/आतंकी बता कर फ़र्ज़ी एनकाउंटर..

आतंकी बता कर फ़र्ज़ी एनकाउंटर..

-ज़ाहिद।।
भारत को आजाद हुए 68 वर्ष हो गये और इतने वर्षों में लगभग पूरा परिदृश्य बदल गया है नहीं बदला तो सड़ा गला अंग्रेजों की बनायी पुलिस संस्कृति ।वो चाहे हाशिमपुरा में हो , गुजरात में हो दिल्ली में हो या और कहीं पुलिस अंग्रेजों के जमाने की पुलिस आज भी बनी हुई है जिसमें क्रुरता है असंवेदनशीलता है और भ्रष्ट संस्कृति है जो रही सही कमी थी वह धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव ने पूरी कर दी ।11096628_809591619126552_8294084980874578612_n

अंग्रेज़ी पुलिस की तरह ही इनके पास इतने अधिकार हैं कि यह किसी की भी हत्या करके मुठभेड़ दिखा देगें और मौके वारदात पर मौजूद सबूत मिटा देगें और गढ़ी गई झूठी कहानी के आधार पर सबूत गढ़ देगें ।उसके बाद पुलिस इन्क्वायरी होगी जिसमे इन्ही के साहबान इन सबको दोष मुक्त कर देगें या जो बचा खुचा सबूत होगा उसे मिटा कर सत्य का अंतिम संस्कार कर देंगे।अधिक दबाव हुआ तो और कोई इन्क्वायरी ।30-35 वर्ष मुकदमे चलते हैं साथ में नौकरी भी और अंत में अधिकांश पुलिसकर्मी हाशिमपुरा की तरह बाईज्जत बरी हो जाएंगे।तुलसी प्रजापति हो सोहराबुद्दीन हो इशरत जहां हो बाटला हाउस हो या ऐसे ही अन्य तमाम फर्जी मुठभेड़ों की यही कहानी है , यह हकीक़त है कि पुलिस आपको या हमें रात के अधेरे में सोते हुए घरों से उठा सकती है और आत्मसुरक्षा के नाम पर फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर सकती है कुछ अवैध हथियार मृत हाथों में पकड़ा सकती है और मुकदमा दर्ज कर सकती है कि आतंकवादी मारा गया और हमारा आपका परिवार कुछ नहीं कर सकता , उन्हीं पुलिस वालों के सामने गिड़गिड़ाएगा रोएगा और दबाव बनाकर पुलिस वाले आपका बयान लेकर अपने को बचा लेंगे , हो गया मानवाधिकार और न्याय और आप या हम कुछ नहीं उखाड़ सकते क्योंकि पुलिस यहां न्यायाधीश से अधिक शक्तिशाली है ।यही हुआ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी ।पर बात पहले तेलंगाना की ।11133725_812517935470073_168176989989078434_n

पांच संदिग्ध आतंकी तेलंगाना के नालगोंडा जिले में मारे गए थे। इन्हें 17 मेंबर्स वाली सिक्यॉरिटी टीम ने मारा। वे इन्हें एक पुलिस वैन में वारांगल जेल से हैदराबाद कोर्ट ले जा रहे थे। वारांगल से हैदराबाद कोर्ट 150 किमी. दूर है।

पुलिस का कहना है कि उनमें से एक संदिग्ध आतंकी विकारुद्दीन अहमद ने उनसे हथकड़ी खोलने के लिए कहा क्योंकि उसे टॉइलट जाना था। वापस लौटने पर उसने उनसे हथियार छीनने की कोशिश की। सिक्यॉरिटी टीम का कहना है बाकियों ने भी उनसे हथियार छीनकर भागने की कोशिश की। इसके बाद सिक्यॉरिटी टीम ने उन पर गोलियां चला दीं जिसमें पांच संदिग्ध आतंकी मारे गए।अब पुलिस की इस झूठी कहानी पर ध्यान दें कि वारांगल से हैदराबाद की दूरी 150 किमी है और यह घटना वारंगल से कोई 60-65 किमी दूर हुई जो एक डेढ़ घंटे के रास्ते पर है , जेल से कैदी जब पेशी पर आते हैं तो उन्हें पूर्व सूचना होती है तो वह टायलट नहाना धोना सब जेल से ही करके आते हैं तो यह एक झूठा तर्क है और यदि सच भी है तो एक संदिग्ध आतंकवादी की हथकड़ी खोलना किस कानून या पुलिस के नियम में है ? 17 हथियार बंद पुलिस के दस्ते से एक व्यक्ति हथियार छीनने का प्रयास करेगा यह हास्यास्पद लगता है और एक मजेदार तथ्य देखें कि सभी मृतकों के हाथों में हथकड़ियां हैं ।दरअसल आप हर ऐसी मुठभेड़ को देख लें पुलिस का 19-20 यही कहानी रहती है कि हथियार छीनने का प्रयास किया या पुलिस पर जानलेवा हमला किया ।

ऐसा ही कुछ हुआ आन्ध्राप्रदेश के जंगल में चंदन तस्कर के नाम पर 20 लोगों को मुठभेड़ में मारा गया ।वहाँ भी लगभग ऐसी ही कहानी बनाई गई परन्तु जो रिपोर्ट आरही हैं वह बता रही हैं कि सभी को सर के उपर गोली मारी गई है ।अब मुठभेड़ में सर के उपर कैसे गोली लग सकती है यह एक शोध का विषय है ।बाटला हाउस मुठभेड़ में भी यही हुआ और जिनको मुठभेड़ के नाम पर मारा गया था उनके सर के उपर बीचोंबीच मे गोलियां मारी गईं और मैने स्वयं उसकी लाश को आजमगढ़ में देखा था क्युँकि 12 वीं पास करके गया वह बच्चा दिल्ली में कम्पटीशन की तैयारी के लिए कुछ दिन पहले ही गया था और मेरे ससुराल का पडोसी था ।बाटला हाउस मुठभेड़ का सच जो भी हो पर वह बच्चा आतंकवादी नहीँ हो सकता इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ क्योंकि जो बच्चा किसी को एक थप्पड़ ना मारा हो वह दिल्ली जाकर 12 दिन में आतंकवादी कैसे बन सकता है ।सवाल यह है कि भारत की जिस न्याय व्यवस्था का यह मूल हो कि 10 अपराधी भले झूट जाएं परन्तु किसी एक बेगुनाह को सजा ना मिले उस व्यवस्था में पुलिस कैसे किसी की हत्या कर सकती है जिसकी जिम्मेदारी है अपराधी को अदालत के सामने प्रस्तुत करने की ।कहीं कहीं पुलिस सही भी हो सकती है तो क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था , कार्यप्रणाली और नियमों में सुधार की जरूरत नहीं है ? आखिर 68 वर्षों तक उच्चतम न्यायालय हो या सरकार ऐसी सड़ी गली अंग्रेजों की पुलिस व्यवस्था को क्युँ नहीं बदलती, जहाँ अंग्रेजों की पुलिस स्वतंत्रता सेनानियों को उठाकर ऐसे ही हत्याएँ करती थीं वैसे ही आज की पुलिस धार्मिक , जातिगत अथवा व्यक्तिगत आधार पर हत्याएँ करती हैं करती रहेंगी ।आज यह एक कड़वा सच है कि किसी के दरवाज़े पर दो पुलिस वाले आजाएं तो आपकी अपने मुहल्ले में मिट्टी पलीद तय है फिर आप देते रहिए सफाई ।

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