/कुछ छिटपुट बातें, कुछ छिटपुट विचार..

कुछ छिटपुट बातें, कुछ छिटपुट विचार..

-अभिरंजन कुमार||

झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनाव-नतीजों के बाद कई छिटपुट विचार मन में आ रहे हैं.

मसलन-

1. चलिए झारखंड की खानें-खदानें अब पूरी तरह भाजपा के नाम हो गई हैं.writing-hand-silhouette-e1406849017403

2. वैसे सोरेन-परिवार का पूरा पतन अब भी नहीं हो पाया है, हो जाता तो अच्छा ही था. ये लोग न ईमानदार हैं, न कॉम्पीटेंट हैं.

3. नए बन रहे जनता परिवार के साथ परिवार तो है, लेकिन जनता नहीं है.

4. जम्मू-कश्मीर के दोनों हिस्सों का जनादेश यह है कि भाजपा और पीडीपी मिल-जुलकर सरकार बनाएं. राज्य का एक हिस्सा बीजपी को चाहता है. दूसरा हिस्सा पीडीपी को चाहता है. इसलिए किसी भी दूसरे फॉर्मूले से राज्य के दोनों हिस्सों की जनाकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता.

5. कांग्रेस अपना नेतृत्व नहीं बदलकर न सिर्फ़ अपने हाथों पर कुल्हाड़ी मार रही है. बल्कि देश में लोकतंत्र के प्रति भी बड़ा अपराध कर रही है. लोकतंत्र के लिए यह हमेशा बेहतर होता है कि देश के सामने एक से अधिक मज़बूत नेताओं का विकल्प रहे. विपक्ष का नेता भी सत्तारूढ़ पार्टी के नेता की टक्कर का हो. सोनिया बीमार हैं और राहुल बाबा बीमारू हैं. प्रियंका इन दोनों का और भी घटिया विकल्प साबित होंगी.

6. विकास के मुलम्मे में लिपटा हिन्दुत्व अभी इस देश में बिकेगा.

7. इस देश ने अल्पसंख्यकों का ध्रुवीकरण तो देखा है. बहुसंख्यकों का ध्रुवीकरण अभी तक पूरा नहीं देखा है. जिस दिन बहुसंख्यकों का पूरा ध्रुवीकरण होगा. उस दिन आरएसएस-संचालित भाजपा राजीव गांधी वाली कांग्रेस की 415 लोकसभा सीटों का रिकॉर्ड भी तोड़ सकती है.

8. इसलिए कांग्रेस और जनता परिवार समेत तमाम विपक्ष को यह समझ लेना चाहिए कि अगर वे अब भी जातिवाद और अल्पसंख्यक-आधारित ध्रुवीकरण-पॉलिटिक्स करते रहे. तो उनका सत्यानाश सुनिश्चित है.

9. भाजपा के पास हिन्दुत्व को सुलगाने का फॉर्मूला तो है. लेकिन समावेशी विकास वाली जादू की कोई छड़ी नहीं है. इस वक़्त विपक्षी दलों के लिए उम्मीद की एकमात्र किरण यही है.

10. इसलिए विपक्षी दलों को चिरकुट राजनीति छोड़कर अब इन पांच बातों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए- (A) जातिवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाली राजनीति छोड़ो. (B) भ्रष्टाचार और परिवारवाद छोड़ो (C) अपराधियों से नाता तोड़ो और साफ़-सुथरे लोगों को आगे लाओ. (D) समावेशी विकास और बेहतर आर्थिक नीति का फॉर्मूला ढूंढो. (E) जनता के बुनियादी मुद्दों पर ईमानदारी से उनके साथ खड़े हो जाओ और संघर्ष करो.

11. सिर्फ़ एक-डेढ़ साल पहले तक देश की जनता की नाराज़गी कांग्रेस और भाजपा दोनों से बराबर थी. दोनों पर भ्रष्टाचार के कलंक बराबर थे. इसलिए अन्ना हज़ारे और केजरीवाल कंपनी के आंदोलन को इतिहास अब इस रूप में दर्ज करेगा कि उनके अधकचरेपन. बेवकूफ़ियों. महत्वाकांक्षाओं की टकराहट. सत्ता-लोलुपता. हड़बड़ाहट और अनुभवहीनता के चलते भ्रष्टाचार का तो बाल भी बांका नहीं हुआ. लेकिन कांग्रेस को नुकसान और भाजपा को फायदा ज़रूर पहुंचा.

12. अन्ना का रुझान दक्षिणपंथी था और केजरीवाल का रुझान वामपंथी था. एक को गांधी. तो दूसरे को नेहरू बनना था. दोनों के अधकचरेपन और मीडिया-पोषित पब्लिसिटी से जनित रातों-रात पैदा हुई महत्वाकांक्षा की वजह से अब इस देश ने एक ही जैसी दो पार्टियों कांग्रेस और भाजपा में से भाजपा को बेहतर विकल्प मान लिया है और अगले कई वर्षों तक अब हम देश के बुनियादी सवालों पर किसी जन-आंदोलन को अंगड़ाइयां लेते हुए नहीं देख पाएंगे. इस दौरान देश में अगर कभी उबाल दिखेगा तो सिर्फ़ भावनात्मक मुद्दों पर.

13. भाजपा देश के लोगों को अगर रोटी (विकास) सुनिश्चित कर पाई. तो उसका राम-नाम बहुसंख्य आबादी में बिकाऊ. टिकाऊ और राम-बाण है. लेकिन अगर वह लोगों को रोटी नहीं दे पाई. तो इस देश की जनता को सिर्फ़ राम-नाम का झुनझुना नहीं चाहिए. रोटी के साथ राम चलेगा. रोटी के बिना राम नहीं चलेगा.

14. जिस दिन भी मोदी-ब्रिगेड का पतन होगा. भाजपा में भी नेतृत्व का वैसा ही संकट होगा. जैसा कि आज कांग्रेस में दिखाई देता है. मोदी-काल में धीरे-धीरे बीजेपी के बड़े नेताओं का मनोबल टूटता चला जाएगा और छोटे नेताओं का अहंकार बढ़ता चला जाएगा.

15. फिलहाल मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत वाले लक्ष्य के पूरा होने में कोई बड़ी अड़चन नज़र नहीं आ रही है. देश की राजनीति में बीजेपी अब धीरे-धीरे कांग्रेस की जगह ले लेगी और बाकी सारी पार्टियां जैसे अब तक ग़ैर-कांग्रेसवाद की राजनीति करती थीं. वैसे ही अब ग़ैर-भाजपावाद की राजनीति करेंगी. ऐसा कम से कम दस-पंद्रह साल तक चल सकता है.

16. नरसिंह-अवतार के दौरान (1991) खुली अर्थव्यवस्था करीब ढाई दशकों की क्रमिक प्रक्रिया के बाद अब पूरी तरह खुल चुकी है. अब इस देश को सिर्फ़ पूंजीपति चलाएंगे. पूंजीपति चाहे देशी हो या विदेशी. एक छोटी आबादी को इसका फायदा भी होगा. लेकिन बड़ी आबादी को इसका नुकसान होना सुनिश्चित है.

17. इस पूंजीवादी मॉडल को अभी देश के मध्य-वर्ग का भरोसा प्राप्त है. निम्न वर्ग अभी समझ नहीं पा रहा है. उच्च वर्ग अपना खेल खेल रहा है. इसलिए अगले कुछ सालों या दशकों में वर्ग-आधारित राजनीति जाति-आधारित राजनीति की जगह ले सकती है. कम्युनिस्ट पार्टियां रिवाइव न करें. लेकिन कम्युनिस्ट विचार रिवाइव कर सकते हैं.

18. हम चाहे किसी से सहमत हों या असहमत. लेकिन लोकतंत्र में आस्था रखना बेहद ज़रूरी है. हर चुनावी नतीजा जनता की इच्छा को ही व्यक्त करता है. इसलिए अगर आज देश की जनता मोदी को चाहती है. तो मोदी बेहतर हैं. इसलिए आरएसएस. भाजपा और मोदी के सभी आलोचकों से ख़ास अपील है कि वे न परेशान हों. न किसी बात को लेकर आशंकित हों. भारत जैसे अति-विविधता वाले मुल्क में एक दिन में कोई एक नेता. एक सरकार कुछ नहीं कर सकती. हौवा खड़ा करना अलग बात है. हौवे से डरोगे. तो फिर जीना छोड़ दो.

19. भारत में लोकतंत्र दिनोंदिन परिपक्व हो रहा है. देश का हर नागरिक शिक्षित और जागरूक हो. तो इसे और मज़बूती और परिपक्वता मिलेगी. लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती असमानता और निजी माफिया का फैलता साम्राज्य चिंता की बात है. देश के सभी नागरिकों को “एक समान शिक्षा” मिले. इसके लिए हमें संघर्ष करना होगा.

20. बहरहाल. देश के युवाओं पर भरोसा है. वे जो करेंगे. अच्छा करेंगे. किसी को भी एक हद से ज़्यादा चहकने और बहकने का मौका नहीं देंगे.

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