/हेमा मालिनी की चिंता हर किसी को, उनकी कार की टक्कर से मरी बच्ची की परवाह किसी को नहीं..

हेमा मालिनी की चिंता हर किसी को, उनकी कार की टक्कर से मरी बच्ची की परवाह किसी को नहीं..

-नदीम एस अख्तर॥

हेमा मालिनी का माथा फूटा, थोड़ा खून बहा, रुमाल लाल हुआ, सारे देश ने देखा. कहां चोट लगी है, कितनी लगी है, अब क्या हालत है, सब जानने को उत्सुक थे मानो. और अगर नहीं भी थे तो मीडिया खासकर टीवी वाले -पत्तलकार- सब जानकारी देने को बावले हुए जा रहे थे. अपडेट पर अपडेट. मानो देश पर कोई आपदा आ गई हो. एटम बम अब गिरा कि तब गिरा. फिल्मों की ड्रीम गर्ल (रीयल लाइफ की नहीं) अस्पतालों के अस्पताल यानी फोर्टिस हॉस्पिटल पहुंची भी नहीं थीं कि डॉक्टरों की पूरी फौज पलकें-पांवड़े बिछाए उनके इलाज के लिए सिर के बल खड़ी थी. शोले फिल्म में गब्बर के आदेश पे कांच के टूटे टुकड़ों के बीच नाचने वाली बसंती ने खून से अपना पैर लहूलुहान कर लिया था लेकिन जब असल लाइफ में इस बसंती यानी हेमा के माथे से दो बूंद खून टपका तो राजस्थान की सीएम भी बेइंतहा फिक्रमंद हो गईं. फौरन ट्वीट कर दुख जता दिया.received_10153540592805992

लेकिन इस सारे शोर-शराबे के बीच भारत का एक आम गरीब परिवार तिल-तिल कर मरता रहा. ये वो बदनसीब थे, जिनकी सस्ती ऑल्टो कार हेमा की महंगी मपर्सिडीज से जा टकराई थी. सस्ती ऑल्टो कार ने उन्हें इतनी चोट पहुंचाई थी कि एक छोटी बच्ची की मौत हो गई और बाकी दो रिश्तेदार गंभीर रूप से घायल हो गए. लेकिन उन्हें फोर्टिस अस्पताल में जगह नहीं मिली. उनकी स्थिति ज्यादा नाजुक थी, पर ठिकाना मिला सरकारी अस्पताल में. अब आप कह सकते हैं कि सरकारी अस्पताल है तो क्या हुआ?? इलाज तो वहां भी होगा. तो इस लॉजिक के हिसाब से हेमा मालिनी को भी सरकारी अस्पताल में भर्ती करा देते!!! उन्हें फोर्टिस के विशेषज्ञों के पैनल के हवाले क्यों किया???!!!

रही बात टीवी मीडिया की तो हमेशा की तरह वह अपने पुराने अंदाज में थी. हेमा की खबर को बेचो. किसी ने ये जानने की जहमत नहीं उठाई कि जो बच्ची मरी है, जो गंभीर रूप से घायल हैं, उनका क्या हाल है. सब के सब हेमा पर पिले पड़े थे. एक-दो चैनलों ने इस नॉन सेलिब्रिटी परिवार का हाल दिखाया लेकिन नाम मात्र के लिए. खबर तो हेमा थी, उसे ही बिकना था और वही बेचा गया.

रात जब टीवी पर ये तमाशा देख रहा था तो बहुत कोफ्त हुई. गुस्सा इतना आया कि कोई बंदूक लेकर दनादन हवाई फायरिंग करूं. या फिर मुक्का मार-मारकर कोई दीवार तोड़ दूं. क्या यही वो देश है, जिसे हम अपना कहते हैं. यही वो मीडिया है, जो आदमी के लिए काम करने का दम भरता है. क्या यही वो सिस्टम है जो इस देश के नागरिकों में उनकी सामाजिक हैसियत के हिसाब से खुलेआम बेशर्मी के साथ भेदभाव करता है???!!! अगर ऐसा है तो इस देश में मुझे नहीं रहना. बाहर विदेश जाकर कहीं सेटल हो जाऊंगा. पराए भेदभाव करेंगे तो दिल नहीं जलेगा, लेकिन जब अपने भेद करते हैं तो दिल बैठ जाता है. उस पीड़ा को मैं बयान नहीं कर सकता.

कल उस गरीब आम आदमी परिवार पर क्या बीती होगी, उनका कैसा इलाज हो रहा होगा, उन्हें कितनी देर बाद और कैसे-कैसे अस्पताल पहुंचाया गया होगा, इसका बस अंदाजा लगाया जा सकता है. अंदाजा इस बात से भी लगाइए कि दिल्ली की निर्भया और उसका दोस्त खून से लथपथ अर्धनग्न सड़क किनारे जीवन की अंतिम घड़िया गिन रहे थे और शहर की पूरी फौज उसे तककर वहां से आंख मूंदकर गुजर रही थी. और जब कानून के रखवाले पुलिसवाले पहुंचे तो उन्हें मरता छोड़ ये हिसाब लगा रहे थे कि निर्भया के खून से सनी वो जमीन दिल्ली पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आती है या हरियाणा पुलिस के. अगर वक्त पर निर्भया को अस्पताल पहुंचा दिया गया होता (वहां से गुजर रहा कोई नागरिक ही पहुंचा देता या देर से पहुंचने के बाद पुलिस ही पहुंचा देती) तो शायद आज वह हमारे बीच होती.

फर्ज कीजिए कि उस रात वहां निर्भया की जगह कोई नेता या सेलिब्रटी होता, क्या तब भी नागरिकों और पुलिस का रवैया वैसा ही होता??!! नहीं होता ना. जी हां, बिलकुल नहीं होता और ये बात कल हेमा मालिनी के एक्सीडेंट वाली घटना ने फिर साबित कर दी. सच तो ये है कि हमारे देश का सिस्टम और संविधान हर नागरिक के बराबरी की बात भले करे लेकिन वह काम उसके सामाजिक स्टेटस के हिसाब से करता है.

कल के बाद से मन बुरी तरह व्यथित है. हेमा-आल्टो की टक्कर में मारे गए मासूम की फोटो लगा रहा हूं. इस फोटो को देखना आसान नहीं है, फिर भी लगा रहा हूं. ताकि सबको याद रहे कि इस देश में गरीब की मौत, अमीरों के घायल होने से भी ज्यादा सस्ती है. जय हिंद.

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