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राजनैतिक गड़बड़झाला..

-संजय सिंह।।
नटवर सिंह का जवाब सोनिया को
कांग्रेस सरकार में किसी वक्त में विदेश विभाग के मुखिया रह चुके राजस्थान के कद्दावर नेता नटवर सिंह अब सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं। कांग्रेस ने तो पहले ही अपने घर से उन्हें बेदखल कर दिया था। उन पर तोहमत लगाया गया था कि विदेश मंत्री रहते ‘इराक से तेल के बदले अनाज स्कीम’ में उन्होंने अपने बेटे जगन को बेजा तरीके से लाभ पहुंचाया था। हालांकि उन्होंने इसे कतिपय कांग्रेसियों की साजिश बताकर इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया था। दिल्ली के पाश इलाके में स्थित अपनी शानदार सफेद रंग की कोठी में एक मुलाकात में उन्होंने बताया कि 80 वर्ष से अधिक की उम्र में अब उनकी कोई ख्वाहिश नहीं रह गयी है। नेहरू-इंदिरा-राजीव-सोनिया यानि कि तीन पीढ़ियों के साथ काफी करीब से काम कर चुके पूर्व कांग्रेसी के. नटवर सिंह अपनी हालिया प्रकाशित आटोबायोग्राफी ‘वन लाइफ इज नाट एनफ’ की रिकार्ड बिक्री से काफी उत्साहित हैं। पिछले दिनों उनकी पुस्तक के प्रकाशक द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने गांधी परिवार से अपने संबंधों और उनमें आयी कटुता से जुड़े सवालों पर कुछ नये खुलासे भी किये। उनकी दूसरी पुस्तक कब आयेगी ? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी (आटोबायोग्राफी) के बाद।

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मालूम हो कि नटवर सिंह की पुस्तक के संदर्भ में सोनिया गांधी ने कहा था कि वह भी एक पुस्तक लिखेंगी। जाहिर है नटवर सिंह द्वारा अपनी आटोबायोग्राफी में उन पर (सोनिया पर) किये गये प्रहार का जवाब देने की यह धमकी थी। इसी पर नटवर ने कहा कि उनकी दूसरी पुस्तक सोनिया के पुस्तक के आने के बाद लिखी जायेगी। यानि कि वह सोनिया की पुस्तक का जवाब होगा। अगर ‘जवाबी कव्वाली’ का यह सिलसिला चल पड़ा तो कांग्रेसी और कांग्रेसी राजनीति के कुछ और अन्दरूनी पन्ने जरूर खुलेंगे, जिसे पढ़ना वाकई दिलचस्प होगा। आमीन !

सफेद चूहे भी खा रहे देश का अन्न
लोकसभा में सत्र के दौरान एक दिन गैर सरकारी सदस्यों के कार्य के तहत एक सांसद महोदय ‘राष्ट्रीय कृषक आयोग’ की सिफारिशों को लागू करने हेतु प्रभावी कदम उठाने को लेकर सदन में भाषण कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वे बीते पांच साल से इस सदन में सरकार से इस बात की जानकारी मांग रहे हैं कि देश में कितना अन्न का उत्पादन होता है ? उसमें से कितना सड़ जाता है ? और कितना अन्न चूहे खा जाते हैं ? इसके बाद जब उन्होंने यह कहकर कटाक्ष किया कि कितना अन्न काले चूहे खाते हैं और कितना सफेद चूहे…यह भी सरकार को नहीं पता है..! तो उनके इस कथन पर सभी सदस्य ठहाके लगाकर हंस पड़े। लेकिन खास बात तो यह है कि जो नहीं हंस रहे थे, उनकी तरफ शेष सदस्यों की निगाहें थीं।
महंगाई’पर चर्चा-दर-चर्चा
लोकसभा में एक दिन भोजनावकाश के बाद महंगाई पर चर्चा चल रही थी। संसद की कार्यवाही देखने के लिये स्पीकर गैलरी की तरफ जा रहे एक भद्रजन ने अपना पास दिखाने के बाद वहां मौजूद कर्मचारी से पूछा…कि सदन में क्या चल रहा है। कर्मचारी ने कहा कि महंगाई पर चर्चा चल रही है। प्रेस गैलरी की तरफ जा रहे एक पत्रकार ने भी यह सुना और कर्मचारी से सवाल किया कि किस नियम के तहत (संसद में होने वाली चर्चायें किस नियम के तहत की गयी हैं, इसका विधायी महत्व है) महंगाई पर चर्चा चल रही है। संसद के कर्मचारी ने कसैला सा मुंह बनाकर बोला- ‘साहब कौनों नियम के तहत चर्चा हो..का फर्क पड़ता है…मैं तो दस साल से महंगाई पर चर्चा सुन रहा हूं..। महंगाई तो घटती नहीं..चर्चा अलबत्ता लम्बी हो जाती है।
अंग्रेजी में फायदा नहीं, तो हिन्दी में पूछा सवाल
जब से देश में नरेन्द्र मोदी की सरकार आयी है, हिन्दी भाषी लोग और हिन्दी के प्रति अनुराग रखने वालों की छाती 56 इंच फूली हुयी है। कारण यह कि प्रधानमंत्री खुद हिन्दी को इतना तरजीह दे रहे हैं कि संसद ही नहीं बल्कि विदेशों में भी उनके भाषण हिन्दी में हो रहे हैं। लिहाजा अब संसद में भी वे सदस्य हिन्दी बोलने पर उतारू हैं, जो पिछली लोकसभा में भी थे, लेकिन उस वक्त अंग्रेजी में बोलना शान समझते थे। लोकसभा में एक दिन पलक्कड (केरल) से माकपा सांसद ने प्रश्नकाल के दौरान यह कहते हुये रेल मंत्री से हिन्दी में सवाल पूछा कि वह पिछली लोकसभा में पांच बार अंग्रेजी में पूछ चुका है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसलिये अब हिन्दी में पूछ रहा है। इस पर सदस्यों ने ठहाके लगाये। लेकिन अंग्रेजी से हिन्दी का चक्कर कभी ऊटपटांग भी हो जाता है। लोकसभा अध्यक्ष ने सदन में जब तृणमूल कांग्रेस की सदस्य काकोली दास को काकोली डोज कहकर पुकारा तो सदस्य चौक पड़े। लेकिन बाद में अहसास हुआ कि यह अंग्रेजी लिपि से हिन्दी उच्चारण का ‘साइड इफेक्ट’ था।

(वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह की फेसबुक वाल से)

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