/अरविन्द केजरीवाल के नाम एक खुला ख़त..

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक खुला ख़त..

प्रख्यात समाजसेवी हिमांशु कुमार ने पत्रकार मयंक सक्सेना के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी में चल रही उठा पटक को देखते हुए आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के नाम एक खुला खत लिख कर इस उम्मीद के साथ फेसबुक पर पोस्ट किया है कि केजरीवाल उनके इस खत पर गौर करेंगे और भारतीयजनों की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे..

प्रिय अरविन्द केजरीवाल,

आप और हम लम्बे वक्त से दोस्त रहे हैं इस नाते आपको यह खत लिख रहा हूँ .
आम आदमी पार्टी के गठन और उसके यहाँ तक के सफर में हम सब अपनी स्थिति के मुताबिक सहयोगी रहे .
हमारा मानना यह था कि अभी तक भारत में जो राजनैतिक तौर तरीके रहे हैं जिनमे एक नेता अवतार बन जाता है और सारे मुद्दे और लोकतंत्र कचरे के डब्बे में डाल दिए जाते हैं , लेकिन अब आम आदमी पार्टी उस तरह की पुरानी राजनीति को समाप्त कर के मुद्दों पर आधारित नई किस्म की राजनीति शुरू करेगी .ArvindKejriwal2
लेकिन हम आश्चर्य चकित होते गए कि किस तरह से सारी पार्टी ने आपको एक अवतार के रूप में जनता के सामने परोसा और दिल्ली के चुनाव मोदी और केजरीवाल के बीच चुनाव में बदल दिए गए .
हमने कल्पना करी थी कि यह पार्टी सोनी सोरी ,दयामनी बारला ,मेधा पाटकर की भी पार्टी बनेगी .
चुनाव में जीत किसी के सही या गलत होने का फैसला नहीं होती
अगर आज आप चुनाव जीत रहे हैं तो इसका यह मतलब बिलकुल भी नहीं है कि आपके अलावा बाकी लोग गलत हैं .
क्योंकि अगर आज आप जीते हैं तो कल को आप हार भी सकते हैं
तो क्या जब आप हार जायेंगे तब क्या आप गलत होंगे ?
नहीं!
हारना या जीतना आपके सही या गलत होने का प्रमाण नहीं है, इसलिए इस जीत को पार्टी की ताकत बनाइये, टूट की वजह नहीं.
सत्ता प्राप्ति के बाद बहुत सारे चाटुकार आपको घेर लेंगे. विपरीत समय में यही चाटुकार सबसे पहले आपको छोड़ कर भी भाग जायेंगे.
एक वख्त में इस देश में इंदिरा गांधी जैसी नेता को हराया गया था.. भारी बहुमत से सरकार बनाई गयी थी.. लेकिन ढाई साल बाद सब बिखर गया था.. इंदिरा गांधी फिर से वापिस भी आ गई थी..
आपने स्वराज नाम की किताब लिखी थी..
उसमे आपने लिखा है कि चुने हुए लोगों के द्वारा चलाया जाने वाला लोकतंत्र नहीं बल्कि हर मुद्दे पर आम जनता की राय से लोकतंत्र चलाया जाना चाहिये..
हम दंग रह गए कि आपने कहा कि अब हमारी पार्टी चार साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ेगी. इतना केंद्रीयकृत निर्णय तो इंदिरा गांधी और मोदी भी नहीं ले सकते थे. कम से कम राज्य की पार्टी में लोगों को अपने अपने राज्यों में निर्णय लेने का तो अधिकार दीजिए.
अगर सारे निर्णय आप ही लेंगे तो फिर लोग क्या करेंगे ?
आपके निर्णय की प्रतीक्षा करेंगे ?
और अगर आपके चारों तरफ एक चौकड़ी जिसमे बिनायक सेन को नक्सली और योगेन्द्र एवं प्रशांत को अल्ट्रा लेफ्ट कहने वाला आशुतोष शामिल हो और वह आपके द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों में भागीदार होगा तो इस देश के आदिवासियों , गरीबों के बारे में आप क्या निर्णय करेंगे यह सोच कर हमें डर लगने लगा है .
प्रिय अरविंद, हम सब आप में उस वक़्त भी उम्मीदें देखते थे, जब इंडिया अगेन्स्ट करप्शन का आंदोलन किरन बेदी, रामदेव और उन के जैसे कई हिंदू फासीवादियों के हाथ फंसता दिख रहा था। आप ने जब राजनैतिक पार्टी बनाई, तो हम सब ने पढ़ा था कि किस प्रकार प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने उसका विज़न डॉक्यूमेंट ऐसे बनाया, जैसे कभी भारत का संविधान अपने साथ, सबकी आज़ादी और सबके अधिकार ले कर आया था। वह प्रशांत भूषण ही थे, जिनके कारण आप पूंजीवादी कुशक्तियों के खिलाफ एक लड़ाई छेड़ सके थे, वही प्रशांत भूषण, जो अदालत में कितने ही गरीबों के साथ-साथ जनहित याचिकाएं मुफ्त में लड़ते रहे। यह वही योगेंद्र यादव हैं, जिनकी समझदारी और मृदुभाषिता ने पार्टी को बीजेपी और कांग्रेस से मुक़ाबले में होने पर भी, उनके जैसा बदज़ुबान हो जाने से बचाए रखा।
आप को याद ही होगा कि कैसे चेहरे पर स्याही पोत दिए जाने के बाद भी योगेंद्र और चैम्बर में घुस कर हमला होने के बावजूद प्रशांत आप के साथ न केवल खड़े रहे, बल्कि मुस्कुराते भी रहे। तो क्या आपके लिए भ्रष्टाचार, मुफ्त बिजली और पानी ही अकेली लड़ाई है? देश में साम्प्रदायिकता और मानवाधिकारों का हनन, किसानों की ज़मीन छीन लिया जाना और गरीबों के लिए रोटी की उपलब्धता कोई मुद्दा नहीं है? क्या आम आदमी सिर्फ दिल्ली जैसे शहरों में रहता है, जिसे अमूमन हम मध्य वर्ग कहते हैं? क्या शिक्षा से लेकर सूचना तक, एक धर्म विशेष के कट्टरपंथियों द्वारा फासीवादी फेरबदल, किसी तरह का कोई मुद्दा नहीं?
क्षमा करें, लेकिन जब आप ने दिल्ली चुनाव के पहले आरएसएस और बीजेपी को साम्प्रदायिक कहा था, तो हम को आप से काफी उम्मीदें हो गई थी, लेकिन अब आपके ही एक करीबी नेता, इन दोनों को अल्ट्रा लेफ्ट ऐसे कहते हैं, जैसे लेफ्ट का होना तिरस्कार का विषय हो और उस विकास का एजेंडा सेट करने की बात करते हैं, जिसका एजेंडा पहले मनमोहन सिंह और बाद में नरेंद्र मोदी सेट कर रहे हैं। ये वही एजेंडा है, जो मुकेश अम्बानी का एजेंडा है…तो क्या आप अंततः अम्बानी, अदानी या किसी और पूंजीपति के साथ खड़े होने वाले हैं?
अरविंद, 16 मई के बाद से देश की गरीब जनता को हर क्षण यह अहसास हुआ है, कि उसे छला गया है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार और लापरवाही से आज़ाद होने की चाहत में उस बेचारी भेड़ ने बर्तोल्त ब्रेश्त की कविता की तरह भेड़िए का आश्रय स्वीकार कर लिया है। तो क्या अब जनता को समझना चाहिए कि जिस बीजेपी और कांग्रेस से मुक्ति की कामना में उस ने आम आदमी पार्टी में एक सपना और एक विकल्प देखा, वह वैसी ही एक पार्टी है…यानी कि दुरभिसंधियों और निजी हितों के संघर्ष का एक अखाड़ा और उसकी बलि पार्टी के दो अहम जनवादी चेहरे चढ़ने वाले हैं?
अरविंद, हम सब ने आपके गले में लहराते मफलर को एक पताका की तरह देखा था और आम आदमी पार्टी को एक धीरे-धीरे परिपक्व होती वैचारिक ज़मीन की तरह। लेकिन यदि आशंकाएं और अफ़वाहें, यथार्थ और सत्य में बदलती हैं तो हमको न केवल निराश बल्कि शर्मिंदा होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और लम्बे समय तक फासीवादी शक्तियों के हाथ में गरीब जनता को छोड़ देना होगा। अरविंद जी, हम कुछ भी हो जाए, ऐसा नहीं होने देंगे। आप नहीं तो हम विकल्प बनेंगे, प्राण भी जा सकते हैं…प्रतिष्ठा भी…और भी बहुत कुछ…लेकिन आप नहीं भी रहे, तो विकल्प खड़ा होगा…हां, हम चाहेंगे कि एक बार फिर से देश की गरीब जनता के साथ वह धोखा न हो, जो वह इतने साल से खाती आ रही है। हम सारे दलित, पददलित, गरीब, किसान, मजदूर और आम लोग आपके आगे झोली फैलाए खड़े हैं कि आम आदमी पार्टी को पूंजीवादियों-फासीवादियों का मोहरा बनने से बचा लीजिए….आप यह कर सकते हैं और कर पाए तो शायद और लोग भी कर सकेंगे।
हमें भारत के लोगों की ताकत पर भरोसा है . अगर यह पार्टी आम लोगों के द्ववारा चलाई जाती है . अगर इस पार्टी में बहस , चर्चा , मतभेदों को सम्मान से देखा जाएगा तो भारत की जनता आम आदमी पार्टी की मार्फ़त भारत की राजनीति के रास्ते सामाजिक आर्थिक न्याय के उस लक्ष्य को प्राप्त कर पायेगी जिसका सपना कभी आज़ादी के मतवालों ने देखा था .
मयंक सक्सेना – हिमांशु कुमार

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.