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माननीयों के ‘क्षमा -पर्व’ के मायने..

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-तारकेश कुमार ओझा||
झारखंड की सीमा से लगते पश्चिम बंगाल के वन क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियां तब सिर उठा ही रही थी. इस बीच जिले में एक एेसा युवा आइपीएस अधिकारी आया जो कुछ ज्यादा ही जोशीला था. वह हर किसी को चोर – बेईमान समझ लेता था. माओवादियों के मददगारों की तलाश में राजधानी के आस – पास छापे पड़े तो उस युवा पुलिस अधिकारी ने कई बुद्धिजीवियों को भी हिरासत में ले लिया. जिनमें एक शिक्षक भी शामिल था. हालांकि जिला मुख्यालय में वरीय अधिकारियों के पूछताछ में उस पर प्रथम दृष्टया आरोप भी प्रमाणित नहीं हो सका, लिहाजा उसे छोड़ दिया गया. लेकिन पुलिस की गिरफ्त से छूटने के बाद वह शिक्षक घर नहीं गया, बल्कि रेलवे ट्रैक पर किसी ट्रेन के नीचे जाकर आत्महत्या कर ली. क्योंकि बेवजह पुलिस कार्रवाई से उसके आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगा था .unnamed

यह आम आदमी का आत्मसम्मान था, जो अनावश्यक रूप से गहरे तक आहत हुआ था. यहां पीड़ित के सामने माफी मांगने या लेने – देने का कोई विकल्प नहीं था. जैसा हम अपने देश के ‘ माननीयों ‘ के मामले में देखते – सुनते हैं. देश की सबसे बड़ी पंचायत की कार्यवाही को देखते हु्ए तो कुछ एेसा ही प्रतीत होता है मानो हमारे माननीयों का कभी खत्म न होने वाला क्षमा – पर्व चल रहा हो. चाहे जितनी बेसिर – पैर की बातें कह दें, किसी पर बेवजह कोई भी गंभीर आरोप लगा दें. बस माफी मांग ली, और बात खत्म. गलती करने वाले ही नहीं बल्कि उनका विरोध करने वाले भी माफी मांगने पर इतना जोर देते हैं कि लगता है कि बस इसी से दोषी का सात खून माफ हो सकता है.

हाल में एेसे कई उटपटांग बयान जनता ने सुने . फिर संसद में लगातार हंगामा , माफी मांगने का दबाव, माफी मांगी और मामला सलट गया. पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद हैं कल्याण बंद्योपाध्याय. पेशे से बड़े वकील तो हैं ही. जनाब आग उगलने वाले भाषणों के लिए भी खूब जाने जाते हैं. लोकसभा चुनाव 2014 के प्रचार के दौरान उन्होंने नरेन्द्र मोदी के हाथ – पांव तोड़ देने की बात कह कर खूब सुर्खियां बटोरी थी. चुनाव जीत कर संसद पहुंचे तो लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन पर भाजपा नेत्री की तरह बर्ताव करने का गंभीर आरोप लगा दिया. बात बढ़ी तो माफी मांग ली.

इधर सूबे की राजनीतिक परिस्थितयों से विचलित होकर कुछ दिन पहले उन्होंने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री को भी अपने निशाने पर लेते हुए आपत्तिजनक बातें कह दी. संसद में हंगामा हुआ और माफी मांगने का दबाव भी बढ़ा. पहले दिन तो उन्होंने माफी मांगने से यह कहते हुए साफ इन्कार कर दिया कि उन्होंने कोई गलत बात नहीं है. लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के इस आग्रह पर कि माफी मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता, उन्होंने यह कहते हुए माफी मांग ली कि यदि उनकी बातों से किसी की भावनाएं आहत हुई हों, तो वे क्षमा चाहते हैं. बस मामला खत्म.

इस बीच हमने कई माननीयों को अपनी बात पर क्षमा याचना करते देखा तो विरोधियों को इसके लिए दबाव बनाते हुए भी. लेकिन एक बंद्योपाध्याय ही क्यों उटपटागं और विवादास्पद बयान देने वाले ‘ नायाब हीरे ‘ तो अमूमन हर राजनीतिक पार्टियों के तरकश में सजे नजर आते हैं.

सवाल उठता है कि क्या देश की जनता माननीयों को अनवरत क्षमा पर्व मनाने के लिए ही चुनती है. या संसद की कार्यवाही क्षमा मांगने या लेने – देने से आगे भी बढ़ेगी. जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाली संसद की कार्यवाही के दौरान यदि हमारे माननीय इसी तरह क्षमा मांगते और करते हुए ही अपना समय बर्बाद करेंगे तो गंभीर मसलों पर चर्चा कब होगी. सबसे बड़ा सवाल यह कि क्षमा मांग लेने भर से क्या गंभीर से गंभीर बयानों और गलतियों पर पर्दा डालने का विकल्प आम आदमी के पास भी है. बेशक जवाब नहीं में ही है. आम आदमी के मामले में तो हम यही देखते हैं कि आधारहीन आरोप लगने पर भी पीड़ित के लिए इससे पीछा छुड़ा पाना मुश्किल होता है.

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