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आप में अंदरूनी कलह, योगेंद्र यादव दे रहे हैं सफाई..

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आम आदमी पार्टी की कलह अब सतह पर आ गई है। पार्टी में अरविंद केजरीवाल के दो पदों पर काबिज होने और पार्टी के देश भर में विस्तार करने को लेकर दो गुट बन गए हैं। पार्टी के आंतरिंक लोकपाल ने अरविंद के दो पदों पर रहने को लेकर सवाल उठाया। है। सूत्रों के मुताबिक प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव की पार्टी के विस्तार को लेकर अरविंद और मनीष सिसोदिया से ठन गई है।arvind-kejriwal-aaps

एक अखबार के मुताबिक 26 फरवरी को हुई आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वरिष्ठ नेता प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने चिट्ठी लिखकर पार्टी की कार्यप्रणाली और चंदे लेने के तौर तरीकों पर सवाल उठाया था।

पार्टी के आंतरिक लोकपाल एडमिरल रामदास की चिट्ठी ने भी नए विवादों को जन्म दिया है। 25 फरवरी को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और संसदीय कार्यसमिति को भेजी चिट्ठी में भी पार्टी में लोकतंत्र को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। इसमें पार्टी में चल रही गुटबाजी और अंदरूनी कलह का मसला उठाया गया है। रामदास ने कहा है कि पार्टी की टॉप लीडरशिप में संवादहीनता बनी हुई है।

योगेंद्र का ट्वीट

आज योंगेंद्र यादव ने ट्वीट कर कहा, दिल्ली में बड़ी जीत के बाद अब वक्त है काम करने का। देश को हमसे बहुत उम्मीदें हैं। छोटी गलतियों को लेकर लोगों की उम्मीदों को ध्वस्त ना करें। पिछले दो दिन से मीडिया में मेरे और प्रशांत भूषण के बारे में खबरें हैं। आधारहीन आरोप लगाए जा रहे हैं, साजिशें रची जा रही हैं। ऐसी खबरों पर मैं कभी हंसता हूं तो कभी दुखी हो जाता हूं। जिसने भी ऐसी स्टोरी चलाई है वो उसके दिमाग की उपज है। बड़ी जीत के बाद अब जरूरत काम करने की है।

इससे पहले पार्टी में मतभेदों की खबर के बीच योगेंद्र यादव ने कहा था कि उनके और केजरीवाल के बीच कोई मतभेद नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि आंतरिक लोकपाल की तरफ से जो मुद्दे उठाए गए हैं वो पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को दर्शाता है। पार्टी के आंतरिक लोकपाल रामदास के पत्र पर योगेंद्र ने कहा कि उनके लेटर पर पार्टी ही कोई फैसला लेगी क्योकि वह पार्टी के सदस्य नहीं हैं। केजरीवाल सीएम रहते पार्टी के संयोजक के पद पर भी रह सकते हैं, क्योंकि वह पार्टी का लोकप्रिय चेहरा हैं और पार्टी को उनकी ज़रूरत है।

वहीँ जनसत्ता के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अपनी फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि ‘आप’ पार्टी के नैतिक संरक्षक, पार्टी के भीतरी लोकपाल, एडमिरल रामदास के असंतोष के स्वर भी सामने आए हैं। योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, दिलीप पाण्डे के स्वर भी सुने गए हैं और इस कहा-सुनी पर संजय सिंह के विचार भी। और भी दर्जनों कार्यकर्त्ता अपनी जगह मुखर होंगे। इस सब में कोई बड़ा हर्जा भी नहीं – लोकतंत्र को जमाने और निभाने के लिए अभिव्यक्ति के ये खतरे उठाने पड़ते हैं। पर आवाजों का उठना एक बात होती है, उनका विस्फोट दूसरी। लेकिन केजरीवाल इससे निपट सकते हैं। मुझे नहीं लगता कि उनकी नीयत पार्टी में एकछत्र एकाधिकारवादी राज कायम करने की है। इस तरफ सवाल उठे हैं, जिनके जवाब दिए जा सकते हैं। सारे सवाल पूर्वग्रह-ग्रस्त हों ऐसा भी नहीं लगता। एडमिरल ही क्यों, क्या पार्टी के अन्य ढेर समर्थक एक-शख्स-एक-पद के सिद्धांत के बारे में नहीं सोचते होंगे? या यह भी कि समता की पैरोकार आम आदमी पार्टी सचमुच ‘आदमी’ पार्टी नहीं है तो उसके मंत्रिमंडल में एक भी स्त्री क्यों नहीं? आदि। सो असंतोष के स्वर भले उठें, पर पार्टी के नेता खुद उनमें ‘षड्यंत्र’ की बू खोजने लगें उससे पहले इस सबसे विवेक से निपट लेना चाहिए। सरकार चलाने से पार्टी चलाना कहीं मुश्किल काम होता है, अरविंद भाई।

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