/देश के सपूतों के साथ एहसान-फरामोशी..

देश के सपूतों के साथ एहसान-फरामोशी..

-अरविन्द त्रिपाठी||

पूर्ववर्ती हों या वर्तमान केन्द्र की सरकार, वतन पर मरने वाले जवानों की शहादत पर सभी के द्वारा दी जाने वाली श्रद्धांजलि में संवेदनाएं कितनी होती हैं, यह उन्हे ही पता. लेकिन उनके द्वारा जाबाजों की शहादत पर बोले जाने वाले हर शब्द छल, प्रपंच और पाखण्ड से सराबोर जरूर होते हैं. राष्ट्र को जानकर यह हैरानी होगी कि देश की निगहबानी करते हुए अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले सेना के जवानों के अलावा अन्य किसी भी सुरक्षा जवानों की शहादत को ‘शहीद’ का दर्जा नहीं दिया जाता है. इस अभागे देश के कर्ताधर्ताओं की नीच सोच का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि बच्चे-बच्चे की जुबान से गर्व के साथ प्रस्फुटित होने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह को भी दस्तावेजों में शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है.CRPF

यह सब कानूनी बाध्यता से बचने के लिए किया जाता है. कानून में दर्ज है कि शहीद हुए जवानों के परिजनों के जीवन-यापन का जिम्मा केन्द्र सरकार पर होगा. जिसके लिए केन्द्र सरकार को उनके भरण-पोषण के लिए पेट्रोल पम्प या गैस एजेंसी आवंटित करना होता है. इतना ही नहीं केन्द्र सरकार पर शहीद परिवार को चिकित्सकीय सुविधा और बच्चों के लिए शिक्षा सुविधा मुहैया कराने का भी जिम्मा है. लेकिन जिस देश में कारगिल के शहीद जवानों के परिजनों के लिए बने भवनों पर सफेदपोश गद्दारों का कब्जा हो, जिस देश के कर्ताधर्ताओं पर जवानों के कफन (ताबूत) तक को चुरा लेने का आरोप लगता हो, उस देश में अपने लहू से आजाद भारत की रेखा खींचने वाले या फिर राष्ट्र की आन-बान और शान पर मर मिटने वाले रणबांकुरों के खून से लथपथ वर्दी के कूड़े में फेंके जाने पर कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए.

जिस देश में अरबों-खरबों के घोटाले बाज पूजे जाते हों, जिस देश के माननीय संसद को मछली बाजार बना देने के आदती हो चुके हों और जिस देश में यादव सिंह जैसा प्यादा, लाल और नीली बत्तियों में चलने वाले आकाओं के साथ बेखौफ होकर देश का खून पीता हो उस देश में सैनिकों की शहादत को शहीद का दर्जा देने अथवा वर्दी, बैज और जूते आदि के रूप में उनकी अंतिम निशानी को सहेजकर रखने या उन्हे सम्मान देने की बात दोयम दर्जे की हो जाती है. अपने सच्चे नायकों के साथ ऐसी मक्कारी के बाद भी स्वयं को सरताज (‘मेरा भारत महानÓ) कहने का पाखण्ड करने वाले देश भारत जैसा शायद ही विश्व में कोई दूसरा देश हो.
हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय के लिए पूज्यनीय सैनिकों की शहादत पर ऐसी मक्कारी क्यों? सरकारों का तर्क हो सकता है कि संख्या में अधिसंख्य होने के कारण सभी शहिदों के परिवारों को पेट्रोल पम्प अथवा गैस एजेंसी देना मुमकिन नहीं. ऐसा तर्क बेहूदगी के अलावा और कुछ नहीं होगा. जब बिना किसी लागलपेट के हर साल अरबों-खरबों का बजट सिर्फ माननीयों तथा उच्च अफसरशाही के तामझाम और सुख-सुविधा के लिए खर्च किया जाता हो, तब पैसा बचाने अथवा धन की कमी का रोना, सिर्फ लफ्फाजी होा सकती है या टुच्चई.

जिस राष्ट्र में रक्षकों की जगह भक्षकों को पूजने की भयावह परम्परा विकसीत हो चुकी हो, जिस देश की सर्वोच्च संस्था (संसद) को तबाह होने से बचाने के लिए जवानों ने अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया हो, जहां घने जंगलों में नक्सलियों का नाश करने के लिए वीर सपूत कफन ओढऩे को तत्पर रहते हों और जिस देश में इतने बड़े त्याग-वलिदान की कीमत समाज सिर्फ

घडिय़ाली आसूं के रूप में चुकाता हो और नेतागण संसद में शब्दों की लफ्फाजी करते हुए शहादत देने वाले अर्धसैनिक बलों (बीएसएफ, सीआरपीएफ आदि के ) को सिर्फ जुबान से शहीद कहते हों, तो ऐसा दु:खद आचरण नमकहरामी और एहसान-फरोमोशी के अलावा और कुछ नहीं है. संसद के सुखद माहौल में रहने वालों को याद रखना होगा कि उनके महल और चौबारे सीमा पर जवानों की बलिदानी परम्परा के बदौलत ही सुरक्षित है. साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि अगर राष्ट्र की निगहबानी में जान गंवाने वालों को महज लफ्जों की लफ्फाजी मिल रही है तो उन्हे क्या मिलेगा जो राष्ट्र को सिर्फ लफ्फाजी ही देते रहे हैं.
किसी की लिखी पंक्तियां दिमाग को खरोचने लगती हैं कि-

नदी के घाट पर भी अगर सियासी लोग बस जाएं..
तो प्यासे होंठ दो बूंद पानी को तरस जाएं…
गनीमत है बादलों पर हुकूमत चल नहीं सकती..
वरना सारे पानी, इनके खेत में ही बरस जाएं…

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