिए ज़रूरी है कि सबसे पहले शिक्षा और इतिहास को बदला जाये! लेकिन सिर्फ़ यही नहीं, संघ ने हर ज़रूरी क्षेत्र में सरकार की लगाम थामे रहने के लिए आर्थिक समूहऔर सुरक्षा समूह जैसे कई समूह बनाये हैं! जो तय करेंगे कि किस क्षेत्र में देश की नीति और रास्ता क्या होना चाहिए और अन्तत: हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य पूरी तरह कैसे पाया जा सकता है.
एक तरफ़ सरकार पर पकड़ है, तो दूसरी तरफ़ ‘हिन्दू गौरव’ को लगातार उभारने की कोशिश है. पिछले दिनों दिल्ली में हुई विश्व हिन्दू काँग्रेस में अशोक सिंहल का यह बयान अपने आप में बहुत कुछ कह देता है कि आठ सौ सालों के बाद भारत में हिन्दुओं का शासन लौटा है! सम्मेलन में दलाई लामा भी आये थे. अब पता नहीं, इन दोनों बातों का आपस में कोई सम्बन्ध है या नहीं कि म्याँमार और श्रीलंका के उग्रवादी बौद्ध संगठन ‘मुसलमानों का मुक़ाबला करने’ के लिए अब संघ से नज़दीक़ी बढ़ा रहे हैं! इधर, भारत में संघ तथाकथित ‘लव जिहाद’ के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने के लिए सरकार पर ज़ोर डाल रहा है.

दो महत्त्वाकाँक्षाएँ, दो रास्ते

तो संघ का एजेंडा और रास्ता साफ़ है और मोदी का भी. तो क्या ये दोनों महत्त्वाकाँक्षाएँ एक साथ चल सकती हैं? यह देखना वाक़ई दिलचस्प होगा. अभी पिछले दिनों मोहन भागवत ने सरकार के रवैये को लेकर थोड़ी नाराज़गी जतायी. कहा कि हिन्दू और हिन्दुस्तान को लेकर उनके बयान को लेकर सत्तारूढ़ दल के नेता नहीं बोले. सन्तुलन साधने के चक्कर में चुप रहे!
मोदी को विश्व नेता बनना है तो सन्तुलन तो उन्हें साधना ही होगा. और कहीं-कहीं वह इसे साधने की कोशिश भी कर रहे हैं. मसलन उनका ताज़ा बयान कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए. ज़ाहिर है मोदी अब एक ‘विश्व दृष्टि’ अपनाना चाहते हैं, क्योंकि वह उसके बिना वह नहीं बन पायेंगे, जो वह बनना चाहते हैं. संघ के लिए मोदी की महत्त्वाकाँक्षाएँ मायने नहीं रखतीं. उसके लक्ष्य अलग हैं. दोनों के बीच कोई पुल है क्या? ख़ास कर तब, जब संघ को यह मालूम है कि मोदी के अलावा उसका लक्ष्य साध सकने लायक़ कोई तीर उसके पास नहीं है!
(लोकमत समाचार, 29 नवम्बर 2014) http://raagdesh.com

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं