Share this on WhatsApp
Subscribe to RSS
कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

बोली पर ब्रेक..

-तारकेश कुमार ओझा||

चैनलों पर चल रही खबर सचमुच शाकिंग यानी निराश करने वाली थी. राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मातहतों को आगाह कर दिया था कि गैर जिम्मेदाराना बयान दिए बच्चू तो कड़ी कार्रवाई झेलने को तैयार रहो. मैं सोच में पड़ गया. यदि सचमुच नेताओं की जुबान पर स्पीड ब्रेकर या ब्रेक लग गया तो …. कैसे चलेगा चैनलों का चकल्लस. यह बताते हुए भी अमुक नेता ने फिर गैर जिम्मेदाराना या विवादित बयान दिया…. बार – बार उसी बयान का दोहराव. साथ में कुछ इधर तो कुछ उधर के कथित बुद्धजीवियों का जमावड़ा. … तो अमुक जी … क्या कहेंगे आप इस पर…. विरोधी पक्ष के लोग इसकी आड़ में घंटों बयानवीर नेता की लानत – मलानत कर रहेंगे, वहीं नेताजी के खेमे के लोग बचाव की मुद्रा में जवाब देंगे… देखिए आप बात के मर्म को देखें… निश्चित रूप से फलां की बात का मतलब यह नहीं रहा होगा… आप लोग इसके आशय को समझना ही नहीं चाहते. फिर एक ब्रेक … फिर वही बहस.

breaks on toung

इस देश में बड़ी मुश्किल है कि एक क्रिकेट खिलाड़ी खेलता रहता है तो उसे कोई नहीं कहता कि आप खेलना छोड़ दो. कोई अभिनय करता है तो उसे भी कोई नहीं रोकता – टोकता. लेकिन सब बेचारे नेताओं के पीछे पड़े रहते हैं. कोई भी यह नहीं सोचता कि जिस तरह एक खिलाड़ी का काम खेलना और अभिनेता का अभिनय करना है बिल्कुल उसी तरह नेताओं का काम किसी न किसी प्रसंग पर बात – बेबात बोलते रहना है.

मेरे शहर में मौन की महत्ता पर एक सेमिनार का आयोजन हुआ. भनक लगते ही एक नेताजी मेरे पीछे हो लिए और पहुंच गए सेमिनार में. उन्हें बहुत समझाया … कि यह कार्यक्रम मौन यानी चुप रहने के महत्व पर आधारित है. यहां आप भाषण नहीं दे सकते…. लेकिन वे नहीं माने. … दो शब्द बोलने की संचालकों से विनम्र अपील के साथ उन्होंने हाथ में माइक पकड़ा तो मौैन की महत्ता पर पूरे एक घंटे तक बोलते ही रहे.

अभी कुछ दिन पहले एक माननीय ने महिलाओं की सुंदरता पर प्रकाश डाला तो बवाल मच गया. खूब लानत – मलानत हुई. इसे लेकर उठा बवंडर थमा भी नहीं था कि दूसरे माननीय ने विरोधी दल की शीर्ष नेत्री बनाम नाइजीरियाई महिला की तुलना प्रस्तुत कर अच्छी – खासी सुर्खियां बटोरी.

अब यह तो तय बात है कि आदमी वही बोलेगा जो उसके मन में होगा. चाहे वो नेता हो या किसी दूसरे क्षेत्र का आदमी. एक महात्माजी अक्सर लाव – लश्कर के साथ मेरे शहर में डेरा डाल देते थे. अपने प्रवचन कार्यक्रमों में वे दूसरे वक्ताओं को फिलर की तरह इस्तेमाल करते थे. ताकि पूरा फोकस उन पर रहे. कुछ इधर – उधर की के बाद उनके प्रवचन का सार यही होता था कि रंगीन तबियत का होकर भी आदमी चरित्रवान बने रह सकता है. वे दलील देते थे कि भगवान श्रीकृष्ण ने सैकड़ों गोपियों के साथ रासलीला रचाई … कहां पथभ्रष्ट हुए… फलां भगवान की दो पत्नियां थी… कहां पथ भ्रष्ट हुए… फलां की इतनी … कहां …. बार – बार उनके इस आशय के प्रवचन से परेशान होकर उनके शार्गिदों और अनुयायियों दोनों की संख्या में तेजी से गिरावट आई और उनका शहर आना भी कम होता गया.

नेताओं के विवादास्पद बयान के मामले में एक बात कॉमन होती जा रही है कि हाईकमान की ओर से लगातार चेतावनियों के बावजूद उनका कुछ बिगड़ता तो कतई नहीं , बल्कि एेसे बयान देकर राजनेता पलक झपकते ही सेलेब्रेटियों में शामिल हो जाते हैं. 90 के दशक के राममंदिर बनाम बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौरान कई राजनेता महज विवादास्पद बयान देकर करियर के शिखर तक पहुंच गए.

कुछ एेसा ही नजारा मंडल आंदोलन के दौरान भी देखने में आया. कुछ माननीय तो एेसे हैं जो बेचारे सामान्य परिस्थितियों में गुम से रहते हैें. उनके अस्तित्व का भान तभी हो पाता है जब वे कुछ उटपटांग बोल बैठते हैं. इसलिए माननीयों के बोल बच्चन पर ब्रेक लगाने के बारे में किसी को सोचना भी नहीं चाहिए.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे mediadarbar@gmail.com पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

0 comments

Add your comment

Nickname:
E-mail:
Website:
Comment:

Other articlesgo to homepage

तकदीर के तिराहे पर नवजोत सिंह सिद्धू …क्योंकि राजनीति कोई चुटकला नहीं..

तकदीर के तिराहे पर नवजोत सिंह सिद्धू …क्योंकि राजनीति कोई चुटकला नहीं..(0)

Share this on WhatsAppआप जब ये पंक्तियां पढ़ रहे होंगे, तब तक संभव है नवजोत सिंह सिद्धू को नया राजनीतिक ठिकाना मिल गया होगा। लेकिन सियासत के चक्रव्यूह में सिद्धू की सांसे फूली हुई दिख रही हैं। पहली बार वे बहुत परेशान हैं। जिस पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया, और जिसे वे मां कहते

साहेब के नाम एक ख़त..

साहेब के नाम एक ख़त..(2)

Share this on WhatsApp-रीमा प्रसाद|| थोड़ी उलझन में हूँ .. अपने खत की शुरूआत किस संबोधन से करूं. सिर्फ शहाबुद्दीन कहूंगी तो ये आपकी महानता पर सवाल होगा. शहाबुद्दीन जी या साहेब कहूंगी तो मेरा जमीर मुझे धिक्कारेगा. सो बिना किसी संबोधन के साथ और बिना किसा लाग लपेट के इस खत की शुरुवात करती

देशभक्ति की ओवरडोज़..

देशभक्ति की ओवरडोज़..(0)

Share this on WhatsApp-आरिफा एविस॥ नए भारत में देशभक्ति के मायने औए पैमाने बदल गये हैं. इसीलिए भारतीय संस्कृति की महान परम्परा का जितना प्रचार प्रसार भारत में किया जाता है शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो यह सब करता हो. सालभर ईद, होली, दीवाली, न्यू ईयर पर सद्भावना सम्मेलन, मिलन समारोह इत्यादि राजनीतिक

बोलो अच्छे दिन आ गये..

बोलो अच्छे दिन आ गये..(2)

Share this on WhatsApp-आरिफा एविस॥ देश के उन लोगों को शर्म आनी चाहिए जो सरकार की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि अच्छे दिन नहीं आये हैं. उनकी समझ को दाद तो देनी पड़ेगी मेमोरी जो शोर्ट है. इन लोगों का क्या लोंग मेमोरी तो रखते नहीं. हमने तो पहले ही कह दिया ये

हरेक बात पर कहते हो घर छोड़ो..

हरेक बात पर कहते हो घर छोड़ो..(0)

Share this on WhatsApp-आरिफा एविस || घर के मुखिया ने कहा यह वक्त छोटी-छोटी बातों को दिमाग से सोचने का नहीं है. यह वक्त दिल से सोचने का समय है, क्योंकि छोटी-छोटी बातें ही आगे चलकर बड़ी हो जाती हैं. मैंने घर में सफाई अभियान चला रखा है और यह किसी भी स्तर पर भारत छोड़ो

read more

मीडिया दरबार एंड्राइड एप्प

मीडिया दरबार की एंड्राइड एप्प अपने एंड्राइड फ़ोन पर इंस्टाल करें.. Click Here To Install On Your Phone

Contacts and information

मीडिया दरबार - जहाँ लगता है दरबार. आप ही राजा हैं इस दरबार के और कटघरे में है मीडिया. हम तो मात्र एक मंच हैं और मीडिया पर अपनी निगाह जमायें हैं, जहाँ भी मीडिया में कुछ गलत होता दिखाई देता है उसे हम आपके सामने रख देते हैं और चलाते हैं मुकद्दमा. जिसपर सुनवाई करते हैं आप, जहाँ न्याय करते हैं आप. जी हाँ, यह एक अलग किस्म का दरबार है. मीडिया दरबार...

Social networks

Most popular categories

© 2014 All rights reserved.
%d bloggers like this: