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हम सबमें छुपा बैठा है एक बलात्कारी..

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-चैतन्य नागर||

हर पुरुष के भीतर एक बलात्कारी भेड़िया होता है. तथाकथित सभ्य, भद्र पुरुष सिर्फ एक धैर्यवान भेड़िया होता है. उसे कोई ऐसी स्त्री दिखेगी जो असुरक्षित हो, अकेली हो, किसी सहारे की खोज में हो, तो उसका कुटिल मन सक्रिय हो जाएगा तुरंत. वह कायर हुआ, तो वह शातिर और सूक्ष्म रूप से आगे बढ़ेगा, धीरे-धीरे, रोमांस का सहारा लेकर, और अगर वह बद्तमीज़ और वल्गर है, कम ‘सॉफिस्टिकेटेड’ है, तो वह ऐसी हरकतें करेगा जिसके बारे में आप अक्सर अखबारों में पढ़ते हैं. स्त्री को देखकर पुरुष सेक्स के लिए प्रवृत्त होगा, यह एक स्वाभाविक बात है. उसकी हर कविता, प्रेम गीत, उसके हर उपहार का उद्देश्य स्त्री को अपने बिस्तर तक ले जाना होता है; बिस्तर और उसके बीच की दूरी के बीच तरह-तरह की रोमांटिक बेवकूफियां, तरह-तरह के बारीक खेल चलते रहेंगे, और इसे बड़ी आसानी से समझा जा सकता है. ये खेल जब दोनों को प्रिय लगते हैं, तो उसे प्यार की स्थिति कहते हैं.Poussin

सेक्स एक खूबसूरत चीज़ होनी चाहिए. सेक्सुअल्टी में कोई बुराई नहीं, और जो धर्म इसे अपवित्र और बुरा मानते हैं, काफी हद तक वे सेक्स से जुड़ी विकृतियों के लिए जिम्मेदार हैं. हमारा आपका भौतिक अस्तित्व ही इससे है, प्रजनन से ही कुदरत पैदा हुई है और प्रजनन के लिए सेक्स एक जरिया है. समस्या सेक्स की नहीं, हिंसा की है. आप हिंसक तरीके से भोजन भी कर सकते हैं. जरूरत से ज्यादा भकोसना, जल्दी-जल्दी खाना, जब भोजन दिखे तभी खाने लगना ये भी एक तरह का बलात्कार है खुद के साथ और भोजन के साथ भी. आप बहुत ज्यादा किसी के असर में आ जाएं, उसी की बातों को बार-बार दोहराएं, उसके लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाएं, तो समझिए आप एक तरह का मानसिक बलात्कार स्वयं के साथ ही किए जा रहे हैं. जिस देश में ब्रह्मचर्य की बात होगी, वीर्य के संचयन की बात होगी, उससे चेहरे पर ओज बढ़ने की बात होगी वहां उसके विपरीत जन्म लेगा एक रेपिस्ट के रूप में. ब्रह्मचर्य और बलात्कार दोनों ही अस्वाभाविक बातें हैं, और मानसिक विकृति है. पशु जगत में, कुदरत में, दोनों नहीं होते. ये सिर्फ मनुष्य के बीमार दिमाग की उपज है.

एक रेपिस्ट क्या स्त्री से प्रेम करता है, और उसके साथ वह सेक्स की इच्छा रखता है या फिर यह एक पावर गेम है, एक पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को कमजोर दिखाकर उसे यूज करना, एक चीज की तरह और उसे ‘नष्ट’ करना? इसके साथ जुड़ा है एक बहुत ही गहरा मत, और धारणा ‘इज्जत’ की. क्या इस पर विचार करना चाहिए? क्या किसी इंसान की तथाकथित इज्जत उसके शरीर के किसी अंग के साथ खिलवाड़ करने से सम्बंधित है? यह जो इज्जत की धारणा है उसे ठीक से समझकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत है. किसी स्त्री की इज्जत जाने का सवाल और उसके साथ जुड़ा एक सामाजिक कलंक. जिस स्त्री के साथ बलात्कार हुआ, उसका क्या दोष, और उसकी इज्जत कहां चली गई? किसने ले ली उसकी इज्जत, और यदि ऐसी कोई चीज है भी, जो चली गई है, तो उसमें क्या मैं और आप दोषी नहीं? जिस समाज में एक स्त्री की इज्जत गई, क्या उसके हर पुरुष की भी इज्जत नहीं चली गई? उस इलाके के पुलिस वाले, डीएम और उस राज्य के मुख्यमंत्री की इज्जत अभी बची है?

बलात्कार से आप हिंसा को निकाल कर देखें. सेक्स का भयंकर वेग और उसके साथ किसी के साथ जबर्दस्ती, हिंसक तरीके से सेक्स करना, चाहे कोई पीडोफाइल हो, बच्चे के साथ हिंसा करे, या कोई स्त्री हो या कोई पुरुष. इस हिंसा को समझने की जरूरत है. नहीं तो दो वयस्कों के बीच, यदि उनके वैवाहिक सम्बन्ध कहीं और नहीं हैं, या वैवाहिक समबन्ध होने पर भी उनके पार्टनर को उनके विवाहेत्तर सम्बन्ध से कोई आपत्ति नहीं, तो फिर समस्या सेक्स के साथ होने वाली हिंसा की है मुख्य रूप से.

यदि मेरी नैतिकता सिर्फ भय से निर्मित है, मैं भयभीत हूं, समाज से डरता हूं, अपनी ‘इज्जत’ बचाने के लिए ‘ऐसे काम’ नहीं करता, पर मेरे अंदर ये सारी कामनाएं, वासनाएं भरी हुई हैं, तो मैं कभी भी कानून के दायरे में नहीं आऊंगा, पर जो व्यक्ति ये काण्ड कर रहा है, उसमें और मुझमें कोई फर्क़ नहीं. वह कामी और दुस्साहसी है, अपनी वासनाओं के सामने तथाकथित सामाजिक नैतिकता को भूल जा रहा है, और पकड़ा जा रहा है, और ऐसा कुछ कर रहा है, जो मैं सिर्फ डर से नहीं कर रहा. तो मुझमें और उसमें क्या फर्क़ हुआ?

जिसे हम सामाजिक नैतिकता कहते हैं वह तो अतृप्त अभिलाषाओं और किसी आदिम भय की अकाल पक्व संतति मात्र है. धर्म, कानून, खाप पंचायत, नौकरी/बिरादरी/गोत्र/पार्टी से निष्कासन, और इसी तरह के भय न होते, सिर्फ कामनाओं का उद्वेलन और उनकी सरसराहट होती, तो तथाकथित अनैतिकता के खुले मैदान में कई तरह के घोड़े हिनहिनाते, मस्ताते चर रहे होते. जो नैतिक है वह कामना से मुक्त नहीं; वह तो बस भयाक्रांत, दबा-पिसा, किसी रोमांटिक सात्विकता के शिखर पर स्वयं की काल्पनिक छवि देखकर आनंदित है. भय से त्रस्त होकर और अवसर की कमी से कई लोग नैतिक बने बैठे हैं. नैतिकता किसी भी तरह से अनैतिकता की विपरीत नहीं. विपरीत तो स्वयं को ही जन्म देता है, किसी अन्य, छद्म रूप में, कि पहचाना ही न जा सके. ठोस, खरी नैतिकता विपरीत के गलियारों से बाहर ही कहीं मुक्त विचरती है. भय के दबाव से अनैतिकता कभी नैतिकता में बदल नहीं पाती; वह एक नयी तरह की प्रच्छन्न, अवगुंठित, भ्रामक नैतिकता को बस जन्म दे देती है.

कितने पुरुष हैं, पूरी दुनिया में जो अपनी पत्नी के साथ भी तभी सहवास करते हैं, जब उसकी इच्छा होती है? वे सभी बलात्कारी हैं. और अगर कोई स्त्री ऐसा करती है किसी पुरुष के साथ, सिर्फ धन और सौंदर्य के बल पर, तो वह भी बलात्कारी है. यदि मेरे मन में किसी स्त्री के साथ हिंसक तरीके से, ज़बर्दस्ती सेक्स करने की इच्छा भी है, यदि मैं पॉर्न देखकर उसका प्रयोग जबरन किसी स्त्री के साथ करने की चाह भी रखता हूं, भले ही मैंने वह इच्छा व्यक्त नहीं की हो, तो मैं भी बदायूं या कहीं भी होने वाले बलात्कार के लिए उतना ही दोषी हूं जितना वह बलात्कारी युवक.

इस हिंसा से कैसे निपटेंगे हम? “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता”. इसे रटेंगे और रटाएंगे? स्त्रियों की पूजा करके? पूजा तो हम सदियों से कर रहे हैं. बच्चों को सिखाएं कि वह स्त्रियों को मां और बहन मानें, उनके चरण छूते फिरें तो इस समस्या से मुक्ति मिलेगी? आदर्श तो हमारे सबसे बड़े दुश्मन हैं. गांधी जी ने ब्रह्मचर्य को आदर्श माना था और 65 की उम्र में भी अपनी वासनाओं से मुक्ति नहीं मिलने की बात कही थी. दमन से मुक्ति नहीं मिलती यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है. बच्चों के सामने मीडिया है, इंटरनेट है, समय से पहले उनकी यौन भावनाएं जाग जाती हैं, पॉर्न का असर उनके मन पर बहुत गहरा होता है, और फिर जिस समाज में वे रहते हैं, वहां स्थितियां बिल्कुल अलग होती हैं. उस काल्पनिक, अवास्तविक दुनिया का असर और वास्तविक समाज के हालात के बीच जो दूरी होती है, वह तरह-तरह की विकृतियों को जन्म देती है, कुंठा और हिंसा को जन्म देती है.

तो बलात्कारी के मन को कैसे बदलें? अवश्य ही प्रशासन की अपनी भूमिका है, उसे सख्त कदम उठाने चाहिए और देखना चाहिए कि ऐसा हो ही न. पर वह भी अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा. राजनेता आमतौर पर गहरी असंवेदनशीलता के शिकार होते हैं. किसी स्त्री पर होने वाले अत्याचार से ज्यादा उन्हें अपनी भैसों की फिक्र होती है और राजनीति भी एक पुरुष प्रधान इलाका है, वहां सामंती, स्त्रीविरोधी तत्व आपको खूब मिलेंगे, उनपर पूरी ज़िम्मेदारी देना बेवकूफी होगी. तो मेरे पास जवाब नहीं, और सारे जवाबों को करीब-करीब मैं देख चुका हूं. ये सभी थोड़ा-बहुत आराम देंगे, पर समस्या दूर नहीं होगी. तो समस्या कैसे दूर हो? संवेदनशीलता कैसे जन्मे, कैसे संवर्द्धित हो? कविताएं पढ़ा कर? कीट्स और शैली, कालिदास और केदारनाथ सिंह को पढ़कर? फूल, पत्तियां और तितलियां दिखा कर? इंटरनेट और पॉर्न पर रोक लगाकर, अपने घरों में, और समाज में? लड़कियों को जीन्स की जगह सलवार-कुर्ता, या बुर्का पहनाकर? मीडिया को ज्यादा जिममेदारी देकर? बेवकूफ नेताओं की ज़ुबान पर लगाम लगाकर? ज्यादा सख्त पुलिस और प्रशासन की मदद लेकर?

ये सभी सिर्फ सवाल हैं. मेरे पास जवाब नहीं, मैं निरुत्तर हूं, आहत हूं, मेरी भी बेटियां, बहने हैं, कलेजा फटता है यह सब देख-सुनकर. पर सारे जवाब बड़े सीमित हैं. शाखाओं की काट-छांट करने जैसे हैं. कहां है इसका सही जवाब? मैं लगातार पूछ रहा हूं, खुद से भी और आप सभी से. हाथ जोड़कर, आंखें झुकाकर. सभी पुरुषों की ओर से समस्त स्त्री जाति से क्षमा मांगते हुए शर्मिंदा हूं अपने इंसान होने पर.

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