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क्या ब्लैकमेल हो गए लालू..?

-अभिरंजन कुमार।।

पूरी तरह से मर चुकी कांग्रेस और अधमरे जेडीयू ने बिहार में लालू यादव को ब्लैकमेल कर लिया। सच्चाई यह है कि चारा घोटाले में सज़ायाफ़्ता होने और 15 साल तक जंगलराज चलाने के आरोपों के बावजूद लालू यादव का जनाधार नीतीश की तरह क्षीण नहीं हुआ है। बिहार में एंटी-बीजेपी कैम्प में आज की तारीख में किसी के पास अगर वोट हैं, तो वो लालू यादव ही हैं।BL26_01_LALNIT_2077832f

नीतीश के पास अपने वोट बचे नहीं हैं। बीजेपी से अलग होने के बाद वे 16% पर आ गए और जीतनराम मांझी ने जो झटका उन्हें दिया है, उसके बाद अगर उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़े, तो उसे 10 फीसदी से भी कम वोट आएंगे। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भले 8.5% वोट आ गए, लेकिन विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने पर उसे भी 5-6 प्रतिशत से ज़्यादा वोट नहीं मिलने वाले।

एंटी बीजेपी कैम्प की ऐसी बदहाली के दौर में भी लालू के राष्ट्रीय जनता दल के पास 18-20 फीसदी वोट अक्षुण्ण हैं। यह बात पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव और विधानसभा उपचुनाव से भी साबित हो चुकी है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मेरा अपना ख्याल है कि लालू यादव ने अगर अपनी पार्टी के भीतर लीडरशिप खड़ी होने दी होती, तो आज उन्हें यह ज़हर नहीं पीना पड़ता।

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय जनता दल में अच्छे नेता नहीं हैं, लेकिन लालू ने एक हद से ज़्यादा किसी को उभरने ही नहीं दिया। उनके पास रघुवंश प्रसाद सिंह और अब्दुल बारी सिद्दीकी- दो ऐसे बेहतर नाम थे, जिन्हें वे नीतीश की काट के तौर पर मुख्यमंत्री पद के लिए आगे कर सकते थे और अड़ सकते थे, लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि वे नीतीश को तो अपना नेता मान सकते हैं, लेकिन अपनी पार्टी के भीतर किसी दूसरे का कद बड़ा करने का बड़पपन नहीं दिखा सकते हैं।

मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि लालू डर किस बात से गए। अगर नीतीश और कांग्रेस के बिना लालू को बर्बादी का डर सता रहा था, तो लालू के बिना नीतीश और कांग्रेस के कौन-से सुनहरे दिन आ जाने थे? चूंकि दोनों पार्टियों की तुलना में उनके पास मज़बूत जनाधार था, इसलिए मेरा ख्याल है कि रघुवंश प्रसाद या अब्दुल बारी को सामने करके वे कांग्रेस को झुका सकते थे। कांग्रेस के झुकते ही नीतीश अपने आप परास्त हो जाते।

ऐसे में कहना चाहूंगा कि नीतीश कुमार कितने बड़े चाणक्य हैं, यह तो पिछले दो साल में उनके राजनीतिक फ़ैसलों से साबित हो ही चुका है, लेकिन लालू यादव ने भी एक बार फिर बड़ी राजनीतिक भूल की है। बीजेपी ने एंटी बीजेपी कैम्प में फूट पैदा की थी। इसकी काट सिर्फ़ और सिर्फ़ बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने से ही हो सकती थी और रघुवंश को आगे करने से यह काम हो सकता था। एंटी-बीजेपी वोट तो उनके गठबंधन के साथ ही रहता, बीजेपी के परंपरागत अगड़ा वोट-बैंक में भी वे सेंधमारी कर सकते थे। इसके बाद “भूरा बाल साफ करो” के कलंक पर भी उन्हें डिफेंसिव नहीं होना पड़ता।

बहरहाल, एंटी-बीजेपी कैम्प ने तो अपनी सबसे बड़ी चाल चल दी है, लेकिन अगर मांझी-प्रसंग नहीं हुआ होता, तो मैं भी कहता कि यह गठबंधन बीजेपी पर भारी पड़ने वाला है, पर मांझी-प्रसंग के बाद खेल जटिल हो गया है। अब अगर बीजेपी जीतनराम मांझी और पप्पू यादव दोनों को, या कम से कम मांझी को अपने गठबंधन में मिला लेती है, तो कांटे के मुकाबले में बीजेपी को हल्की सी बढ़त मिल सकती है।

लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को अगर आधार माना जाए, तो बिहार में एनडीए यानी बीजेपी (29.86 %), एलजेपी (6.50 %) और आरएलएसपी (0.12 %) के पास करीब 36.50 फीसदी वोट हैं। मेरा मानना है कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के चरित्र में अंतर होने और डेढ़ साल में मोदी सरकार की एंटी-इनकम्बेन्सी के बावजूद बिहार में एनडीए के पास ये वोट सुरक्षित रहेंगे, क्योंकि जिन लोगों ने बीजेपी को वोट दिया है, वे उस गठबंधन को कतई वोट नहीं देंगे, जिसमें लालू भी हों और नीतीश भी हों।

दूसरी तरफ यह भी सच है कि जिन लोगों ने घनघोर मोदी लहर में बीजेपी को वोट नहीं दिया, वे आम तौर पर एंटी-बीजेपी सोच रखने वाले या अपनी-अपनी जातियों के नेताओं या पार्टियों के साथ प्रतिबद्ध वोटर हैं। और मांझी-प्रसंग से पहले एंटी बीजेपी कैम्प यानी आरजेडी (20.46 %), जेडीयू (16.04 %), कांग्रेस (8.56 %), कम्युनिस्ट (1.47 %), एनसीपी (1.22 % ) में करीब 47.75 फीसदी वोट थे।

यानी लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी कैम्प 36.50 फीसदी और एंटी बीजेपी कैम्प 47.75 फीसदी। ऐसे में बीजेपी को सत्ता तब मिलेगी, जब वह विरोधियों के गठबंधन के कम से कम 6 से 10 प्रतिशत वोट अपनी तरफ मिला ले। इसी तरह एंटी-बीजेपी कैम्प को सत्ता तब मिलेगी, जब वह अपने अलग-अलग घटकों को मिले सारे वोटों को गठबंधन के पाले में एकजुट कर ले।

मौजूदा परिस्थितियों में एंटी-बीजेपी कैम्प के लिए यह संभव नहीं दिखाई देता। मांझी के साथ सिर्फ़ महादलित ही नहीं, तमाम प्रमुख जातियों यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण इत्यादि के नेता नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग को क्षत-विक्षत करके निकले। इसी तरह कोसी-बेल्ट के बाहुबली, लेकिन प्रभावशाली पप्पू यादव ने लालू यादव को झटका दे दिया। और तो और लोकसभा चुनाव में लालू ने ख़ुद ही अपने दाहिने हाथ (रामकृपाल यादव) को बेटी मीसा के लिए काटकर फेंक दिया था।

इस तरह आज की तारीख में न तो लालू के पास उनका सबसे विश्वसनीय यादव वोट-बैंक अक्षुण्ण है, न नीतीश के पास उनका सबसे विश्वसनीय कुर्मी वोट बैंक। मौजूदा हालात में अगड़ों, दलितों और महादलितों (अगर मांझी मिल जाएं तो) के वोट एकमुश्त बीजेपी को जा सकते हैं, जबकि एंटी-बीजेपी कैम्प को सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के वोट ही एकमुश्त मिलेंगे। अलग-अलग पिछड़ी जातियों के वोट दोनों कैम्पों में बुरी तरह विभाजित हैं।

जहां तक बीजेपी कैम्प का सवाल है, उसके लिए मांझी को मिलाना तो ज़रूरी है ही, यह भी ज़रूरी है कि विधानसभा चुनाव वह सिर्फ़ मोदी के नाम पर न लड़े। उसे नीतीश के मुकाबले दमदार और प्रोग्रेसिव चेहरा पेश करना होगा। वरना विपक्ष उसे चुनाव के दौरान घेरता रहेगा। बिहार की जनता भी यह जानना चाहेगी कि अगर एक तरफ से नीतीश सीएम के उम्मीदवार हैं, तो दूसरी तरफ़ से कौन है? “हर-हर मोदी” अब एक हद से ज़्यादा नहीं चलेगा।

कुल मिलाकर, बीजेपी अगर समझदारी से काम ले, तो लालू-नीतीश गठजोड़ निस्तेज साबित होने वाला है। लेकिन जहां तक इन सियासी समीकरणों के बीच बिहार की जनता का सवाल है, तो उसके अच्छे दिन आते हुए फिलहाल तो दिखाई नहीं दे रहे हैं। अभी तो बड़े-बड़े नेता अपने ही बुरे दिनों को ख़त्म करने की दवाई ढूंढ़ रहे हैं, तो उसके अच्छे दिनों की परवाह कौन करेगा?

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