/जी हाँ , उस लड़के का नाम जैग़म इमाम है..

जी हाँ , उस लड़के का नाम जैग़म इमाम है..

-अजीत अंजुम||
साल 2007 के मई -जून का महीना रहा होगा. हम लोग ‘ न्यूज़ 24 ‘ चैनल की तैयारियों में व्यस्त थे . टीवी में काम करने को इच्छुक नए-पुराने पत्रकारों के फ़ोन आते रहते थे. एक दिन नोएडा से एक लड़के का फ़ोन आया . उस लड़के ने कहा – मैं फ़लाँ हूँ और फ़लाँ अख़बार में नोएडा से रिपोर्टर हूँ . अख़बार का पन्ना चाट पाठक होने के नाते मैं उस लड़के के नाम से वाक़िफ़ था . व्यंग्यात्मक शैली में लिखी उसकी दो -चार रचनाएँ मैंने पढ़ी थी .ajit

मैंने उसे समझाया कि टीवी में आकर तुम क्या करोगे , वहीं काम करो ..लेकिन उसकी ज़िद भी थी और पैसे की ज़रूरत एक बड़ी वजह भी. मैंने उसे मिलने के लिए बुलाया . उसे कुछ सब्जेट देकर उसका शीर्षक ( टीवी में स्लग बोलते हैं ) और प्रोमो लिखने को दिया . आधे घंटे बाद उसकी कापी मेरे पास आई . दो चार लाइनें पढ़कर ही हमने उसका नाम एचआर को भेज दिया . उस लड़के को बुलाकर शाबाशी दी और ख़ुशख़बरी भी . कुछ महीनों बाद चैनल लाँच हुआ , वो लड़का ‘न्यूज़ 24 ‘ के सीनियर टीवी पत्रकारों के बीच अपनी पहचान बनाता हुआ अपनी जगह बनाने में कामयाब हुआ . जैसा कि अक्सर होता है कि बास अगर किसी नए या जूनियर लड़के की ज़्यादा तारीफ़ करे तो तथाकथित कुछ सीनियर जलने भी लगते हैं . उसके केस में भी दो -तीन लोगों ने आकर मुझे कहा कि आ खामखां उसे इतना तवज्जो दे रहे हैं . लेकिन ये वो लोग थे , जो प्रतिभा का ताप महसूस कर रहे थे . वो लड़का काम करता रहा . टीवी में नया ऐर न्यूज़रूम में जूनियर होकर भी प्राइम टाइम के शोज़ में हाथ बँटाता रहा . एक दिन अचानक किसी ने आकर मुझे बताया कि जिसे आप इतना मानते हैं और भरोसा करते हैं , वो ‘न्यूज़ 24’ छोड़कर ‘आजतक’ जा रहा है . सच पूछिए तो मुझे झटका भी लगा और ग़ुस्सा भी आया . मैंने उस लड़के को बुलाया और अपने जिस अंदाज के लिए न्यूज़रूम के भीतर और बाहर बदनाम हूँ , उसी अंदाज में डाँटा भी कि तुम इतनी जल्दी छोड़कर कैसे जा सकते हो . वो लड़का अपनी सफ़ाई देता रहा लेकिन मैं कहाँ सुनने वाला था . मैं एक ही बात कहता रहा कि तुम नहीं जा सकते और वो विनम्रतापूर्वक एक ही जवाब देता रहा -सर मुझे जाने दीजिए . आख़िर में मैंने झल्लाकर इतना कहा -जाओ और दोबारा मुझसे मत मिलना . वो लड़का चुपचाप चला गया .दो -चार दिन बाद हिम्मत करके गुड बाय बोलने फिर मेरे केबिन में दाख़िल हुआ लेकिन मैं उसे ख़ुश होकर विदा करने को तैयार नहीं था , सो एक मिनट के सपाट संवाद के बाद उसे मैंने वापस भेज दिया . मेरी तल्ख़ी कम ज़रूर हुई थी लेकिन बरक़रार थी .

क़रीब डेढ़ -दो साल बाद किसी ने मुझे बताया कि उस लड़के ने ‘दोज़ख़ ‘ नाम का एक बहुत ही शानदार उपन्यास लिखा है . पहले तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ , फिर मैंने उसे फ़ोन करके बधाई दी . दिल्ली में किताब का विमोचन हुआ . उसके बाद की लंबी कहानी है . ‘आजतक ‘ छोड़कर मेरे साथ वो मुंबई गया . बीएजी फ़िल्मस के सीरियल प्रोडक्शन वाले विंग का हिस्सा बना . सीरियल्स के लिए क्रिएटिव लेखन करता रहा . वो मुंबई में पैर ज़माने के लिए जद्दोजहद करता रहा और मैं दिल्ली में व्यस्त हो गया . जब भी मिलता या बात होती तो अपने सपने साझे करता . सीरियल्स के लिए लिखकर नाम कमाने का सपना . फ़िल्म बनाने का सपना . फ़िल्मकार के तौर पर पहचान बनाने का सपना . अचानक एक दिन उसने मुझे ये कहकर चौंका दिया कि सर , मैंने अपने उपन्यास ‘ दोज़ख़ ‘ पर फ़िल्म पूरी कर ली है . एडिट का काम चल रहा है . मुझे यक़ीन ही नहीं हुआ कि जो लड़का अभी मुंबई में ठीक से पाँव भी नहीं जमा पाया , उसने फ़िल्म कैसे बना ली ?कहाँ से बना ली? ऐसे ही कुछ बना लिया होगा . मैंने कई बार पूछा भी कि तुमने ख़ुद बनाई ? ख़ुद डायरेक्ट किया ? कैसे किया ये सब ? उसने हर बार चहकते हुए मेरे सशंकित सवालों का जवाब दिया . बीते चार -पाँच महीनों में उसने बताया कि कहाँ -कहाँ फ़ेस्टीवल में उसकी फ़िल्म दिखाई गई . सब सुनते हुए भी मुझे कुछ- कुछ अविश्वसनीय सा लगता . फिर एक दिन उसने ख़बर दी कि पीवीआर उसकी फ़िल्म को रिलीज़ कर रहा है और अब तो तारीख़ भी आ गई है .

इस लड़के का नाम जैग़म इमाम है . जैग़म की ज़िद को ज़मीन मिली है . सपने को आसमान मिले , यही मेरी शुभकामना है .
आज मुझे लगता है कि अगर अपने सपने का पीछा करता हुआ जैग़म मुंबई न पहुँचता तो यूँ ही किसी चैनल में प्रोड्यूसर होता और पैकेज लिखकर खप रहा होता . तीन -चार साल से जैग़म मुंबई में संघर्ष कर रहा है . कभी ख़ाली भी रहा तो भी उसके हौसले में कमी नहीं आई . जैग़म की फ़िल्म बाज़ारू बाक्स आफिस पर चले या न चले , उसने औरों से अलग सोचा और अलग किया . फ़िलहाल आप ट्रेलर देखिए , फ़िल्म अभी बाक़ी है ( किसी दिन इस लड़के पर कुछ और लिखूँगा )

(वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की फेसबुक वाल से)

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