कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

कहीं लखनऊ का ये पत्रकार कोई सहायता न मिलने पर जान न खो दे..

-जगमोहन ठाकन।।

गत छह माह से लखनऊ का एक वरिष्ठ पत्रकार पी जी आई लखनऊ में दोनों किडनी खराब होने के कारण जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है . लाचारगी में बैड पर जीवन की डोर को पकड़े , किसी मदद की आस लगाये , लड़खड़ाते सांसों के सहारे संघर्षरत है यह विवश पत्रकार . परन्तु क्या किडनी ट्रांसप्लांटेशन पर होने वाले लाखों रुपये की सहायता लाचार पत्रकार को मिल पायेगी ? क्या सरकार के हाथ इस वरिष्ठ पत्रकार की जीवन डोर बचा पायेंगें ? ये मर्मान्तक प्रश्न उछल रहे हैं , लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव की लाचारगी पर.uday_yadav_photo

यादव उत्तर प्रदेश के एक ईमानदार एवं दबंग वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं . परन्तु पिछले छह माह से किडनी के इलाज के चलते स्वयं तथा अन्य रिश्तेदारों के सभी साधन रिक्त हो चुके हैं. सरकारी सहायता मान्यता – अमान्यता के किन्तु –परंतुओं में हिचकोले खा रही है. क्या सरकारी मदद किसी अनहोनी का इन्तजार कर रही है ? खैर , सरकारी व्यवस्था की लचरता तो सर्व विदित है परन्तु ताज्जुब की बात तो यह है कि मानवीय मूल्यों की दुहाई देने वाले भामाशाहों के देश में कोई भी संस्था या व्यक्ति क्यों मदद को आगे नहीं आ रहा ?

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

Shortlink:

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर