कीचड़ में पैदा कर दी सिल्वर फिश, मत्स्य पालन में हैं अपार सम्भावनायें..

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-अरविन्द शर्मा||
धर्मशाला, इन्सान अगर ठान ले तो वह अपनी मेहनत और लगन से मिट्टी में भी सोना पैदा कर लेता है. इन पंक्तियों की सत्यता को प्रमाणित करता है जिला कांगड़ा की चैतडू पंचायत के बगली गांव के जितेन्द्र का हौंसला. जहां उसने कूहल के रिसाव से कीचड़ में तब्दील हुई अपनी बेकार भूमि में इसी कूहल के जल को संग्रहित करके मत्स्य पालन की नई इबारत को लिखकर नौकरी की तलाश में भटकते बेरोजगार युवाओं में स्वरोजगार की नई मिसाल कायम करके उन्हें नई राह दिखाई है.Fish Farm Village Chetru (2)
कीचड़ से सनी इस भूमि में जितेन्द्र ने अपने परिवार के सहयोग से एक छोटा सा तालाब बनाकर मात्र पांच सौ रुपये के बीज मत्स्य विभाग से लेकर जिस व्यवसाय को एक प्रयोग के रूप में आरम्भ किया था वही व्यवसाय आज जितेन्द्र को बिना किसी अतिरिक्त परिश्रम के प्रतिवर्ष एक से डेढ़ लाख रुपये का आर्थिक लाभ दे रहा है. जिसे बढ़ाकर जितेन्द्र पांच लाख रुपये वार्षिक तक पहुंचाने को प्रयासरत है.
हालाँकि प्रारम्भिक अवस्था में ही इसके सार्थक परिणामों ने जितेन्द्र को इस व्यवसाय के प्रति अत्याधिक प्रोत्साहित किया था लेकिन जल की निरन्तरता के अभाव तथा कच्चे तालाब से पानी के रिसाव के चलते उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. जिला ग्रामीण विकास अभिकरण द्वारा मनरेगा के अर्न्तगत उन्हें 50 गुणा 100 फुट लम्बे तालाब का निर्माण करवाकर दिया गया. तब से न उनके व्यवसाय में स्थिरता ही आई है अपितु मत्स्य उत्पादन भी बढ़ा है.
जितेन्द्र के तालाब में ग्रास कॉर्प सिल्वर कॉर्प व मिड़िल कॉर्प तीन प्रजातियों की मछलियों का उत्पादन किया जा रहा है. जिनके आहार के लिए मुख्यतः फालतु अनाज घास तथा गोबर प्रयुक्त किया जाता है. औसतन एक दिन में 50 किलोग्राम से 120 किलोग्राम आहार उन मछलियों को दिया जाता है. दो सौ ग्राम से पांच किलो तक की उन मछलियों की बिक्री के लिए जितेन्द्र को कोई भी मशक्त नहीं करनी पडती उनके आस.पास के मछली विक्रेता स्वयं उनके बगली स्थित तालाब पर पहुंचकर अपनी आवश्यकतानुसार मनपसन्द मछलियां तालाब से निकलवाकर ले जाते है. जिसके चलते उन्हें मछलियों के भण्ड़ारण के लिए शीतकक्ष या बडे फ्रिज़ के लिए भी अतिरिक्त धन व्यय करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई.
प्रदेश के नदी नालों के शीतल निर्मल जल में लगभग सभी प्रजातियों के मत्स्य पालन की सम्भावनाएं मौजूद हैं. आधुनिक तकनीक का प्रयोग करके इस व्यवसाय से जुडे लोग इन संसाधनों का समुचित दोहन कर सकते हैं.
हिमाचल में मत्स्य पालन का व्यवसाय लोगों की आर्थिकी को सुदृढ़ बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि यहां प्राकृतिक जलाशयोंए नदियों व नालों का शीतल स्वच्छ जल इस व्यवसाय के अनुकूल है जिसके चलते इस व्यवसाय की व्यापकता की राह आसान नजर आती है. आवश्यकता है कि हमारे किसान बागवान परम्परागत खेती.बाडी व बागवानी के व्यवसाय से आगे बढ़कर आधुनिकता को अपनाएं और मत्स्य पालन की नई सम्भावनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करें.
प्रदेश सरकार द्वारा पर्यटन व्यवसाय के साथ मत्स्य आखेट को जोडने की कवायद भी मत्स्य व्यवसाय में सार्थक परिणाम सामने लाएगी. मत्स्य आखेट को व्यापक स्तर पर साहसिक एवं अभिरूचि के खेल के रूप में प्रचारित करके देश.विदेश के पर्यटकों को प्रदेश में आकर्षित करने की पहल से स्थानीय नागरिकों को भी लाभ प्राप्त होगा.
राज्य सरकार को मत्स्य व्यवसाय से इस वर्ष 97.37 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ है. प्रदेश में इस वर्ष 10736.11 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ जबकि गत वर्ष यह आंकड़ा 9834.14 मीट्रिक टन ही था. गत वर्ष के उत्पादन के मुकाबले 902 मीट्रिक मत्स्य उत्पादन की बढ़ौतरी दर्शाती है कि लोगों का रुझान इस दिशा की ओर बढ़ा है.
ट्राउट मछली के उत्पादन में भी अत्यंत सार्थक परिणाम सामने आये हैं. गत वर्ष प्रदेश में 234 मीट्रिक टन के उत्पादन के अनुपात में इस वर्ष 351 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ है जिसमें से निजी क्षेत्र से 337 मीट्रिक टन व सरकारी क्षेत्र में 14.19 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ है. सरकार को 12.29 करोड़ का लाभ देने वाले ट्राउट मत्स्य पालन के विस्तार के लिए नई योजनाओं को लागू किया जा सकता है. प्रदेश सरकार द्वारा इस व्यवसाय से जुडे लोगों के कौशल शोधन शहरों में मछली उपलब्धता व मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए अनेकों योजनाओं को मत्स्य विभाग द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है. मछुआरों को प्रशिक्षण मत्स्य उपकरण व नई मत्स्य इकाईयां स्थापित करने हेतु आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाकर इस व्यवसाय से जुडे लोगों के परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाकर बेहतर ढ़ंग से खुशहाल जीवन जीने की कवायद को मूर्त रूप दिया जा रहा है.

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