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माफियाओं व ठेकेदारों की सरपरस्त पुलिस..

By   /  December 31, 2014  /  No Comments

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मलेथा में चल रहे स्टोन क्रेशर के खिलाफ के आन्दोलन के दौरान कल रात क्रेशर मालिक द्वारा एक आंदोलनकारी को पीटा गया.
पुलिस गाँव वालों की बात सुनने के बजाय उल्टा ग्रामीणों के हड़का रही है. पुलिस ठेकेदार की भाषा का प्रयोग कर रही है.
आन्दोलन अभी भी जारी.

क्रमिक अनशन तीसरे दिन भी जारी.

देर रात 100 नंबर की सहायता लेके SHO को मजबूर किया मेडिकल करवाने को. तब जाके रिपोर्ट लिखी गयी.
धमकाने के दौर में व्यक्तिगत रूप से डराया जा रहा था.
चूँकि ग्रामीणों का विश्वास मुझ पर है तो ग्रामीणों के सामने व्यतिगत मुझे मेरे साथ कुछ बुरा होने की बात से भपका दिया जा रहा था.
SHO : तुम्ही ही समीर रतूड़ी
मै: जी मेरा नाम ही है.
SHO : तुमसे अलग से बात करूँगा.
मै : बिलकुल जब चाहें जरुर जी.

कुछ देर ग्रामीणों से बातचीत के दौरान जब SHO अनदेखी कर रहे थे तब मैंने उनसे कहा की घायल व्यक्ति आपके सामने पड़ा है और आप उल्टा गाँव वालों को हड़का रहे है तो वो बोले :
SHO : ज्यादा मत बोलो बहुत कुछ हो सकता है.
मै : आप सिर्फ मुझे मार सकते हो, 1995 के टिहरी आन्दोलन का संज्ञान ले लीजिये जितनी मार मैंने उस समय खाई थी उससे ज्यादा तो नहीं पड़ेगी.
SHO: (इन्कार करते हुए) कुछ और भी हो सकता है
मै : जेल भेजेंगे – तैयार हूँ मै

कुछ देर ग्रामीणों के साथ और बहस के बाद मैंने फिर SHO से कहा की ठेकेदारों की भाषा मत बोलिए
SHO : गाँव में आग मत लगवाइये
मै : मै सिर्फ सच का साथ दे रहा हूँ. न मेरी जमीन है न मेरा खेत है लेकिन देश का नागरिक हूँ इसलिए यहाँ के लोगों के लिए लड़ना मेरा कर्तव्य है.

सारी प्रकरण ग्रामीणों के सामने हुआ.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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