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अनिवार्य मतदान के शंखनाद का सबब..

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-ललित गर्ग||

चुनाव सुधारों एवं अनिवार्य मतदान के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों सुदृढ़ करने के लिये ‘चलो वोट देने’ अभियान का शुभारंभ निश्चित ही भारतीय लोकतंत्र को अधिक स्वस्थ, सुदृढ़ एवं पारदर्शी बनाने की एक सार्थक मुहिम है. भारतीय मतदाता संगठन का गठन और इसके द्वारा मतदान को प्रोत्साहन देने के उपक्रम एक क्रांतिकारी शुरूआत कही जा सकती है. इसका स्वागत हम इस सोच और संकल्प के साथ करें कि हमें इन दिल्ली विधानसभा और उसके बाद होने वाले चुनावों में भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक अपराधीकरण पर नियंत्रण करना है.compulsory voting

‘चलो वोट देने’ अभियान से मतदान का औसत प्रतिशत 55 से 90-95 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य भारतीय राजनीति की तस्वीर को नया रूख देगा. मतदान करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और कर्तव्य भी है, लेकिन विडम्बना है हमारे देश की कि आजादी के 67 वर्षों बाद भी नागरिक लोकतंत्र की मजबूती के लिये निष्क्रिय है. ऐसा लगता है जमीन आजाद हुई है, जमीर तो आज भी कहीं, किसी के पास गिरवी रखा हुआ है.

अनिवार्य मतदान की दृष्टि से भी श्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए एक अलख जगाई थी. उस समय सारे देश में एक प्रकंप हुआ, भारतीय राजनीति में एक भुचाल आ गया. शायद इसलिए कि इस क्रांतिकारी पहल का श्रेय नरेंद्र मोदी को न मिल जाए? उस समय यह पहल इतनी अच्छी रही कि इसके विरोध में कोई तर्क जरा भी नहीं टिक सका. गुजरात में अनिवार्य वोट के लिये कानून बना. वैसा ही आज नहीं तो कल, सम्पूर्ण राष्ट्र एवं राज्यों में लागू करना ही होगा और इस पहल के लिये सभी दलों को बाध्य होना ही होगा, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में यह नई जान फूंक सकती है. अब तक दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है लेकिन यही व्यवस्था अगर भारत में लागू हो गई तो उसकी बात ही कुछ और होगी और वह दुनिया के लिये अनुकरणीय साबित होगी. यदि ऐसा हुआ तो अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पुराने और संशक्त लोकतंत्रों को भी भारत का अनुसरण करना पड़ सकता है, हालांकि भारत और उनकी परिस्थितियां एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत है. भारत में अमीर लोग वोट नहीं डालते और इन देशों में गरीब लोग वोट नहीं डालते.

भारत इस तथ्य पर गर्व कर सकता है कि जितने मतदाता भारत में हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं और लगभग हर साल भारत में कोई न कोई ऐसा चुनाव अवश्य होता है, जिसमें करोड़ों लोग वोट डालते हैं लेकिन अगर हम थोड़ा गहरे उतरें तो हमें बड़ी निराशा भी हो सकती है, क्या हमें यह तथ्य पता है कि पिछले 67 साल में हमारे यहां एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, जिसे कभी 50 प्रतिशत वोट मिले हों. कुल वोटों के 50 प्रतिशत नहीं, जितने वोट पड़े, उनका भी 50 प्रतिशत नहीं. गणित की दृष्टि से देखें तो 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में सिर्फ 20-25 करोड़ लोगों के समर्थनवाली सरकार क्या वास्तव में लोकतांत्रिक सरकार है? क्या वह वैध सरकार है ? क्या वह बहुमत का प्रतिनिधित्व करती है? आज तक हम ऐसी सरकारों के आधीन ही रहे हैं, इसी के कारण लोकतंत्र में विषमताएं एवं विसंगतियों का बाहुल्य रहा है, लोकतंत्र के नाम पर यह छलावा हमारे साथ होता रहा है. इसके जिम्मेदार जितने राजनीति दल है उतने ही हम भी है. यह एक त्रासदी ही है कि हम वोट महोत्सव को कमतर आंकते रहे हंै. जबकि आज यह बताने और जताने की जरूरत है कि इस भारत के मालिक आप और हम सभी हैं और हम जागे हुए हैं. हम सो नहीं रहे हैं. हम धोखा नहीं खा रहे हैं.

अनिवार्य वोटिंग का वास्तविक उद्देश्य है, जन-जन में लोकतंत्र के प्रति आस्था पैदा करना, हर व्यक्ति की जिम्मेदारी निश्चित करना, वोट देने के लिए प्रेरित करना. एक जनक्रांति के रूप भारतीय मतदाता संगठन इस मुहिम के लिये सक्रिय हुआ है,यह शुभ संकेत है. इस संगठन के द्वारा यदि कोई वोट देने न जाए तो उसे अपराधी घोषित नहीं किया जायेगा और न उसे जेल में डाला जायेगा. लेकिन इस तरह के जन-आन्दोलन के साथ-साथ भारतीय संविधान में अनिवार्य मतदान के लिये कानूनी प्रावधान बनाये जाने की तीव्र अपेक्षा है. बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, ग्रीस, बोलिनिया और इटली जैसे देशों की भांति हमारे कानून में भी मतदान न करने वालों के लिये मामूली जुर्माना निश्चित होना चाहिए. पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस सरकारी नौकरी, बैंक खाता खोलने आदि के लिये मतदान की बाध्यता निश्चित होनी चाहिए. जो व्यक्ति चार-पाँच बार लगातार मतदान न करे तो उसका मताधिकार ही छिन लेने की व्यवस्था आदि के द्वारा ही हम वास्तविक अर्थों में गिरते मतदान के प्रतिशत को उपर उठा सकते है और लोकतंत्र में हर नागरिक की सहभागिता एवं जिम्मेदारी को सुनिश्चित कर सकते हैं. इस तरह के दबावों से ही हम मतदान का 90-95 प्रतिशत का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे.

यदि भारत में मतदान अनिवार्य हो जाए तो चुनावी भ्रष्टाचार बहुत घट जाएगा. वोटरों को मतदान-केंद्र तक ठेलने में अरबों रूपया खर्च होता है, शराब की नदियॉं बहती हैं, जात और मजहब की ओट ली जाती है तथा असंख्य अवैध हथकंडे अपनाए जाते हैं. यह भी देखा गया है कि चुनावों मंें येन-केन-प्रकारेण जीतने के लिये ये ही राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदान को बाधित भी करते हैं और उससे भी मतदान का प्रतिशत घटता है. अनिवार्य मतदान से इस तरह के भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, लोगों में जागरूकता बढ़ेगी, वोट-बैंक की राजनीति थोड़ी पतली पड़ेगी.

जिस दिन भारत के 90 प्रतिशत से अधिक नागरिक वोट डालने लगेंगे, राजनीतिक जागरूकता इतनी बढ़ जाएगी कि राजनीति को सेवा की बजाय सुखों की सेज मानने वाले किसी तरह का दुस्साहस नहीं कर पायेंगे. राजनीति को सेवा या मिशन के रूप में लेने वाले ही जन-स्वीकार्य होंगे. इस बार अनिवार्य मतदान का संकल्प लोकतंत्र को एक नई करवट देगा. ”अभी नहीं तो कभी नहीं.“ सत्ता पर काबिज होने के लिये सबके हाथों में खुजली चलती रही है. उन्हें केवल चुनाव में जीत की चिन्ता रहती है, अगली पीढ़ी की नहीं. अब तक मतदाताओं के पवित्र मत को पाने के लिए पवित्र प्रयास की सीमा का उल्लंघन होता रहा है. अनिवार्य वोटिंग की व्यवस्था को लागू न होने देना एक तरह की त्रासदी है, यह बुरे लोगों की चीत्कार नहीं है, भले लोगों की चुप्पी है जिसका नतीजा राष्ट्र भुगत रहा है/भुगतता रहेगा, जब तब राष्ट्र का हर नागरिक मुखर नहीं होगा. इसलिये अनिवार्य वोटिंग की व्यवस्था को लागू करना नितांत अपेक्षित है. इसके लिये परम आवश्यक है कि सर्वप्रथम राष्ट्रीय वातावरण अनुकूल बने. देश ने साम्प्रदायिकता, आतंकवाद तथा घोटालों के जंगल में एक लम्बा सफर तय किया है. उसकी मानसिकता घायल है तथा जिस विश्वास के धरातल पर उसकी सोच ठहरी हुई थी, वह भी हिली है. पुराने चेहरों पर उसका विश्वास नहीं रहा. मतदाता की मानसिकता में जो बदलाव अनुभव किया जा रहा है उसमें सूझबूझ की परिपक्वता दिखाई दे रही है. यह अनिवार्य वोटिंग का बिगुल ऐसे मौके पर गूंजयमान हो रहा है, जब देश में एक सकारात्मकता का वातावरण निर्मित हो रहा है.
जनतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव है. यह राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिम्ब होता है. जनतंत्र में स्वस्थ मूल्यों को बनाए रखने के लिए चुनाव की स्वस्थता अनिवार्य है. चुनाव का समय देश/राज्य के भविष्य-निर्धारण का समय है. इसमें देश के हर नागरिक को अपने मत की आहूति देकर लोकतंत्र में अपनी सक्रिय संहभागिता निभानी ही चाहिए.
चुनाव के समय हर राजनैतिक दल अपने स्वार्थ की बात सोचता है तथा येन-केन-प्रकारेण ज्यादा-से-ज्यादा वोट प्राप्त करने की तरकीबें निकालता है जबकि उसका लक्ष्य शत-प्रतिशत मतदान के द्वारा लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने का होना चाहिए. मतदान की प्रक्रिया में शुद्धि न आने एवं शत-प्रतिशत मतदान न होने के मूल कारण हैं- निष्क्रियता, अज्ञान, अभाव एवं मूढ़ता. अनेक मतदाताओं को अपने हिताहित का ज्ञान नहीं है, इसलिए वे हित-साधक व्यक्ति या दल का चुनाव नहीं कर पाते. अनेक मतदाता अभाव से पीडि़त है. वे अपने मत को रुपयों में बेच डालते हैं. अनेक मतदाता मोहमुग्ध हैं, इसलिए उनका मत शराब की बोतलों के पीछे लुढ़क जाता है.
जो जनता अपने वोटों को चंद चांदी के टुकड़ों में बेच देती हो, सम्प्रदाय या जाति के उन्माद में योग्य-अयोग्य की पहचान खो देती हो, वह जनता योग्य उम्मीदवार को संसद-विधानसभा में कैसे भेज पायेगी? स्वच्छ प्रशासन लाने का दायित्व जनता का है. चुनाव के समय वह जितनी जागरूक होगी, उतना ही देश का हित होगा.

लोकतंत्र में शासनतंत्र की बागडोर जनता द्वारा चुने हुए सांसदों और विधायकों के हाथों में होती है और इन जनप्रतिनिधियों के चयन में जनता की जितनी अधिक भागीदारी होगी, जनप्रतिनिधि उतने ही सशक्त, योग्य एवं पारदर्शी होंगे. इसी से नैतिक मूल्यों के प्रति आस्थाशील, ईमानदार, निर्लोभी, सत्यनिष्ठ, व्यसनमुक्त तथा निष्कामसेवी जनप्रतिनिधि का चयन हो सकेगा. स्वस्थ राजनीति में ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है, जो निष्पक्ष हो, सक्षम हो, सुदृढ़ हो, स्पष्ट एवं सर्वजनहिताय का लक्ष्य लेकर चलने वाला हो.

वोटों के गलियारे में सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने की आकांक्षा और जैसे-तैसे वोट वटारने का मनोभाव-ये दोनों ही लोकतंत्र के शत्रु हैं. लोकतंत्र में जिस ढंग से वोटों का दुरुपयोग हो रहा है, उसे देखकर इस तंत्र को लोकतंत्र कहने का मन नहीं होता. लेकिन अनिवार्य मतदान से हम इन सब विसंगतियों से मुक्त हो सकेंगे और उस स्थिति में हमारा लोकतंत्र दुनिया का आदर्शतम लोकतंत्र होगा.

अनिवार्य वोटिंग की व्यवस्था को लागू करने के लिये जितने राजनीतिक-सरकारी प्रयत्नों की उपयोगिता है, उतनी ही गैर- राजनीतिक प्रयत्नों की जरूरत है. इसके लिये जरूरी है कि समूचे भारत में सभी मतदाताओं के स्वैच्छिक, गैर राजनैतिक, पंथ और सम्प्रदाय निरपेक्ष संगठन बने. प्रत्येक गली-मोहल्ले में भी जागरूक नागरिक मिलकर अपने-अपने मोहल्ले में सभी मतदाताओं का वोट डालने की अनिवार्यता को समझाये. दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस तरह के प्रयत्नों का प्रभाव यदि परिलक्षित होता है जो यह लोकतंत्र की एक नयी सुबह होगी.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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