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कैसे लोग हैं ये तुम्हारे, जो सूचना अधिकार अधिनियम को भी नहीं जानते..

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-चन्द्रशेखर करगेती।।

वर्तमान में राज्य की सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी यदि ज़रा भी लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं में आस्था और विश्वास रखती है तो उसे सूचना आयोग और उसमें कार्यरत आयुक्तों को अपना सहयोगी ही मानना चाहिए, वे सरकारी मशीनरी को रास्ता दिखाने का ही काम करते हैं, उनके द्वारा सरकार से की गयी अनुशंसा, सरकार के लोकतांत्रिक और ईमानदार और पारदर्शी बनाने को ही काम करती है, इनकी अनुशंषा पर मीनमेख निकालने के बजाय उस अनुशंषा के अनुरूप कार्यवाही कर दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहिए, वरना सरकार को लोकतांत्रिक और ईमानदार होने पर संशय ही बना रहेगा।2e98bdf2-0c47-4096-acd7-cddcbeed1728wallpaper1
आज राज्य में जहाँ चारों और सरकारी मशीनरी के भ्रष्ट होने और उनके कारिन्दो के आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त होने की चर्चायें आम हैं, राज्य के नागरिकों द्वारा जिस भी संवेदनशील और चर्चित मामले में सूचनाधिकार के अंतर्गत जानकारी प्राप्त करने को आवेदन दाखिल किये जा रहे हैं तथा प्राप्त जानकारी से शासन और अधिकारीयों के निक्कमेपन तथा भाई-भतीजावाद चौकाने वाले तथ्य उजागर हो रहे हैं वे सरकार की आँखे खोलने वाले हैं।
सूचना के अधिकार में प्राप्त जानकारियां असल में सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़े करती है, जब सरकार के पास पहले से ही घोटालों की दस्तावेजी जानकारी एंव साक्ष्य होते हैं तो घोटाला करने वालों के खिलाफ त्वरित कार्यवाही क्यों नहीं होती है ? आखिर घोटाला करने वाले कारिन्दो को किनका संरक्षण प्राप्त होता है ? सूचना आवेदनों के जरिये जानकारी बाहर आने पर सरकार व सत्तारूढ़ एंव विपक्षी दल सूचना आयुक्तों के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी क्यों करने लगते हैं ? सवाल आखिर सरकार के खातों की जाँच करने वाली राज्य की महालेखा परिक्षा टीम पर भी आता है, जो गडबडियां एक आम सूचना आवेदक चंद दस्तावेजों से चिन्हित कर सार्वजनिक करता है वो सरकार की ऑडिट एजेंसियां क्यों नहीं कर पाती ?
सूचना आवेदनों के जरिये एनएचआरएम घोटाले का खुलासा हो या कुम्भ घोटाले का, समाज कल्याण विभाग में छात्रवृत्ति में बन्दरबाँट का हो या पेंशन वितरण में घालमेल का या फिर शासन से महत्वपूर्ण फाईलें गायब होने का हो या फिर 2013 की आपदा में हुए करोड़ों के घालमेल का, इन सब मामलों में सूचना आयोग के सरकार को की गयी जांच की अनुशंसा लोकतंत्र को मजबूत ही करती है, यह नागरिकों के जागरूक होने का ही परिणाम हैं कि वे अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से ज्यादा अपनी मेहनत से बनाये इस राज्य के लिए चिंतित हैं ।
भूपेंद्र कुमार के सूचना आवेदन पर जिस प्रकार से राज्य सूचना आयुक्त श्री अनिल शर्मा द्वारा घोटाले की सीबीआई जांच हेतु सरकार से अनुशंषा की गयी है, उसे सरकार को सकारात्मक लेते हुए सूचना आयोग और आयुक्त महोदय का आभारी होना चाहिए था, इसके उलट जिस तरह से सरकार में बैठे निर्वाचित जन प्रतिनिधी और सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष आयोग और सूचना आयुक्त की अनुशंषा और मंशा पर सवाल उठा रहें, वह बचकाना तो है ही उनके हाल के बयानों से यह भी सिद्ध करता है कि कहीं ये तो घोटालेबाज कारिन्दो के संरक्षक तो नहीं ? सत्ता पा जाने के बाद लगभग हर राजनैतिक दल इन संवैधानिक संस्थाओं के द्वारा जनहित के कामों को हतोत्साहित करने में लगा रहता है ! बेहतर होता सरकार और उसके दल के तथाकथित नामचीन नेता लोकतंत्र को सही मायने में समझ पाते, और लोकत्रंत्र की मजबूती के लिए इन संवैधानिक संस्थाओं को और मजबूत करते !
अब हम ग्याडू भी समझ रहें हैं इन सस्थाओं में टोलिया, नपलच्याल,जैन और रावत जैसे सरकार के वफादार रहे नौकरशाहों को क्यों नियुक्त किया जाता है ? सवाल बड़ा है समझ सको तो अपने पार्टी के लोगो को भी समझाना !
बाकी सरकार तो सरकार है ही, जिसके कारिन्दो की आँखें केवल मात्र जांच नाम के मरे सांप को पीटने के लिये ही होती है, श्री अनिल शर्मा की तरह राज्य सरकार की आँखे खोलने वाले सूचना आयुक्त उत्तराखंड राज्य की जरूरत भी हैं और समय की मांग भी !

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