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मोदी – द वन मैन बैंड..

By   /  May 22, 2015  /  No Comments

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मोदी सरकार ने अपने एक साल पूरा होने का जश्न मनाना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में मोदी मंत्रिमंडल के मंत्री गण अलग अलग मंचों पर जाकर भारत सरकार के पिछले एक साल को शानदार बता रहें हैं। मोदी के विश्वासप्राप्त मंत्री प्रैस कांफ्रेंस आयोजित कर रहें है। वहीँ देसी-विदेशी मीडिया में तो 16 मई से ही ‘विश्लेषण’ जारी है। यह बात और है कि ज्यादातर भारतीय मीडिया अब भी सरकार के अघोषित प्रवक्ता की भूमिका ही निभाने में लगा हुआ है।

ऐसे में ‘द इकोनॉमिस्ट’ जैसी नामचीन और तटस्थ पत्रिका में जब दिल्ली ब्यूरो चीफ एडम रॉबर्ट्स ने एक 14 पेज की रिपोर्ट ‘द वन मैन बैंड’ लिखी तो मन किया कि इसका अध्यन किया जाये शायद भारतीय मीडिया की ‘सैट रिंगटोन’ के अलावा कुछ सुनाई पड़ जाये। तो अगर आप की भी हमारी केंद्र सरकार के पहले एक साल के बेबाक विश्लेषण में रूचि है तो आगे पढ़िए अन्यथा इस ब्लॉग को बंद करके कोई भी न्यूज़ चैनल देख लीजिये, आपको पसंदीदा रिंगटोन सुनाई दे जाएगी।
(आगे आप जो भी पढ़ेंगे वह एडम रॉबर्ट्स की 14 पेज की रिपोर्ट का अनुवादित हिस्सा है, बिना किसी पूर्वाग्रह के। तारीफ और आलोचना दोनों……जहां कहीं मेरे विचार होंगें, आपको बताकर ही रखे जायेंगे।)

 

-प्रवीण दत्ता।।

” एक साल पहले नरेंद्र मोदी ‘अच्छे दिन’ के वादे के साथ सत्ता में आये। ‘अच्छे दिन’ से मोदी का तात्पर्य था नौकरियां,खुशहाली और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का सम्मान। इस दिशा में कार्य की गति निराशाजनक है। जनता ने भाजपा को अभूतपूर्व बहुमत देकर मोदी को कुछ कर दिखाने का अवसर दिया है लेकिन बीते एक साल में मोदी ने सत्ता को ज्यादा से ज्यादा अपने हाथों में रखा है। भारत को बदलाव चाहिए और यह कार्य एक अकेले व्यक्ति के लिए दुष्कर है।”download

“मोदी के इस विश्वास को शक की नज़र से देखने का कोई कारण नहीं है की भारत एक महान देश बनने की ओर अग्रसर है क्योंकि यह सही भी हो सकता है। एक पीढ़ी बदलते-बदलते भारत पृथ्वी पर सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होगा तब यह भी संभव है कि वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उसका दबदबा अभूतपूर्व हो। पर मोदी तहे-दिल से यह मान चुके हैं कि भारत को इस प्रगति पथ पर ले जाने का जिम्मा, भाग्य ने एक ही व्यक्ति को दिया और वो है – नरेंद्र दामोदरदास मोदी।
MODI DRUMपिछले एक साल में काफी कुछ अच्छा रहा है और इसका श्रेय मोदी के साथ भाग्य को भी जाता है। कच्चे तेल की कम कीमतों ने मोदी को अर्थव्यवस्था सुधारने में मदद की, मुद्रास्फीति दर गिरी,ब्याज दरें गिर रहीं हैं,रूपया स्थिर है और वित्तीय घाटा कम हो रहा है। आधिकारिक स्रोत भारत की विकास दर 7.5 % बता रहें हैं जो कि चीन की विकास दर से अधिक है और विश्व में सबसे ज्यादा है। विदेशी निवेश की रफ़्तार, प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों की तरह बढ़ी है, जहाँ उन्होंने प्रभाव छोड़ा है। मोदी के धार्मिक हिंसा के प्रति रुख के इतिहास को देखते हुए ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने पिछले चुनाव में मोदी का समर्थन नहीं किया था। सत्ता में आने के बाद हालांकि वे अपने कट्टरपंथी समर्थकों पर कोई लगाम नहीं लगा पाये पर वैसी साम्प्रदायिक हिंसा भी नहीं हुई जिसकी, उनके सत्ता में आने के बाद, होने की आशंका थी।”

‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट में आगे मोदी की जन धन योजना की तारीफ की गई है पर आर्थिक सुधारों के मामले में सरकार के कदमों को नाकाफी बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार मोदी दो गलतियां कर रहें हैं।

“पहली – असल और कारगर आर्थिक सुधार राज्य सभा में बहुमत मिल जाने के बाद ही लाएंगे। बेशक वे अभी लाल फीताशाही कम करने का प्रयास कर रहें हों और देश में निवेश के लिए बेहतर माहौल बनाने की बात हो रही हो।
दूसरी – मोदी सब कुछ अकेले ही करने के प्रयास में है जबकि उनको अपनी शक्ति तीन स्रोतों से बढ़ानी चाहिए
1. राज्यों में निहित शक्ति से (यहाँ वे शुरुआत कर चुके हैं जीएससटी माध्यम से)
2. अन्य राष्ट्रीय नेताओं की शक्ति से और
3. बाजार की शक्ति से ”
और लेख के अंत में प्रधानमंत्री मोदी से जो उम्मीद रखी गयी है (कोष्ठक में मेरे विचार : मत भूलियेगा ‘द इकोनॉमिस्ट’ एक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रकाशन है)…… वे हैं –
“1. जल्द से जल्द श्रम कानूनों में सुधार करें। (मेरे विचार-इसका मतलब कहीं हायर एंड फायर तो नहीं है ?)
2. खेती में घरेलू कारोबार पर से रोक हटे। (मेरे विचार-इसका मतलब कहीं हमारे खेतों में सांड छोड़ना तो नहीं है ?)
3. रेलवे में निजी सहभागिता सुनिश्चित हो ताकि भारतीय रेल बेहतर ढंग से काम कर सके। (मेरे विचार- इसका मतलब प्राइवेटाइजेशन शर्तिया नहीं है। इसको आजकल PPP कहतें हैं। )
4. बेहतर भूमि अधिग्रहण कानून बने ताकि आधारभूत ढांचे के लिए भूमि अवाप्ति आसान और जल्द हो। (मेरे विचार- अब क्या बच्चे की लोगे? )
5. राष्ट्रीयकृत बैंकों में राजनीतिक दखल अंदाजी बंद हो और इनका स्वामित्व स्वतन्त्र अथवा आदर्श रूप से,निजी हाथों में दिया जाये। (मेरे विचार-अनिश्चित कालीन हड़ताल हो जाएगी, बता रहा हूँ अभी से )
6. भारतीय विश्वविद्यालयों में निजी/विदेशी सहभागिता से भारतीय शिक्षा का स्तर सुधारें। (मेरे विचार- अब तक यहाँ तैयार डॉक्टर/इंजीनियर/आईटी प्रोफेशनल खटक रहें हैं एडम भाई ? )”
अंत में एडम रॉबर्ट्स लिखतें हैं कि “अगर मोदी भारत को सचमुच एक समृद्ध और मजबूत राष्ट्र बनाना चाहतें हैं तो मोदी को अब गुजरात के मुख्यमंत्री के तरह नहीं बल्कि राष्ट्रीय नेता के रूप में व्यवहार करना चाहिए, ।
अगर मोदी भारत को बदलना चाहतें हैं तो इस ‘वन मैन बैंड’ को ट्यून बदलनी होगी।”

अब फाइनली आखिर में मेरे विचार – अब सब साफ़ हो गया है..…अगर आने वाले दिनों में देशवासियों को ऊपर लिखे क्रमश: 1 से 6 कदम उठते नज़र आएं तो आप समझ जाएँ कि और आगे क्या-क्या होगा ? अगर ना उठें तो भी समझ जाएँ कि केवल विदेशी दौरों से निवेश नहीं आया और पीएम जी घर वापसी कर चुकें हैं।
बेसिकली ‘वन मन बैंड’ ट्यून बदलें ना बदलें आप सभी वक़्त-वक़्त पर ‘अच्छे दिनों’ की डेफिनेशन बदलते रहिएगा।
( एडम रॉबर्ट्स रिपोर्ट व बैंड कार्टून – ‘द इकोनॉमिस्ट’ से साभार )

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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