/धौलपुर पैलेस का असली मालिक कौन..

धौलपुर पैलेस का असली मालिक कौन..

-महेश झालानी॥

धौलपुर में स्थित होटल राजनिवास पैलेस जो पहले धौलपुर महल कहलता था । अगर सरकारी दस्तावेजो पर विश्वास करे तो यह असल सम्पति सरकार की है । इसकी जाँच होती है तो कई अफसरों की कारस्तानी सामने आएगी कि किस प्रकार सरकारी सम्पति को न केवल निजी बना दिया बल्कि अतिक्रमियों को गैर वाजिब तरीके से मुआवजा भी उपलब्ध करा दिया गया है ।11702862_1467130966932469_5283962055604841950_n

आगरा से करीब 45 और दिल्ली से 240 किलोमीटर दूर धौलपुर का यह आलिशान महल अब होटल राज निवास पैलेस में तब्दील होकर रह गया है । 1954 से 2010 तक यह रिकार्ड के मुताबिक सरकारी सम्पति था । अफसरों की मिलीभगत तथा वसुंधरा के रसुखात की वजह से अब यह उनके बेटे दुष्यंत सिंह की मिलकियत बन चुका है ।

यूरोपियन अर्टिटेक्टर की झलक वाला यह महल 1876 ई में ब्रिटिश राज के दौरान अल्बर्ट एडवर्ड के आगमन पर बनवाया गया था । आजादी तक यह ब्रिटिश हुकूमत के पास रहा और 1954 में यह सरकार के अधीन आ गया । 1980 में वसुंधरा के पति पूर्व राजा हेमंत सिंह ने कोर्ट में यह बयान दिया कि यह सरकारी सम्पति है ।

पारिवारिक समझौते के अनुसार दुष्यंत सिंह को शिमला में स्थित लॉज, सिटी पैलेस, ड्योढ़ी पैलेस, लोधी पैलेस, मोटर गैराज, रामसागर गार्डन, खेती की ज़मीन तथा धौलपुर पैलेस के शाही खजाने की ज्वेलरी हासिल हुई । उल्लेखनीय तथ्य यह कि दुष्यंत सिंह को धौलपुर पैलेस का शाही खजाना तो मिला, लेकिन धौलपुर पैलेस नहीं ।

इस महल से विवादों में घिरी वसुंधरा के लिए यह महल अब जी का जंजाल बन गया है । जानिए इस पैलेस के इतिहास और भूगोल के बारे में सब कुछ तथ्यात्मक जानकारी । धौलपुर का महल यानी राज निवास पैलेस वसुंधरा राजे के ससुर राजा उदयभानु सिंह ने बनवाया था. वसुंधरा के पति राजा हेमंत सिंह को उनके नाना उदयभानु सिंह ने गोद ले लिया था, यानी वह उनके दत्तक पुत्र थे.

धौलपुर नगर परिषद और तहसील कार्यालय के दस्तावेजों के मुताबिक खसरा नंबर 875 में राजमहल और उसके चारों ओर की जमीन का रकबा 45 बीघा एक बिस्वा है.

सन् 2003 में पहली बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनने के बाद वसुंधरा ने अपने महल की चारदीवारी पचास मीटर आगे बढ़ा दी थी. सबसे दिलचस्प बात ये कि अदालती दस्तावेजों के मुताबिक संपत्ति के अधिकार को लेकर वसुंधरा और उनके बेटे दुष्यंत का मुकदमा राजा हेमंत सिंह के साथ चल रहा था. इसका फैसला 19 मई 2007 को आया.

यानी संपत्ति का सेटलमेंट मई 2007 में हुआ. लेकिन नगर परिषद के दस्तावेजों के मुताबिक संपत्ति दुष्यंत के नाम 11 जून 2004 को ही हो गई. अब इस बात का जवाब नगर परिषद के पास नहीं है कि तीन साल बाद की चीजें नगर परिषद अध्यक्ष ने 2004 में ही कैसे ताड़ लीं.

महल लगभग एक बीघे में बना है. इसमें पचास से ज्यादा कमरे हैं. दो आंगन हैं. मुख्यमंत्री बनने के अगले ही साल 2004 में वसुंधरा ने पुराने महल का जीर्णोद्धार कराया और उसे हैरिटेज होटल बना दिया. तब पर्यटन विभाग ने साढ़े तीन करोड़ रुपये ऐतिहासिक विरासतों की साज संभाल के लिए आवंटित किये थे. उस रकम से एक और महल बनवाया गया. उसमें ही वसुंधरा राजे जब धौलपुर आती हैं तो रहती हैं.

महल के आसपास की 45 बीघा जमीन सरकारी दस्तावेजों में गैरआबादी वाले इलाके के रूप में दर्ज है. यानी खेती की जमीन है. लेकिन नेशनल हाइवे पर जब फ्लाईओवर बन रहा था तो वसुंधरा ने दवाब डालकर हाईवे का अलाइनमेंट थोड़ा बदलवाकर अपने राजमहल की चारदीवारी के पास से गुजरवाया. इसके बाद खेती की जमीन का लगभग दो करोड़ रुपये मुआवजा व्यावसायिक दर पर वसूल किया.

सरकार अपनी थी, लिहाजा वसुंधरा ने राजमहल के आस-पास की खेती की जमीन को भी व्यावसायिक मुनाफे वाली बनाने का इंतजाम कर लिया. दरअसल राजमहल की चारदीवारी से सटे तीन ऐतिहासिक पार्क – गांधी पार्क, नेहरू पार्क और सुभाष पार्क थे. वसुंधरा ने नगर परिषद से मिलकर तीनों पार्कों को एक करवा दिया. अपनी चारदीवारी से सटे पार्क को 25 फुट आगे खिसका दिया. खाली जगह पर मेनरोड निकाल दी ताकि महल की खाली पड़ी जमीन पर मॉल, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स या अन्य व्यावसायिक इमारत बनाकर उसका करोड़ों रुपये का मासिक किराया वसूला जाए.

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे धौलपुर की पूर्व रियासत की महारानी कहलाती हैं. उनके पास न तो किसी तरह की भूमि है, न ही कोई मकान या अन्य जायदाद. पिछले विधानसभा चुनावों के समय वसुंधरा राजे धौलपुर में 20 बीघा कृषि भूमि की मालकिन जरूर थीं, लेकिन इस बार यह जमीन भी उनके पास नहीं रही.

बीते विधानसभा चुनावों के नामांकन के साथ प्रस्तुत किए गए संपत्ति के विवरण में उन्होंने यह जानकारी दी है. वो तीन करोड़ 96 लाख 28 हजार की कुल संपत्ति की मालकिन हैं. इनमें दो करोड़ 37 हजार रुपए के शेयर, बांड और डिबेंचर हैं, जबकि 26 लाख 62 हजार 190 रुपए वसुंधरा राजे के नाम बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं में जमा हैं. उनके पास 55 लाख 50 हजार की अन्य परिसंपत्तियां हैं जिनका खुलासा नहीं किया गया है. साथ ही, उनके पास 38 लाख 55 हजार 300 रुपए कीमत का सोना है. नकदी के रूप में उनके पास साढ़े सोलह हजार रुपए हैं. इन पांच सालों में वसुंधरा राजे की संपत्ति में एक करोड़ 19 लाख का इजाफा हुआ है. वैसे उपलब्धि के तौर पर देखा जाए तो वसुंधरा राजे इन पांच सालों में कर्ज से मुक्त जरूर हो गई हैं.

दिनांक 7 मई 2007 को धौलपुर की जिला अदालत में सालों से चल रहे इस राज परिवार के एक मुकदमे में सुलह हो चुकी है. इसके अनुसार, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे धौलपुर की पूर्व महारानी बनी रहेंगी. उनके ‘पूर्व महारानी’ कहलाने पर उनके पति ‘पूर्व महाराजा’ हेमंत सिंह को कोई आपत्ति नहीं होगी. यह शर्त उस सुलह का हिस्सा है जो हेमंत सिंह और उनके सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह के बीच 7 मई 2007 को भरतपुर की एक अदालत में हुई. अदालत में पेश पिता और पुत्र के इस सुलहनामे के बाद धौलपुर राजघराने में पिछले 29 साल से चला आ रहा संपत्ति विवाद निपट गया. समझौते के मुताबिक, दिल्ली स्थित सभी संपत्ति हेमंत सिंह रखेंगे, जबकि धौलपुर व अन्य स्थानों की सभी संपत्तियों पर दुष्यंत सिंह का हक होगा.

गौरतलब है कि ग्वालियर घराने की तत्कालीन राजमाता स्वर्गीय विजय राजे सिंधिया ने 1978 में अपने नाबालिग नवासे दुष्यंत सिंह की ओर से धौलपुर की अदालत में संपत्ति के बंटवारे का दावा पेश किया था. खास बात यह कि इस मामले में वसुंधरा राजे के भी मुख्यमंत्री रहते हुए 11 सितंबर, 2005 को बयान दर्ज हुए थे. अदालत की ओर से नियुक्त कमिश्नर के सामने दिल्ली में अपने पुत्र दुष्यंत सिंह के पक्ष में दिए बयान में वसुंधरा राजे ने कहा था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत धौलपुर राजघराने की संपत्ति का स्वामित्व दुष्यंत सिंह का है. अब धौलपुर का शाही महल ‘सिटी पैलेस’, बवरगमां पैलेस और आगरा, शिमला, बनारस व अन्य स्थानों पर मौजूद चल-अचल सम्पत्ति पर सांसद दुष्यंत सिंह का स्वामित्व होगा. इनमें मौजूद हीरे-जवाहरात व दूसरे कीमती शाही सामान पर भी उनका ही हक होगा.

दिल्ली स्थित संघ लोक सेवा आयोग की इमारत धौलपुर हाउस (यूपीएससी) और धौलपुर स्थित राजनिवास पैलेस में एक बड़ी समानता यह है कि दोनों के पूर्व मालिक एक ही हैं. ये दोनों ही भवन कभी राजा हेमंत सिंह की संपत्तियां हुआ करती थीं, जो कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पूर्व पति व सांसद दुष्यंत सिंह के पिता हैं.

हाल ही में ललित मोदी प्रकरण के चलते धौलपुर स्थित जो राजनिवास पैलेस होटल विवाद में आया है, यह कभी उनकी संपत्ति हुआ करती थी. हैरिटेज होटल होने का दर्जा हासिल कर चुके इस होटल में दुष्यंत सिंह, उनकी पत्नी निहारिका, मां वसुंधरा राजे व पारिवारिक मित्र रहे ललित मोदी के शेयर हैं. यह होटल उस नियंत हैरिटेज होटल की संपत्ति है जिसके 10 रुपए के शेयर को ललित मोदी ने 96,180 रुपए की दर से खरीदा था. इस होटल का इतिहास काफी रोचक है. जिस धौलपुर में यह स्थित है वह इलाका भी पारिवारिक विवादों का शिकार रहा.

इतिहास में दर्ज है कि मध्यकाल में मुगल राज के संस्थापक बाबर को यह स्थान काफी रमणीक लगता था. बाद के भी मुगल बादशाह इस पर निसार रहे. जहांगीर से उसके युवराज बेटे शाहजहां ने अनुरोध किया था कि वह इसे सौंप दें. उसे लगा कि दरखास्त मंजूर हो ही जाएगी इसलिए स्वीकृति मिलने के पहले ही उसने अपने अफसरों को वहां भेज दिया. मगर जहांगीर की प्रिय बेगम मलिका नूरजहां को भी यह जगह बहुत पसंद थी.

वह भी इस बारे में बादशाह से अपनी इच्छा प्रकट कर चुकी थी. वह शहजादा शहरयार के लिए यह जगह चाहती थीं. उसने शरीफ उल मलिक को वहां का प्रशासक बनाकर भेज दिया. धौलपुर पर कब्जे को लेकर दोनों ही गुटों में खूनी संघर्ष हुआ और नौ लोग मारे गए. इससे बादशाह जहांगीर बहुत नाराज हुआ व उसने युवराज को वहां से बहुत दूर भेज दिया. पेशवा और मराठों के काल में भी यह महल चर्चा में रहा.

लाल पत्थर से बने इस महल के अंतिम राजा उदयभान थे. उनकी बहुत जल्दी ही मौत हो गई. हेमंत सिंह नाभा के महाराज प्रतापसिंह के बेटे थे. उदयभान की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने हेमंत सिंह को गोद लेकर उनका वारिस बना दिया. धौलपुर राज के भारत में विलय के बाद उस पर सरकार का अधिकार हो गया. हालांकि 1957 में कुछ संपत्तियों के बदले में सरकार ने उसे हेमंत सिंह को वापस लौटा दिया.

हेमंत सिंह जाट थे. उनकी ग्वालियर के महाराजा की तीसरी बेटी वसुंधरा राजे से 1972 में शादी हुई थी. यह शादी ज्यादा लंबी नहीं चली और दोनों का तलाक हो गया. जब यह तलाक हुआ तब वे गर्भवती थीं. वसुंधरा की मां और बीजेपी की वरिष्ठ नेता राजमाता विजयराजे सिंधिया ने अपनी बेटी को हक दिलवाने के लिए हेमंत सिंह के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया.

भरतपुर की अदालत में यह मुकदमा तीन दशक तक चला. अंतत: दोनों पक्षों ने अदालत के बाहर आपस में समझौता कर लिया. इसके तहत दुष्यंत को यह धौलपुर का महल, शिमला का घर, एक दर्जन विंटेज कारें और धौलपुर के खजाने के जवाहरात मिले, जबकि हेमंत सिंह को दिल्ली में पंचशील मार्ग स्थित घर व दूसरी संपत्ति मिली. वे यहीं अपनी दूसरी पत्नी व गुजरात के वाना राजघराने की इंद्राणी सिंह के साथ रहते हैं. संयोग से यह समझौता वसुंधरा राजे के राजस्थान की मुख्यमंत्री बनने के बाद हुआ.

दुष्यंत ने इसका नाम बदल कर राजनिवास पैलेस रख दिया और उनकी कंपनी नियंत हैरिटेज होटल्स ने उसे होटल में बदल दिया. यहां सात सुइट और कई कॉटेज हैं. यह इलाका काफी हरा-भरा है. यह राज्य के प्रतिष्ठित हैरिटेज होटलों में गिना जाता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.