/स्वच्छ आबोहवा के लिए तरसती जिंदगी..

स्वच्छ आबोहवा के लिए तरसती जिंदगी..

-ज्ञानेन्द्र पाण्डेय॥

फेस बुक से लेकर घर बाहर तक हर जगह राजनीति का ही बोलबाला है जहाँ देखो वहीँ तमाम खबरें केवल और केवल राजनीति से भरीं पड़ी हैं , राजनीति पर बहस करना आसान है और हर इंसान बिना आगे – पीछे सोचे राजनीति पर बहस करता दिखाई भी देता है , लेकिन पर्यावरण जैसे मुद्दे जो जीने और मरने के सवाल से जुड़े हैं , किसी की प्राथमिकता नहीं बनते , ये बड़ा ही अजीबोगरीब मामला है जो गंभीर परेशानी वाला भी है .155782966__1_.0
बात का सिलसिला आज के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पहले पन्ने पर छपी एक मुख्य खबर से ताल्लुक रखता है जिसके मुताबिक विश्व स्वास्थय संगठन यानी वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की ताज़ा रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है की वायु प्रदुषण अब जान के लिए खतरे की एक बड़ी वजह बन गया है , दुनिया में होने वाली ८ मौतों में से एक मौत वायु प्रदुषण से होती है .दुनिया के तमाम शहर बुरी तरह वायु प्रदुषण का शिकार हैं इनमे हमारी दिल्ली भी अव्वल नंबर पर है .रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित १६०० शहरों में दिल्ली टॉप के १० शहरों में शुमार है . प्रदुषण के मामले में इसकी हालत चीन की राजधानी पेइचिंग से भी बुरी है .

दिल्ली के प्रदुषण की हालत तो इस कदर खराब बताई जा रही है की देर – सबेर हर दिल्लीवासी को घर , ऑफिस और स्कूल से बाहर निकलने से पहले मास्क (मुखोटा ) पहनना होगा . ट्रैफिक पुलिस के जवानो को ऐसे विशेष मास्क मुहैया कराये भी जा चुके हैं जो वायु प्रदुषण से हिफाज़त करेंगे . इसके साथ ही दिल्ली पुलिस के ट्रैफिक जवानो को यु वी किरणों से बचाने वाले चश्मे भी दिए जा रहें हैं .
राजधानी दिल्ली की आबोहवा का बिगड़ना चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इसके आकाशीय परिक्षेत्र में ओजोन गैस का लेवल दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है . जब ओजोन गैस वातावरण में मौजूद अन्य तत्वों से मिलाती है तो हवा को खतरनाक तरीके से जहरीला बना देती है और यही जहरीली हवा जानलेवा बन जाती है .
आश्चर्य जनक बात यह है की मनुष्य के जीवन और मौत से ताल्लुक रखने वाली वाली इतनी महत्त्वपूर्ण खबर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अलावा केवल इसके हिंदी संस्करण नव भारत टाइम्स में ही दिखाई दी. नवभारत टाइम्स ने भी खानापूरी के अंदाज़ में ही अपना धर्म निभाया . टेक्स्ट से चार गुना स्थान फोटो को दिया गया .

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.