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विज्ञापन की दुनिया का गोलमाल..

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-आलोक पुराणिक||

रोहित शर्मा ने हाल ही में जो धुआंधार पारी खेली है, उसका एक सीधा सा परिणाम कुछ दिनों में आपके सामने दिख सकता है। कोई कोल्‍ड-ड्रिंक बता दावा कर सकता है कि रोहित शर्मा की धुआंधारी पारी की वजह दरअसल अमुक वाला को‍ल्‍ड ड्रिंक है। रोहित शर्मा भी हंसते हुए इस बात को मानते दिख सकते हैं। कोई मिल्‍क पाऊडर भी ऐसा दावा कर सकता है। फिर चश्‍मे का कोई ब्रांड ऐसा दावा कर सकता है। फिर कोई बनियान, कोई पैंट, कोई टूथपेस्‍ट, कोई गोरा बनाने वाली क्रीम ऐसे दावे करती दिख सकती है और रोहित शर्मा मानते चले जाएंगे।CRICKET-INDIA/

हो न हो, कुछ दिनों बाद रोहित की धुआंधार परफारमेंस के लिए सारा क्रेडिट अमुक कोल्‍ड ड्रिंक से लेकर गोरा बनाने वाली क्रीम को ही मिलता दिखने लगे। रोहित की मेहनत, लगन, टेक्‍नीक के खाते इत्‍ता सा क्रेडिट नहीं रहेगा। यह दुनिया का चलन है साहब, अपनी विज्ञापन की दुनिया का चलन है। किसी कामयाब बंदे की बनियान-चड्ढी तक को क्रेडिट मिल जाता है जबकि नाकामयाब का सूट भी वह कंपनी उतरवा लेती है, जिसके सूट की ब्रांड-अंबेसडरी व‍ह खिलाड़ी कुछ समय पहले तक कर रहा था।

उफ्फ, पर कामयाबी के बाद की इश्तिहारी बाढ़ में हर बंदे को इश्तिहार चुन-चुनकर करने चाहिए। कई बार इंप्रेशन बहुत गलत चला जाता है और इश्तिहार बिल्‍कुल झूठे लगने लगते हैं। जैसे एक मशहूर क्रिकेटर एक मोटरसाइकिल के इश्तिहार में आते हैं। यह इश्तिहार कतई झूठा लगता है। कारण वह क्रिकेटर इन दिनों सफलता की जिस मंजिल पर विराजमान हैं, वहां कार नहीं-कारों का काफिला उनकी सेवा में लगा होता है। बाइक का इश्तिहार तो उस खिलाड़ी को करना चाहिए, जो टीम से हट चुका है और पेट्रोल सस्‍ता होने के बावजूद जिसे कार चलाना महंगा लगता है। ऐसा खिलाड़ी बाइक का इश्तिहार करे, तो विश्‍वसनीय लगता है। तब इश्तिहार रीयल जैसा लगता है। अन्‍यथा मशहूर क्रिकेटर को उस बाइक पर कोई कभी नहीं देखेगा फिर भी वह उस बाइक पर चलने का संदेश दे रहे हैं।

इश्तिहार को विश्‍वसनीय तो लगना ही चाहिए। मथुरा से सांसद हेमामालिनी एक वाटर-प्‍यूरीफायर के इश्तिहार में आती हैं। सब जानते हैं कि मथुरा की यमुना बहुत गंदी है। वाटर प्‍यूरीफायर देखकर लगता है कि सांसद परोक्ष रूप से यह संदेश दे रही हैं कि टुन्‍नू से साइज के वाटर प्‍यूरीफायर से विराट गंदी यमुना को साफ कर लो। यह अविश्‍वसनीय है। उनके वाटर प्‍यूरीफायर से यमुना साफ नहीं हो सकती है। हेमा मालिनी बहुत विश्‍वसनीय लगेंगी अगर वह गंदे पानी से होने वाले रोगों के इलाज की दवा का इश्तिहार करें- कैसा भी पानी पी जाएं, फलां टेबलेट लेकर जी जाएं।

विश्‍वसनीयता होनी चाहिए, भले ही राजनीतिक बयानों में न हो, तो पर इश्तिहारों में तो होनी ही चाहिए।

अभी एक इश्तिहार देखा, जिसमें करीना कपूर ग्रेटर नोएडा में टू ओर थ्री वेडरूम फ्लैटों के इश्तिहार में थीं। इश्तिहार का सार यह था कि करीना कपूर ग्रेटर नोएडा में इन फ्लैटों को पसंद करती हैं। ग्रेटर नोएडा दिल्‍ली के पास के इलाके नोएडा के आगे एक ऐसी बस्‍ती है, जिसमें इन दिनों हजारों की तादात में फ्लैट बन रहे हैं। फ्लैट बन ज्‍यादा रहे हैं, बिक कम रहे हैं।

पर करीना कपूर को अपनी रेपुटेशन देखनी चाहिए कि नहीं! अभी दिल्‍ली की आम पब्लिक ही ग्रेटर नोएडा के इस इलाके में फुल जोरदारी से बसने को तैयार नहीं हो रही है और करीना कपूर जैसी इतनी बड़ी स्‍टार ग्रेटर नोएडा में आकर बसने की बात कह रही है। ऐसे इश्तिहारों से मैसेज गलत जाता है कि कहीं करीना कपूर की फिल्‍में इतनी खराब तो नहीं जा रही हैं कि माली हालत खराब होने की वजह से वह ग्रेटर नोएडा के टू-थ्री बेडरूम फ्लैट में बसने की सोच रही हैं। यह तो अपने हाथों अपनी ही बेइज्‍जती करवाने वाली बात हो गई। हालांकि अपने समय के चर्चित अभिनेता गोविंदा भी कर रहे हैं ग्रेटर नोएडा के इन फ्लैटों का विज्ञापन, पर उनकी बात कुछ हद तक समझ में आती है। कारण, अब उन्‍हें पांच-सात सालों में एकाध फिल्‍म ही मिलती है, सो वह तो सोच सकते हैं कि चलो यहां आकर बस लो और कभी-कभार मुंबई चले जाओ शूटिंग के लिए। पर करीना कपूर ग्रेटर नोएडा आएं, यह बात समझ नहीं आती।

खैर रोहित शर्मा, तुम भी कहीं ग्रेटर नोएडा ना आ जाना!

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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