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आडवाणी धृतराष्ट्र नहीं हैं..

-प्रवीण दत्ता||
आज भारत के प्रतिष्ठित अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस ‘ में भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य लालकृष्ण आडवाणी का इंटरव्यू छपा है। इंटरव्यू का सार यह है कि
1) देश में फिर से इमरजेंसी लगने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
2) देश में लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के हितैषियों की संख्या लगातार कम हो रही है।
3) वर्तमान राजनितिक नेतृत्व परिपक्व है पर उसकी कमियों की वजह से उस पर यकीन नहीं होता वह इमरजेंसी जैसा कदम नहीं उठाएगा।
4) देश का मीडिया पहले से ज़्यादा स्वतंत्र है पर मीडिया की लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता संदेह में है।
5) लोकतंत्र की जीवंतता के लिए किसी भी अन्य संस्था से ज़्यादा न्यायपालिका ज़िम्मेदार है।

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सवाल यह है कि आखिर भाजपा के वरिष्ठतम और संस्थापक सदस्यों में से एक नेता आडवाणी को क्या खल रहा है? जिस व्यक्ति ने एक छत्र कांग्रेस राज में विपरीत विचारधारा वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की झण्डाबरदारी वर्षों तक सफलतापूर्वक की हो , जिस व्यक्ति ने भाजपा को पहली बार केंद्र में सत्ता दिलाने में सबसे अहम भूमिका निभाई हो। जिस शख्स ने, मतभेद होते हुए भी, पूरी शालीनता के साथ अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सर्वमान्य राजनेता भागीदारी की हो और जो 87 वर्ष की आयु में भी जीवंत और सक्रिय मष्तिष्क लिए हो….. वह व्यक्ति उपरोक्त आशंकाओं और धारणाओं को क्यों अपने अंदर पाता है ?

सबसे पहले एक बात स्पष्ट होनी ज़रूरी है – राजनीति में यूँ तो कुछ भी संभव है पर फिर भी पिछला चुनाव आडवाणी का आखिरी चुनाव था इसलिए आडवाणी की कही बातों को चुनावी चक्कलस से परे होकर समझें।
तो आखिर आडवाणी को क्यों लगता है कि नरेंद्र मोदी इमरजेंसी जैसा कदम भी उठा सकतें हैं हालांकि खुद आडवाणी इसे वर्तमान में आसान नहीं मानते हैं। क्यों आडवाणी को भारत में लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्धता पर संदेह है ? क्या कारण है की वे भारतीय मीडिया को भी इस मामले में पिछड़ा मानते हैं ? क्या वजह है की उनका यकीन अब भी भारतीय न्यायपालिका पर बना हुआ है ?

ईश्वर आडवाणी को शतायु करें परन्तु फिर भी अपने लम्बे,उद्देश्यपूर्ण और अर्थपूर्ण जीवन के बाद आडवाणी अपनी मृत्यु पहले अपने जीवन को अर्थहीन और ‘आउट ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट’ नहीं करना चाहतें हैं जो कि हर हाल में सही भी है। समय पूर्व परिस्तिथिजन्य कारणों से निष्क्रिय हुए वाजपेयी के बाद आडवाणी अकेले पड़ गएँ हैं। वे मुरली मनोहर जोशी की तरह हाशिये से आवाज़ नहीं देना चाहते – आखिर किसे दें ? और सुनेगा कौन ? नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सुनिश्चित कर दिया है कि नमो नमो की आकाशवाणी में और कुछ सुनाई ही ना दे। आडवाणी कलराज मिश्र और उमा भारती की तरह फटे दूध का पनीर भी नहीं बना सकते और ना ही गोविंदाचार्य की तरह हठयोग का अभ्यास ही कर सकते। अखबार, न्यूज़ चैनलों और वैब पर नमो चालीसा देख-सुनकर वे सिर्फ बीते दिनों के ‘सामूहिक नेतृत्व’ को याद कर सकतें हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भाजपा की रीपैकेजिंग कर यह तय कर दिया है कि अब भाजपा भी एकनायकवाद को फॉलो करेगी तभी तो मोदी सरकार का एप्प नहीं बनाया जाता बल्कि सिर्फ नरेंद्र मोदी एप्प लॉन्च किया जाता है। आडवाणी अपनी तन्हा शामों में ‘फ़्लैश बैक’ में देखतें होंगे ‘चाल,चेहरा और चरित्र’ की वो विचारधारा जिसको उस वक़्त सिर्फ प्रमोद महाजन ही चुनौती देते थे वह भी सम्मान के साथ पर अब एक ही व्यक्ति पूरे देश को चलाता है , एक ही व्यक्ति का चरित्र बेदाग़ है और एक ही व्यक्ति का चेहरा होर्डिंग/पोस्टरों,अख़बारों और टीवी चैनलों , यहाँ तक कि रेडियो से छलक रहा है।

वो पार्टी जिसको आडवाणी ने अपने खून-पसीने से सींचा अब वो पार्टी ही गौण हो गई है। मार्दर्शक मंडल को आज तक यह ही नहीं पता कि मार्गदर्शन देना किसको है ? अमित शाह तो ‘रीड ओनली’ प्रोग्राम के ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ पर काम करते हैं सो उनसे क्या उम्मीद रखी जाए ? नागपुर ने पिछले लोकसभा चुनाव से पहले ही मोदी के विस्तार के साथ आरएसएस के विस्तार को जोड़ लिया था सो अब अडानी-अंबानी के सानिध्य में हो रहे इवेंट में सिवाय चुप रहने और अपना फ़र्ज़ निभाते हुए आशंका व्यक्त करने के अलावा ये बूढ़ा शेर कर भी क्या सकता है ?

एक से अधिक कारणों से यह भी समझ में आता है क्यों आडवाणी को मोदीराज में सिर्फ न्यायपालिका से ही उम्मीद है। शायद इंदिरा गांधी की लागू की गई इमरजेंसी में 19 महीने जेल में गुजारने वाले आडवाणी को पुराने दिन याद आये होंगे और याद आया होगा कैसे उस अँधेरे में जन आंदोलन के अलावा सिर्फ न्यायपालिका ही थी जिसने रोशनी दी थी। भाजपा के इस ‘युगपुरुष’ को वर्तमान में चल रहे कोलेजियम विवाद की जानकारी होगी ही, इस मामले में यदि सरकार की चली तो कहीं आडवाणी की ये आखिरी उम्मीद की लौ भी मंद ना पड़ जाए।
एक तरफ मोदी रथ सरपट दौड़ा जा रहा है। आडवाणी भी सरपट दौड़ते रथ के घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनते होंगे। सुनते होंगे वो राग दरबारी जो गाती है की कैसे पूरा विश्व एक ही नेता के स्वागत-सत्कार करने को आतुर है। पर आडवाणी दुखी हैं कि अन्ना नाम की आग समय से पहले बुझ गई , इस से हुई निराशा में क्या जोड़ता होगा- दिल्ली में चल रहा एंटी केजरीवाल ऑपरेशन ? जो मोदी की लोकतंत्र में आस्था का एक सबूत माना जा सकता है। आम आदमी पार्टी के 67 विधायकों में से 21 के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा चार्ज शीट दायर करने की तैयारी है। यह बात आडवाणी भी जानते हैं कि दिल्ली पुलिस किसके अधीन आती है।
कुल मिलाकर युद्ध कौशल में माहिर एक समय के माने हुए योद्धा का रण क्षेत्र की सीमा पर बैठकर युद्ध देखते हुए प्रतिक्रिया देना बनता है।
क्यूंकि लाल कृष्ण आडवाणी को किसी संजय की आवश्यकता नहीं है….आडवाणी धृतराष्ट्र नहीं हैं।

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