/वसुंधरा सरकार: एक साल का सफर..

वसुंधरा सरकार: एक साल का सफर..

-अभिषेक व्यास||

देखते-देखते प्रदेश की वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार आगामी 13 दिसम्बर को अपना एक साल पूरा कर लेगी. हांलाकि रस्मी तौर पर सरकार की ओर से प्रचार साहित्य-बुकलेट्स, फोल्डर और अखबारों में उपलब्धियों के विज्ञापन आदि देने के साथ ही राजधानी से लेकर जिलास्तर तक सरकार की वाहवाही के चर्चे जहां-तहां होंगे ही. जनप्रतिनिधियों के तौर पर विधायकों, सांसदों सहित अनेक छोटे-बड़े नेता सरकार की उपलब्धियों के कसीदे पढ़ने में कोई कोर-कसर अपनी ओर से नहीं छोड़ेगें, यह एक ऐसी रस्म है जो प्रत्येक सरकार को करनी होती है.v-raje-bjp

यह एक पहलू है पर इसके उल्ट दूसरा पहलू भी है जिसे सरकारें खुद देख नहीं पाती या देख कर भी अनदेखा करती रही हैं. यहां तक कि उसके नुमाइंदे भी समझना नहीं चाहते, लेकिन आम जनता इसे बखूबी समझने लगी है, इसकी वजह भी साफ यह है कि उनका ही वास्ता सरकार की कारगुजारियों से हर वक्त पड़ता रहता है. राज द्वारा जनहित के कार्य यानि वह योजनायें जो आम लोगों को राहत पहुंचाने के लिहाज से कितनी शुरू की गई है और उससे कितने लोग फायदा उठा रहे हैं या भविष्य में कितनों के काम आयेगी. यही एक कसौटी होनी चाहिए. इसके साथ ही यह देखा जाना भी जरूरी है कि सही मायनों में राहत जरूरतमंदों के पास पहुंच पा रही है या बीच में ही कहीं खो जाती है और यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही सरकार की विफलता ही मानी जायेगी.

भाजपा सरकार को अपना एक साल पूरा करने पर उसे याद दिलाना जरूरी है कि एक साल पहले जब कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार सत्तारूढ़ थी, तब तात्कालीन सरकार के विरूद्ध चुनावों में भाजपा ने वसुंधरा राजे को ही बतौर मुख्यमंत्री के रूप में मैदान में उतारा था. पूरे चुनाव अभियान में यदि संक्षेप में कहा जाये तो वसंधरा राजे ने ही कांग्रेस सरकार की नाकामयाबियों मसलन प्रदेश व्याप्त भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और कानून व्यवस्था की नाकामी को लेकर तीखे हमले करते हुए आम जनता से निकम्मी सरकार को उखाड़ फेंकने के साथ ही सुखद और सुरक्षित भविष्य के लिए भाजपा को चुनने का आव्हान किया था.

परिणामस्वरूप यहां की जनता ने भाजपा और वसुंधरा राजे पर भरोसा करते हुए उसे दो सौ सीटों में से एक सो तिरहसठ से जीता कर सदन में भारी बहुमत दिया. लेकिन आज प्रदेश की जनता के मन यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि-आज से एक साल पहले जो हालात थे क्या सचमुच ही उसमें तब्दीली आई है ? क्या आज आम आदमी की तकलीफों में कोई कमी आती दिख रही है ? क्या नई सरकार ने अस्तित्व में आने के बाद जो वायदे किये थे यह सरकार कितने पूरे कर पाई है ? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर सरकार में बैठे खेवनहारों को गम्भीरता से सोचना चाहिए.

फिलवक्त अभी प्रदेश में लूट, चोरी, डाकेजनी, बलात्कार और गुण्डागर्दी की खबरों से अखबार रोज ही रंगे होते हैं. जहां तक भ्रष्टाचार का प्रश्न है उसमें भी कोई कमी आती नजर नहीं आ रही है. बेरोजगारी अपनी जगह पर कायम है, लगभग सभी खास-खास महकमों में पद रिक्त पड़े हैं. आम और खास आदमी की जिन्दगी से जुड़ी अस्पतालों में चिकित्सकों, सहायक कर्मियों व तकनीशियनों के पद रिक्त पड़े हैं जिससे जन-स्वास्थ्य को बड़ा खतरा पैदा हो चुका है. इसके अलावा भी अन्य महकमों में भी स्टाॅफ की कमी से लोगों के रोजमर्रा क काम प्रभावित हो रहे हैं और लोगों को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग का रवैया तो और भी उदासीनता लिए हुए है, विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पद, समय-समय पर होने वाले निरीक्षण का अभाव और सामान्यीकरण के नाम पर ढुलमुल तरीके के चलते शिक्षा के क्षेत्र में अराजकता की स्थिति बनी हुई है. इसी वजह से गांवों में स्वयं ग्रामीण स्कूलों के ताला लगा कर अपना रोष प्रकट कर रहे हैं. यह कैसी विडम्बना है कि एक ओर तो बच्चों को स्कूल में बुलाने के लिए मुहिम चलाई जाती है वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग द्वारा ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं जिससे विद्यार्थी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं.
इन्हीं सब हालातों की रोशनी में यदि अपने शहर जैसलमेर पर निगाह डालें तो कमोबेश ऐसे ही हालात हैं. अस्पताल में डाक्टरों तक के पद खाली है. विधायक, कलक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के दौरे यदाकदा होते रहते हैं पर असली रोग का ईलाज नहीं हो पाने से अस्पताल खुद बीमार है. ट्रोमा सेन्टर और आई.सी.यू. वार्ड का निर्माण हुए एक अर्सा बीत चुका है, दुर्भाग्य से उसका ताला आज तक नहीं खुल पाया है. शहर के तमाम शहरी तो साधन सम्पन्न है नहीं ज्यादा आबादी तो गरीबों की ही है, मजबूरन उन्हें अन्य जगहों पर भागना पड़ता है. निःशुल्क दवाइयों मे भी काफी कमी करदी गई है-यह योजना गरीब के लिए किसी सौगात से कम नहीं थी उसे भी छीना जा रहा है.

प्रधानमंत्री द्वारा जो साफ-सफाई का मंत्र दिया जो आम आदमी का ही होकर रह गया है. नगरपरिषद् जैसी संस्था जिस पर उक्त कार्य की जिम्मेदारी है वह पूरे तौर पर गैरजिम्मेदार हो चली है. हांलाकि अभी तो नया-नया ही बोर्ड वजूद में आया है पर परिषद् तो पहले से चली आ रही है. लेकिन उदासीनता और लापरवाही की वजह से आम रास्तों की जगह-जगह से टूटी-फूटी सड़कें और उस पर बहता गंदा पानी सबको दिख रहा है लेकिन दुर्भाग्य से अधिकारियों को ही नहीं दिख रहा. शहर के अन्दरूनी हिस्सों का तो खुदा ही हाफिज है, कहने को स्वर्णनगरी है इस नाते हजारों देशी-विदेशी सैलानी बड़ी तादाद में रोज ही आ रहे हैं परन्तु किसे परवाह ?

बहरहाल इतनी अव्यवस्था के उपरांत भी अभी हाल ही में सम्पन्न हुए स्थानीय नगर निकायों के चुनावों में जनता ने भाजपा को ही जिताया है. अपने यहां भी भाजपा का बोर्ड बना है अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कसौटी पर कितना खरा उतरेगा. अभी तो यह जरूर लगता है कि जनता का विश्वास भाजपा पर कायम है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर के चलते ही महाराष्ट्र और हरियाणा में पार्टी को आशातीत सफलता मिली थी और इसका ही असर राजस्थान के निकाय चुनाव पर भी साफ दिख रहा है पर कब तक एक व्यक्ति के सहारे यह सफलतायें कायम रह पायेंगी. ऐसा पहली बार भी नहीं है, देश की जनता देती है उसे दिल खोल कर देती है और साथ ही वह सूद सहित वसूलना भी जानती है.

यह साल गया सो तो गया, वसुंधरा राजे के हाथ में अभी भी चार साल का समय शेष है, अपने बीते वर्ष पर आत्मचिंतन करते हुए-कुशल प्रशासन से अधिकतम जनहित के कार्य करने का प्रयास करे. तमाम विभागों में आन्तरिक समन्वय के साथ ही व्यावहारिक सूझबूझ का दृष्टिकोण बरतते हुए आम जनता को राहत पहुंचायें ताकि उसे महसूस हो कि सही में राज बदला है और अच्छे दिन आने वाले है.

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