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मायावी वटवृक्ष और वडनेरकर..

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-अजीत वडनेरकर||
अपने उपनाम के साथ वटवृक्ष की महिमा से काफी दिलचस्प अनुभव होते रहे हैं। भाई लोगों ने बड़ा घालमेल किया है। … और कुछ भी बोल लेंगे, मगर ‘वडनेरकर’ का उच्चार नहीं करेंगे। अक्सर वडनेरकर को बड़ी आसानी से ‘वाडेकर’ बना दिया जाता है। कुछ महापण्डितों ने भण्डारकर भी बनाया। सिलसिला यहीं नहीं थमा। कॉलेज में दानिशमंदों को लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है, उन्होंने वडनेरकर को सुधार कर ‘भटनागर’ किया। एक सम्पादक पर मेरी तरफ़दारी का आरोप इसलिए लगा क्योंकि वे कायस्थ थे। अब यही आरोप मुझ पर लगता है क्योंकि मैं ‘भटनागर’ हूँ!11009005_10206061980458154_41146826_n
कुछ कल्पनाशील लोगों ने इसे ‘बड़ानेकर’ समझा और हम संघी पाए गए। एक साथी ने समझाया कि जिस तरह पण्डित और महापण्डित होता है। उसी तरह बड़ानेकर का अर्थ ग्रहण करना चाहिए। ‘नेकर’ यानी संघी और ‘बड़ानेकर’ यानी महासंघी। इस अद्भुत शब्दसंधान के आगे हमारा अपना शब्दों का सफर भी पानी भरता है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने ‘वंडरकर’ बना दिया फिर बोले, अजीत, तुम अजीब हो। रेलवे रिजर्वेशन सिस्टम में पता नहीं कौन सा सॉफ्टवेयर काम करता है कि चाहे देवनागरी में ‘वडनेरकर’ लिखें चाहे रोमन में wadnerkar वो वर्षों से वर्द्रनकर ही छाप रहा है। मध्यप्रदेश-गुजरात-महाराष्ट्र में एक ग्राइपवाटर बिकता है उसके आधार पर लोगों ने ‘कर’ से मुक्ति दिलाते हुए हमें ‘वडनेरे’ बना दिया।
अनेक बस्तियों के नामों से जुड़ा ‘नेर’ दरअसल ‘नगर’ का ही रूपान्तर है। नगर के कुछ अन्य रूप हैं जैसे नगरी, नेरा, नांगल, नंगल, नगरिया, नागौर आदि। सांगानेर, चांपानेर, बीकानेर में यही नगर झांक रहा है। इसके ही रूप हैं नागल, नगला आदि। पश्चिमोत्तर भारत की भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग ज्यादा होता है। बड़नगर का ही एक अन्य रूप हुआ बड़नेरा । महाराष्ट्र की वडनेर नामधारी बस्तियाँ इसी बड़नगर के रूपान्तर हैं। सभी स्थानवाची शब्द हैं और वटवृक्षों की बहुतायत के आधार पर इनका नामकरण हुआ है। वटवृक्ष का वट् मराठी में वड में बदला जबकि मालवी, गुजराती समेत अन्य भाषाओं में यह बड़ में तब्दील हो रहा है। वड़ोदरा में भी इसे देख सकते हैं।
1985 से 1995 का समूचा दशक राजस्थान में बिताया। हनुमानगढ़ में प्रसिद्ध भटनेर किला है। शेखावाटी की तरफ से आने वाले लोग हमें भटनेरकर उच्चारते थे। जब उन्हें बताता कि भाई भटनेर तो भाटियों की बसाई बस्ती है। हम तो बड़ जे पेड़ से निकले हैं। पर बात पल्ले नहीं पड़ती थी। स्कूल में बड़नेगर भी बुलाते रहे। कुछ लोग खींच कर बोलने के आदी होते हैं वे आज भी वेडनेडकर ही बुलाते हैं। कई लोग आज भी वर्णेकर लिखते हैं। हमारी मित्र Ira Jha ने सारी झंझटों से मुक्ति दिलाते हुए हमारे समूचे नववर्णी नाम को ढाई ढाई अक्षरों में समेट दिया था- अज्जूवड्डू। तमिल-तेलुगू अनुभूति वाला नाम। उम्र में छोटे पर शरारती साथी ‘बड़े’ ‘बड़े’ कहते थे। टोकने पर जवाब होता था कि आदर की वजह से बड़े कह रहे हैं। हमें शक है कि उन्होंने वडनेरकर को बड़नेरकर समझा और फिर सिर्फ़ बड़े को उठा लिया और उसे आदर की चाशनी में डाल कर हमें पेश कर दिया क्योंकि पकड़े गए।
मेरठ कमिश्नरी के मुज़फ्फरनगर के एसडी कॉलेज के हॉस्टल में रहते थे तो दाखिले के वक्त ठेठ बोली वाले जाट भाइयों ने मैस के रजिस्टर में नाम दर्ज़ करने के लिए इस्मेशरीफ़ जानना चाहा। वडनेरकर सुन कर बेचारे अक्खड़ों की बोली खड़ी हो गई। वड वड करते हुए जीभ लड़खड़ाने लगी। एक भाई ने खीझ कर सीधे हमला किया- “जात कै है?” ब्राह्मण, हमने कहा। “ बस जी, शर्मा लिखो जी। अजीत शर्मा” पूरे दो साल शर्माजी बने रहे इस वडनेरकर के चक्कर में। वटवृक्ष की माया है।

(अजीत वडनेरकर की फेसबुक वाल से)

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