Loading...
You are here:  Home  >  दुनियां  >  देश  >  Current Article

बंदिशों के खब्ती देश में..

By   /  December 15, 2014  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-शेखर गुप्ता||

जब कभी किसी समस्या से निबटने के मामले में समाधान और विचारों के अभाव की वजह से हम गुस्से और आशंका से खीझे होते हैं और नतीजतन धीरे-धीरे आत्मबल खोते जाते हैं, तब हमारे पास अंत में एक ही नुस्खा बचता है: अमुक चीज पर प्रतिबंध लगा दो. जिस तरह समाचार चैनलों पर प्राइम टाइम का सबसे लोकप्रिय वाक्य ‘देश जानना चाहता है’ बन चुका है, ठीक उसी तर्ज पर ऐसा जान पड़ता है गोया किसी संकट में लाचारी के वक्त ‘देश प्रतिबंध चाहता है’ इस देश का राष्ट्रीय समाधान-वाक्य है.ban_s_650_121514012430

मैं ऐसा कहकर न तो नकल कर रहा हूं और न ही कोई मांग उठा रहा हूं. यह बस एक तथ्य है कि प्रतिबंध हर समस्या से निबटने का हमारा पसंदीदा नुस्खा बन चुका है. नेता तो इससे कम में बात ही नहीं करते. सड़कों पर उतरा पेशेवर क्रांतिकारी इतना सुनते ही संतुष्ट हो उठता है, क्योंकि उसे तो बस अपने तमगों के बीच सजाने के लिए किसी का सिर चाहिए था. और आम आदमी, जाहिर है, कुछ न समझते-बूझते हुए भी ताली बजाता रहता है.

इसका अपवाद अकेले दिल्ली की वह आम औरत है जो प्रतिबंधों की फेहरिस्त में पिछले हफ्ते की हमारी ताजा सनक पर अविवेकपूर्ण तरीके से ताली नहीं पीट रही, क्योंकि इससे उसकी आजादी और विकल्पों का हनन हुआ है जबकि उसकी सुरक्षा बढ़ाने के नाम पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाए हैं. घटनाओं को सिलसिलेवार याद करना उपयोगी होगा. सबसे पहले दिल्ली पुलिस टैक्सी सेवा संचालक कंपनी उबर को जांच में मदद करने के लिए नोटिस भेजती है.

उसकी नाकामी की आलोचना बढ़ती है, तो वह उबर पर प्रतिबंध लगा देती है. फिर कई लोग इस पर हंसने लगते हैं जबकि दिल्ली की खासकर कामकाजी महिलाएं उबल पड़ती हैं. तब ओला, क्विक, दिल्ली कैब समेत कई अन्य सेवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है. अगर आपने मूर्खताएं करने का फैसला कर ही लिया है तो बेहतर है कि संतुलन बनाए रखें. ऐसे फैसले ने दिल्ली में कामकाजी औरतों की बढ़ती आबादी को पांच साल पीछे धकेल दिया है और उन्हें काली-पीली खटारा कारों के रहमो-करम पर छोड़ दिया है.

याद करें वे दिन जब आप दिल्ली हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन पर पुलिस निगरानी वाले बूथों से प्री-पेड टैक्सियां लिया करते थे और अगली सीट पर साथ में एक चेले को बैठाए हुए ड्राइवर बीच रास्ते में गाड़ी रोक कर पैसे बढ़ाने की मांग करता था. पहले तो वह महंगे पेट्रोल की परिचित कहानी से अपनी बात शुरू करता और अगर आप प्रभावित न हुए तो धमकी पर उतर आता था. सोचिए कि अगर आप अपने परिवार के साथ रात में सफर कर रहे हों तो यह कितना भयावह होगा. और फिर एक अकेली औरत?

ठीक है कि उबर को अब भी अपनी गैर-जिम्मेदारी और ड्राइवर की जांच में लापरवाही को लेकर कई जवाब देने हैं, लेकिन पहले उस पर प्रतिबंध लगाना, फिर आइपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के लिए उस पर एफआइआर दर्ज करना और अंत में बाकी को इसके लपेटे में लेकर प्रतिबंध लाद देना तो खांटी भारतीय काम ही हो सकता है. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दूसरे राज्यों और शहरों में भी कैब कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की बात कह डाली है.

ऐसी बचकानी प्रतिक्रिया अगर महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री आर.आर. पाटिल जैसे मसखरे की ओर से भी आती तो चल जाता, जिसने समूचा एक दशक मुंबई के डांस बारों पर बंदिश लगाने में बरबाद कर दिया और अंतत: नाकाम रहा जबकि उनकी नाक के नीचे जब लश्करे-तैयबा शहर में घुसा तो उन्होंने यह कहते हुए हमसे धैर्य रखने की अपील की कि बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं. हैरत की बात है कि ऐसी प्रतिक्रिया काफी अनुभवी और समझदार राजनाथ सिंह की ओर से आई है जो देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

हो सकता है, उन्हें यह उम्मीद रही हो कि ऐसा करके पिछले हफ्ते सुकमा में माओवादी हमले के मामले में उनके मंत्रालय की नाकामी से ध्यान हटाया जा सकता है. हो सकता है कि मैं अपनी बात को कुछ ज्यादा लंबा खींच ले गया, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इससे उनके मातहत आने वाले सबसे चालाक विभाग दिल्ली पुलिस को समस्या की जड़ से ध्यान हटाने में जरूर मदद मिली है. समस्या की जड़ यह है कि अतीत में बलात्कार के आरोपी रहे शख्स को आखिर कैसे अनापत्ति प्रमाण पत्र दे दिया गया.

इस मामले में जो व्यापक त्रासदी है वह ठीक दो साल पहले घटी 16 दिसंबर की घटना जैसी है—बात यह होनी चाहिए थी कि सार्वजनिक स्थलों और सुविधाओं को महिलाओं के लिए सुरक्षित कैसे बनाया जाए जबकि यह बात कभी हुई ही नहीं. सारी बहस बदले की कार्रवाई पर आकर टिक गई—अपराधी को बधिया कर दो, सरेआम फांसी पर लटका दो. इस बहस से एक अधकचरे किस्म का नया बलात्कार निरोधक कानून भी निकल कर आ गया.

अब सारी कहानी घूम-फिर कर ‘विदेशी स्वामित्व वाली’ टैक्सी सेवाओं पर टिक गई है. अगर यही गिरोह नए सिरे से टैक्सी सेवाओं को लाइसेंस जारी करने जा रहा है, तो बेहतर है कि महिलाएं सूरज ढलने के बाद घरों में रहने की तैयारी कर लें या थोक में काली मिर्च का स्प्रे खरीद डालें.

हमारी व्यवस्था को बंदिशों की खब्त है. किसी भी खालिस लोकतंत्र के मुकाबले हम कहीं ज्यादा चीजों पर बंदिश लगाते हैं. किताब हो, फिल्म हो, विज्ञापन हो, खेल हो या फिर एक अदद टैक्सी सेवा, किसी को एतराज हुआ नहीं कि हम उस पर प्रतिबंध लगा देते हैं. हम पहले तो ऐसे जटिल कानूनी व नियामक ढांचे बनाते हैं कि कोई बिना गिरे चल ही न पाए. आप रीटेल कारोबार करने वाली कंपनी एमवे से पूछ कर देखिए- जिसका अमेरिकी सीईओ आंध्र में कुछ वक्त जेल में बिता चुका है—या फिर ताजा चमचमाती ई-कॉमर्स कंपनियों से पूछ लें.

ये कंपनियां अरबों की विदेशी पूंजी जुटा रही हैं, लेकिन हमारे यहां कहने को मल्टीब्रांड रीटेल अब भी गैर-कानूनी है. देर सिर्फ यह है कि कौन इनके खिलाफ एक देसी जनहित याचिका डालता है. या फिर और आसान यह होगा कि कहीं किसी पुलिसिए का दिमाग ठनक जाए- मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसा बंगलुरू में नहीं होगा- और वह इन्हें कानून तोडऩे पर गिरफ्तार कर ले. विदेशी पैसे से चलने वाले इन ठगों को कोई न कोई जरूर प्रतिबंधित कर देगा.

मैं यह लिखते वक्त अहमदाबाद के हवाई अड्डे पर बैठा अपने विमान का इंतजार कर रहा हूं, लिहाजा शराब पर यहां लगी बहुप्रचारित बंदिश के बारे में बात करना मौजूं होगा. ऐसा क्यों है? महात्मा गांधी गुजरात की धरती पर पैदा हुए थे इसलिए यहां कोई शराब नहीं पी सकता. देश के बाकी हिस्सों में कोई दिक्कत नहीं है जहां राष्ट्रपिता के सवा अरब बच्चे रहते हैं. कोई मुझे बताए कि आखिर यहां कैसे यह कामयाब है. आप किसी गुजराती से पूछ कर देखिए, खासकर अपने टैक्सी ड्राइवर से, वह फौरन समस्या-समाधान पर पहुंच जाएगा.

मेरा ड्राइवर कहता है, ”सर, शराब पर प्रतिबंध है, लेकिन इसकी तस्करी पर थोड़े ही है.” मैं बाहरी हूं, तो मैं परमिट भी ले सकता हूं. आप मान लें कि गुजरात में इन्हीं परमिटों के इर्द-गिर्द हफ्ता-वसूली की समूची अर्थव्यवस्था काम करती है. फिर, प्रतिबंध का उल्लंघन करके पीने का मजा ही कुछ और होता होगा. यहीं 1974 में आई आइ.एस. जौहर की फिल्म 5 राइफल्स का वह मजेदार गीत याद आता है: जब से सरकार ने नशाबंदी तोड़ दी, मानो या न मानो हमने पीनी छोड़ दी. मोरारजी देसाई के सऊदी अरब की तर्ज पर लगाई गई बंदिशों के बाद मुंबई सामान्य स्थिति में लौट रही थी, तब के हालात पर यह गीत लिखा गया था.

हम ऐसे तमाम काम सामान्य तौर से करते हैं जो प्रतिबंधित हैं. मसलन, आप रेलवे स्टेशन पर तस्वीरें नहीं उतार सकते, हवाई अड्डे को तो भूल ही जाएं. कानून में देश के किसी भी हिस्से का मानचित्र प्रकाशित करने की छूट नहीं है, सिवाय कुछ बुनियादी विवरणों या मौजूदा मानचित्रों के बड़े आकार के.

मैं आगे जो कहने जा रहा हूं उसमें थोड़ी सावधानी बरतनी होगी. आप देखिए कि किस तरह माननीय सुप्रीम कोर्ट भारतीय क्रिकेट को साफ-स्वच्छ बनाने की कवायद में उलझता जा रहा है जबकि प्रदर्शन और पैसे दोनों के ही मामले में इस खेल की सेहत पर्याप्त ठीक है. हम एकदिवसीय और टी-20 रैंकिंग में दूसरे स्थान पर हैं, टेस्ट में भले इधर बीच पिछड़े हों लेकिन लगातार एक साल से ज्यादा वक्त तक हाल में ही पहले स्थान पर बने हुए थे.

ज्यादा घरेलू क्रिकेट खेलने का मौका मिलेगा तो इसमें सुधार ही होगा, जैसा कि तमाम टीमों के साथ होता है. आज भी वही ‘सड़ा-गला’ बीसीसीआइ इस खेल को चला रहा है जिसने भारत को विश्व क्रिकेट की सत्ता और आर्थिकी के केंद्र में ला खड़ा किया है. सुप्रीम कोर्ट जिस ‘सड़ांध’ को दूर करने में जुटा है, वह मैच-फिक्संग को लेकर भी नहीं है बल्कि सट्टेबाजी और हितों के टकराव से जुड़ी है. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में सट्टेबाजी प्रतिबंधित है, लेकिन उतनी ही प्रचलन में है जितनी गुजरात में शराब.

इसे बड़ी आसानी से सुलझाया जा सकता है. इसके लिए बस सट्टेबाजी को कानूनी बनाना होगा और इस पर टैक्स लगाना होगा. इससे पारदर्शी प्रणालियां बनाई जा सकेंगी जिससे हितों का टकराव ज्यादा आसानी से पकड़ा जा सकेगा. सवाल है कि इस प्रतिबंध-प्रेमी देश में ऐसा करेगा कौन?

एक असंभव बचाव: भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट सीरीज शुरू होने वाली है. लिहाजा, हमारे सार्वजनिक विमर्श में एक और विचलन पर सवाल खड़ा करने का यह सही वक्त है. क्रिकेट से हमारी सार्वजनिक शब्दावली में आया लोकप्रिय मुहावरा है ‘बैकफुट पर आ जाना.’ क्रिकेट प्रेमियों को सतर्क हो जाना चाहिए, खासकर इसलिए क्योंकि सर्दियों में हो सकता है, हमें भोर में जागना पड़े जैसा कि पिछले मंगलवार को हुआ जब हमने डेविड वार्नर को स्पिन और पेस गेंदबाजी को सीधे बाउंड्री के पार पहुंचाते देखा था. वह भी बैकफुट पर रहते हुए!

मैं नहीं कह सकता कि हमने बैकफुट को बदनाम करना कब से शुरू किया. हमारे बीच कहीं ज्यादा क्रिकेट की पुख्ता विरासत रखने वाले राजदीप सरदेसाई मानते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ होगा क्योंकि भारतीय बल्लेबाज पारंपरिक रूप से फ्रंट फुट पर आगे बढ़ कर खेलते थे. इसकी कहीं ज्यादा खुराफाती व्याख्या यह हो सकती है कि हम हमेशा से ही छोटी और उछाल मारने वाली बाउंसर गेंदों से खौफ खाते रहे हैं जो हमें बैकफुट पर ‘धकेल’ देती थीं.

कुछ सर्वाधिक आक्रामक शॉट बैकफुट पर ही खेले गए हैं, खासकर कट, पुल, स्क्वेयर कट और हुक जैसे खतरनाक शॉट. या फिर सबसे करीने से खेले जाने वाले वे लेग ग्लांस जिन्हें रणजी ने ईजाद किया, लेट कट, या फिर कूल्हे को हल्का-सा मटका कर फाइन लेग से सिंगल चुरा लेने की कला जिसे रवि शास्त्री का मशहूर चपाती शॉट कहा जाता था. यही शॉट जब वीवीएस लक्ष्मण की कलाई से निकलता तो उस पर चौके की मुहर लगी होती थी.

एक बार मैंने सचिन से पूछा था कि वे उन शॉट की सूची बताएं जिन्हें वे अपने साथी खिलाडिय़ों से चुराना चाहेंगे, तब उन्होंने वीवीएस लक्ष्मण के ‘कूल्हे मटकाने वाले’ शॉट का जिक्र किया था. आजकल आप विराट कोहली को यह शॉट बैक फुट पर कवर्स में लगाते हुए देख सकते हैं.

इस स्तंभ का विषय प्रतिबंध की सनक है, तो मत भूलें फिल ह्यूग्स को जो बैकफुट पर हुक करते एक बाउंसर से जान गंवा बैठे और बाउंसर पर प्रतिबंध लगाने की मांग जारी है. चाहे जो हो, आधुनिक शैली के टी-20 मार्का क्रिकेट ने बल्लेबाजी की तकनीकों को दोबारा गढ़ा है. अब तो बस गेंद को देखिए और शॉट जड़ दीजिए.

क्रिकेट की इस नई साहसिक दुनिया में जहां सहवाग, वार्नर और डीविलियर्स जैसे खिलाड़ी फ्रंट फुट पर भी कट मार सकते हैं और किताबी जमीनी शॉट खेलने के बजाए पॉइंट पर हवा में गेंद को उछाल सकते हैं, आपको अपनी शब्दावली ही दुरुस्त करनी पड़ेगी. कुछ नहीं तो बैक फुट के बदकिस्मत मुहावरे को तो अब दफना ही दीजिए.
सौजन्य: इंडिया टूडे

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 3 years ago on December 15, 2014
  • By:
  • Last Modified: December 15, 2014 @ 2:06 pm
  • Filed Under: देश

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

जौहर : कब और कैसे..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: