Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

25 साल 79 पत्रकारों की मौत, “पत्रकार सुरक्षा कानून” देश के लिये और पत्रकारो के लिए क्यों जरुरी..

By   /  July 2, 2015  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

2013-14 में प्रेस इन इंडिया के रीलीज़ के मौके पर तत्कालीन माननीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि “भारत का लोकतंत्र अक्षुण है और प्रेस की आजादी भी, मीडिया लोकतंत्र की ताकत है।“  दुनिया के दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को आजाद और तेजी से उन्नत हो रही प्रेस के लिये भी जाना जाता है।jogdeth

लेकिन भारत में प्रेस का सच इसके एकदम उलट है। भारत में पत्रकारों पर हो रहे लगातार हमलों ने फ्री प्रेस और लोकतंत्र के चौथे खम्बे के खोखलेपन को उजागर करके रख दिया है। देश के छोटे-छोटे शहरों में काम कर रहे पत्रकारों की हत्या और उन पर हुए हमले लोकतंत्र और फ्री प्रेस की दुहाई के मुंह पर तमाचा है। पत्रकार की हत्या मामूली नहीं होती असल मे वो उस सच की हत्या होती है जिसे सफेदपोश भेड़िये छुपाना चाहते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में 45 दिनों के भीतर 4 पत्रकारों पर हमले हुए इनमें 11 जून को कानपुर के अखबार “मेरा सच” के रिपोर्टर दीपक मिश्रा पर गोली से जानलेवा हमला हुआ उसके एक दिन बाद 13 जून को लोकल टीवी स्ट्रिंगर हैदर खान पर घातक हमला हुआ। लेकिन जबलपुर के पत्रकार संदीप कोठारी और शाहजंहापुर के पत्रकार जगेन्द्र की हत्या ने देश में “पत्रकार सुरक्षा कानून की अपरिहार्यता को सामने लाकर रख दिया है। पत्रकार जगेन्द या पत्रकार सन्दीप कोठारी की हत्या को सिर्फ एक खनन माफिया और मंत्री के खिलाफ सच बोलने की कीमत के अलावा भी देखे जाने की जरूरत है।

पत्रकार जगेन्द्र ने देश के बड़े अखबारं में काम करते हुए 15 साल बिताये लेकिन सच को छापने का साहस उन बड़े अखबारों के पास नहीं था तभी जगेन्द्र ने स्वतंत्र पत्रकारिता का रास्ता चुना। यहां सच के लिये अकेले लड़ते हुए जगेन्द्र को अपनी जान देनी पड़ी। पत्रकार जगेन्द्र हत्याकांड में उत्तर प्रदेश में तालिबानी शासन की इंतेहा देखिये, मंत्री, सरकारी बाबू और अफसरों की साठ-गांठ की पोल खोलने पर पहले हमला कर उनका पांव तोड़ा गया झूठ के आगे सिर ना झुकाने पर कुछ दिनों बाद कथित तौर पर बाहुबली मंत्री के इशारे पर पुलिस ने उनकी जघन्य हत्या को अंजाम दे दिया और बाद में उल्टा पत्रकार पर ही आत्महत्या अवैध कार्यों का मामला दर्ज कर दिया गया।

इसके पूर्व भी पत्रकारों पर जानलेवा हमले हुए है कई मारे भी गए हैं पत्रकारों पर लगातार हमले और हत्याओं ने सिद्ध कर दिया है कि माफियाओं, पुलिस और भ्रष्ट नेताओं की इस देश में कितनी चलती है और भारत में पत्रकार कितने असुरक्षित हैं। भारतीय प्रेस परिषद के मुताबिक भारत में बीते 25 सालों में 79 पत्रकार अपना काम करते हुए जान दे चुके हैं। उत्तर प्रदेश ने तो इसका चरम दिखा दिया है मात्र 45 दिनों में 4 पत्रकारों की हत्या कर दी गई।

शर्म की बात है कि आजादी के 67 साल बाद भी लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ, शर्म की बात है कि आजादी की 67 साल बाद भी लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ अर्थात पत्रकारों के लिये आज तक सुरक्षा कानून नहीं है। भारत में अखबारों का इतिहास काफी पुराना है। सच बोलने पर जेम्स  ऑस्स्ट  ऑगस्ट हिक्की पर फर्जी मुकदमे चलाए गए थे, उदंत मार्तंड बन्द कर दिया गया था, लेकिन ये बात ब्रिटिश शासन की थी। ब्रिटिश शासन उसकी दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों का निर्ममता से दमन करता था, लेकिन हालात आज भी नहीं बदले हैं। देश में मीडिया फ्री नहीं है, क्योंकि सच्ची खबरों को लाने वाले पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं। देश में आज भी अंग्रेजो का बनाया कानून पीआरबीपी एक्ट 1867 कुछ मामूली संशोधनों के साथ लागू है।

इस देश में अपने प्राणों को संकट में डाल कर सच को उजागर करने वाले पत्रकारों के ना तो हित सुरक्षित हैं ना प्राण। प्रेस की आजादी को वाक एवं स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के अधिकार 19 (1) क,  के तहत रख दिया गया है। पत्रकार जो सच के लिये आवाज उठाता उसे कोई विशिष्ट दर्जा तक नहीं दिया गया है।

अगर हम देश के कुछ महानगरों और टीवी पत्रकारिता की बात छोड़ दे तो देश के सूदूर इलाको में काम करने वाले पत्रकार छोटी-छोटी खबरों के लिये अपने प्राण संकट में डालते हैं। उग्रवाद ग्रस्त या नक्सल प्रभातिव इलाकों में ये पत्रकार किस तरह काम करते हैं कभी सोचा नही गया। ज्यादातर पत्रकार बहुत छोटे स्तर पर अपना अखबार चलाते हैं या स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। स्वतंत्र पत्रकारों को अख़बार की एक स्टोरी के लिये केवल 150 रुपए मिलते हैं जबकि एक टीवी स्टोरी के 700 से 800 रुपए मिलते हैं। यदि एक पत्रकार एक महीने में 10 स्टोरी प्रकाशित करवाने में कामयाब होता है तो उस महीने में उसकी आय 1500 रुपए होती है। एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम कमाई में वो जान का खतरा उठाए रहता है।

Committee to Protect Journalists (CPJ) की 2015 में बनाई गई एक लिस्ट के मुताबिक पत्रकारिता में जोखिम के मामले में भारत का विश्व में 10वां स्थान है। वर्ष 2013 में CPJ द्वारा जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट में भारत को पत्रकारों के लिये मोस्ट डेड्लिएस्ट जोन में 7वे नम्बर पर रखा गया था। उस वर्ष 8 पत्रकारों की निर्मम हत्या हुई थी लेकिन सरकार नहीं चेती। क्रिमिनल गैंग्स, राजनीतिक दलों और प्रदर्शनकारियों पर भी पत्रकारों पर हमले के आरोप लगे। लेकिन इनमे लोकल पुलिस और सुरक्षा व्यव्स्था भी कम दोषी नहीं है जो पत्रकारों के खिलाफ हुई हिंसा के मामलों में बाहुबलियों, और माफियाओं के दबाव में कार्रावाई नहीं करते।

भारत में 1992 से अब तक हजारों पत्रकारों पर जानलेवा हमले किये गये जिनमे से 37 पत्रकारों की निर्मम हत्या कर दी गई।

1-            संदीप कोठारी, फ्रीलांस,जबलपुर, मध्य प्रदेश, 21 जून 2015,

2-            जगेन्द्र सिंह, फ्रीलांस, उत्तर प्रदेश, शाहजहांपुर, 8 जून 2015,

3-            MVN शंकर, आंध्र प्रभा, आंध्र प्रदेश, भारत में 26 नवंबर 2014,

4-            तरुण कुमार आचार्य, कनक टीवी, सम्बाद ओडिशा, 27 मई 2014,

5-            साई रेड्डी, देशबंधु, बीजापुर जिले, भारत में 6 दिसम्बर 2013,

6-            नरेंद्र दाबोलकर, साधना,  पुणे,  20 अगस्त 2013,

7-            राजेश मिश्रा, मीडिया राज, रीवा, मध्य प्रदेश, 1 मार्च 2012

8-            साई रेड्डी, देशबंधु, बीजापुर जिले, 6 दिसम्बर 2013

9-            राजेश वर्मा, आईबीएन 7, मुजफ्फरनगर, 7 सितंबर 2013,

10-          द्विजमणि  सिंह, प्रधानमंत्री समाचार, इम्फाल, 23 दिसम्बर 2012,

11-          विजय प्रताप सिंह, इंडियन एक्सप्रेस, इलाहाबाद, 20 जुलाई 2010,

12-          विकास रंजन, हिंदुस्तान, रोसेरा, नवंबर 25, 2008

13-          जावेद अहमद मीर, चैनल 9, श्रीनगर, 13 अगस्त 2008,

14-          अशोक सोढ़ी, डेली एक्सेलसियर, सांबा, 11 मई 2008,

15-          मोहम्मद मुसलिमुद्दीन, असोमिया प्रतिदिन, बारपुखरी, 1 अप्रैल, 2008

16-          प्रहलाद गोआला, असोमिया खबर, गोलाघाट, 6 जनवरी 2006,

17-          आसिया जीलानी, स्वतंत्र, कश्मीर, भारत में 20 अप्रैल 2004,

18-          वीरबोइना यादगिरी, आंध्र प्रभा, मेडक, भारत में 21 फ़रवरी 2004,

19-          परवेज मोहम्मद सुल्तान, समाचार और फीचर एलायंस, श्रीनगर, 31 जनवरी 2003,

20-          राम चंदर छत्रपति, पूरा सच, सिरसा, 21 नवंबर 2002,

21-          मूलचंद यादव, फ्रीलांस, झांसी, 30 जुलाई 2001,

22-          प्रदीप भाटिया, हिंदुस्तान टाइम्स, श्रीनगर, 10 अगस्त 2000,

23-          एस गंगाधर राजू, इनाडू,  टेलीविजन (ई टी वी),  हैदराबाद, 19 नवंबर 1997

24-          एस कृष्णा, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,

25-          जी राजा शेखर, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,

26-          जगदीश बाबू, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,

27-          पी श्रीनिवास राव, इनाडू टेलीविजन (ई टी वी), हैदराबाद, 19 नवंबर 1997,

28-          सैदान शफी, दूरदर्शन टीवी, श्रीनगर, 16 मार्च, 1997,

29-          अल्ताफ अहमद, दूरदर्शन टीवी, श्रीनगर, 1 जनवरी, 1997,

30-          पराग कुमार दास, असोमिया, असम, 17 मई, 1996,

31-          गुलाम रसूल शेख, रहनुमा-ए-कश्मीर और केसर टाइम्स, कश्मीर, 10 अप्रैल 1996,

32-          मुश्ताक अली, एजेसीं फ्रांस-प्रेस और एशियन न्यूज इंटरनेशनल, श्रीनगर, 10 सितम्बर 1995,

33-          गुलाम मोहम्मद लोन, फ्रीलांसर, कंगन, 29 अगस्त 1994,

34-          दिनेश पाठक, सन्देश, बड़ौदा, 22 मई 1993,

35-          भोला नाथ मासूम, हिंदुस्तान समाचार, राजपुरा, 31 जनवरी 1993

36-          एम एल मनचंदा, ऑल इंडिया रेडियो, पटियाला, 18 मई 1992,

37-          राम सिंह आजाद आवाज़, डेली अजीत, जालंधर, 3 जनवरी 1992,

दुनिया के कई देशों में पत्रकार सुरक्षा कानून बने हैं, जो पत्रकारों को सही और सच्ची खबर लाने के लिये प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन भारत आज भी पत्रकार सुरक्षा कानून से वंचित है। अत: “लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” मांग करती है कि सरकार भारत में तुरंत प्रभाव से “पत्रकार सुरक्षा कानून” निर्माण व लागू करे। लीपा की बायलॉज के 4एफ में स्पष्ट वर्णित है कि लीपा “जर्नलिस्ट प्रोटेक्शन” और “फ्री प्रेस” के लिये कार्य करेगी। उसी के अंतर्गत “पत्रकार सुरक्षा कानून” के निर्माण के लिये “लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” अपनी संस्तुतियां सरकार को दे रही है। इसके पूर्व “लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” ने दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर याचिका दायर करने का निर्णय भी लिया था लेकिन चूंकि इस विषय पर पहले से ही एक याचिका दायर है अत: कोर्ट में इस मुद्दे को दोबारा नहीं ले जाया जा सकता लेकिन लीपा इस विषय पूर्ण रूप से सक्रिय है और लीपा तब तक इस लड़ाई को जारी रखेगी जब तक “पत्रकार सुरक्षा कानून लागू नहीं हो जाता।

प्रकाशित होते-होते – अफसोस की बात है कि इस 26 जून की रात एटा में अमर उजाला के पत्रकार मुकेश वार्ष्णेय  और सुराग ब्यूरो के पत्रकार सचिन वार्ष्णेय पर हमला किया गया, पत्रकार सचिन के सिर में गोली लगी जिससे वो गम्भीर रूप से घायल हैं। यहां भी प्रशासन का घटिया रूख देखिये एसएसपी एटा ने इसे फर्जी मामला करार दे कर रिपोर्ट तक दर्ज..

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 2 years ago on July 2, 2015
  • By:
  • Last Modified: July 2, 2015 @ 9:57 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: