/“चलिए, छेड़ दें “ना” कहने के अधिकार का आन्‍दोलन..

“चलिए, छेड़ दें “ना” कहने के अधिकार का आन्‍दोलन..

No means no

 

-कुमार सौवीर॥

लखनऊ: मोहनलालगंज में एक साल पहले एक युवती की पाशविक हत्‍या के बाद अब यूपी में बर्बरता पूर्वक मारी गयीं महिलाओं नंगी लाशों का सिलसिला बिखेर दिया है। पुलिस के आला अफसरों ने इस मामले को दबाने की साजिश की और इसके लिए नंगे झूठ की एक आलीशान इमारत खड़ा करने की कोशिश में लगा दी गयीं पुलिस की एक महानिदेशक सुतापा सान्‍याल। असल काण्‍ड को दरकिनार कर उन्‍होंने एक झूठी कानी बना दी। नतीजा यह कि उसके बाद अकेले लखनऊ में ही आधा दर्जन से ज्‍यादा युवतियों को नृशंस कर उनकी नंगी लाशों में तब्‍दील कर दिया गया।
आपको बता दें कि मोहनलालगंज के मारी गयी उस युवती दो बच्‍चों की मां थी, जिसका बड़ा बच्‍चा 7 साल का था, बेटी की उम्र 5 साल। पति का देहान्‍त गुर्दा की बीमारी में हुआ था, जिसे बचाने के लिए उसने अपना एक गुर्दा भी दान दे दिया था। वह युवती पीजीआई में ठेकेदारी पर चल रही लैब की कर्मचारी थी। वेतन पांच हजार। लेकिन कई महीनों तक वेतन नहीं देता था वह ठेकेदार। ऐसे में वह युवती कभी-कभी अपना शरीर तक बेचने पर मजबूर हो जाती थी, परिवार काे पालने के लिए।
जिस दिन उसकी हत्‍या हुई, उसे उसके ग्राहक ने महज चार सौ रूपयों के लिए अपनी देह का सौदा किया था। एक ग्राहक के लिए। लेकिन मुझे मिली सूचनाओं के अनुसार जब वहां मौके पर पहुंची तो वहां कई लोग मौजूद थे। उस युवती ने यह सौदा खारिज कर दिया और वापस लौटने लगी। इस पर वहां मौजूद लोगों ने उस पर जुल्‍म ढाना शुरू कर दिया। मारा-पीटा, नोंचा-खसोटा। और दरिंदगी का आलम यह तक रहा कि कम से दो हत्‍यारों ने उसकी टांग खींच कर झटके देकर कर वहां लगे इंडिया मार्क-टू का हत्‍था उसके जननांग में घुसेड़ दिया। जाहिर है कि इस असह्य पीडा को वह सहन नहीं कर पायी और उसकी मौत हो गयी।
लेकिन इसके बाद कई बड़े अफसरों ने असल काण्‍ड पर पर्दा डालने के लिए सुतापा सान्‍याल की आड़ ली। सुतापा को किसी दारोगा की तरह पेश किया और मीडिया को झुठ का पुलिन्‍दा थमा दिया। सुतापा पुलिस के आला अफसरों में एक हैं। उनके पास अपर मुख्‍य सचिव के अनुरूप हैसियत है।लेकिन वे केवल अपने सम्‍मान, वैभव और ऐश्‍वर्य तक ही सीमित रहीं। यह जानते हुए भी उन्‍हें एक
घिनौने मोहरे में तबदील किया जा रहा है, उन्‍होंने उफ तक नहीं किया और अपने आला अफसरों की जी-हुजूरी में ही जुटी रही। किसी बेहूदा रट्टू-ताेता की तरह। नतीजा यह हुआ कि एक साल के भीतर ही करीब आधा दर्जन युवतियों की लाशें राजधानी लखनऊ कें जहां-तहां बिखेर दी गयीं।
हे ईश्‍वर।
मैंने इस युवती को अपनी मेरी बिटिया क दर्जा दे दिया है। मेरे पास इसके लिए पुख्‍ता कारण-तर्क भी हैं। कम से कम उसने अपनी देह के बारे में स्‍वतंत्र सोचने और फैसले का प्रयोग किया। वह अडिग रही अपने फैसले पर,तनी रही अपनी रीढ़-मेरूदण्‍ड पर। खुद को झुकाया नहीं, भले ही प्राण निकल गये।
मैं आपसे पूछता हूं कि क्‍या आपके पास इतना जिगरा है? बहुत दूर जाने की भी कोई जरूरत नहीं, आप अपने आसपास ही टटोल लीजिए। केंचुए की तरह बिलबिलाते हुए इंसान हमेशा गिड़गिड़ाते ही दिख जाएंगे।
एक सामाजिक कार्यकर्ता विनीता सहगल का कहना है कि:- “उस युवती ने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग किया था। और इस अधिकार के लिए उसने जान तक दे दी। अब हमारे समाज में झांकिये ना, कि कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो अपनी “ना” के अधिकार को लेकर अपनी आवाज उठा सकती हैं, उसके लिए लड़ पड़ना या जान दे देना तो बहुत कोसों दूर की बात है। मेरी नजर में तो वह युवती तो स्‍त्री-सशक्‍तीकरण की श्रेष्‍ठतम जीवन्‍त घटना है।”
अब यहां कई सवाल हैं दोस्‍तों। वाकई, उस बिटिया ने अपने बाल-बच्‍चों जैसी घरेलू मजबूरी के चलते खुद के शरीर को एक दिन महज 400 रूपयों के लिए बेचना का सौदा किया, लेकिन केवल एक ग्राहक के लिए। जब उसने देखा कि वहां कई नर-पिशाच मौजूद हैं, तो उसने अपने ना के अधिकार का तत्‍काल प्रयोग कर लिया और उसी अधिकार के लिए प्राणोत्‍सर्ग कर दिया। उस पर नारकीय
जुल्‍म-सितम ढाते गये, लेकिन उसने अपने अधिकार के पालन में ऊफ तक नहीं किया।
अपने अधिकार के लिए जान तक लुटा देने वाली महिला, कम से कम मुझे तो अब तक नहीं मिली। मैं तो सैल्‍यूट करता हूं। मेरी नजर में तो वह बिलकुल भारत-रत्‍न से कम नहीं। इसीलिए तो मैं उसे अपनी मेरी बिटिया कहता हूं।
अब, असल सवाल पर आते हैं। महज पांच हजार रूपया पर महीना काटने वाले पुलिस महानिदेशक सुतापा सान्‍याल ने अपने एक भी अधिकार का इस्‍तेमाल नहीं किया। है कि नहीं? वह केवल अपने उच्‍चाधिकारी-उच्‍चाधिकारियों और आकाओं के हुक्‍म का ही पालन करती रहीं। आपसे कहा गया कि जाओ और इस मामले में साफ झूठ बोल दो मीडिया के सामने। और आपने ऐसा कर दिया बेहिचक। जबकि वे जानती थीं कि जो भी कराया जा रहा है, वह बिलकुल झूठ है और अपराध है। और ऐसे झूठ युगों की सत्‍यता को कलंकित कर देते हैं।
मगर उस मेरी बिटिया ने ऐसा नहीं किया था।उसने आखिरी दम तक संघर्ष किया। भले ही उसकी जान चली गयी। जबकि सुतापा सान्‍याल ने अवांछित, आपराधिक और षडयंत्री किलाबंदी में खुद को एक मोहरा ही बनना पसन्‍द किया, अपने “ना” अधिकार का कत्‍तई प्रयोग नहीं। इस पूरे दर्दनाक हादसे के बावजूद उन्‍होंने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग नहीं किया। अगर कर लेतीं तो आज
वे स्‍त्री-सशक्‍तीकरण और महिला सम्‍मान की शिखर-पुरूष बन जाती होतीं।
और कहां वह दो-कौडी की मेरी बिटिया, जिसने औरत की खुद्दारी का एक नया आयाम-अध्‍याय लिखने के लिए अपना प्राण दे दिया। अब अपने बारे में आप खुदतय कर लीजिएगा, मगर इस मेरी बिटिया को मैं भारत-रत्‍न से श्रेष्‍ठ मानता हूं।
मेरी बिटिया जिन्‍दाबाद।
जाहिर है कि कोई भी नागरिक अब सुतापा सान्‍याल को अपना आदर्श नहीं मानेगी। इसीलिए मैं अब खोजना चाहता हूं ऐसे अफसरों को, जिन्‍होंने खुद को बिक जाने के बजाय अपने होने को साबित किया। भारी दुश्‍वारियों के बावजूद अपना पक्ष बिलकुल साफ रखा। इसमें से कुछ ने तो इसकी भारी कीमत भी चुकाई,लेकिन अडिग रहे। हमेशा। सिर तान कर।
हमारा यह अभियान आज से शुरू हो चुका है। नाम है:- “ना” कहने का अधिकार आन्‍दोलन। हम चाहते है कि इस अभियान कम से कम 20 जुलाई तक जरूर चले, जब एक आला शासकीय नौकर सुतापा सान्‍याल ने इस काण्‍ड को भयंकर विद्रूप शक्‍ल में तब्‍दील कर दिया था। इस अभियान में हम आपको रोजाना यह भी बतायेंगे कि किस तरह बड़े सरकारी नौकर अपने आकाओं की हां में खुद को खत्‍म कर देते हैं, और कैसे चंद लोग अपने ना कहने के अधिकार का प्रयोग कर खुद को
प्रकाश-स्‍तम्‍भ के तौर पर दमकते दिख जाते हैं।”
चलिए, छेड़ दें “ना” कहने के अधिकार का आन्‍दोलन
आला पुलिस अफसर की हां ने बिखेर दीं यूपी की बेटियों की नंगी लाशें
सरकारी कार्यशैली से गुम होता जा रहा है “ना” का आधिकार
दैनिक तरूणमित्र ने थाम लिया है इस आंदोलन का परचम
अब कम से कम एक महीने तक खुलासा होगी इस आंदोलन पर चर्चा

कुमार सौवीर

लखनऊ: मोहनलालगंज में एक साल पहले एक युवती की पाशविक हत्‍या के बाद अब यूपी में बर्बरता पूर्वक मारी गयीं महिलाओं नंगी लाशों का सिलसिला बिखेर दिया है। पुलिस के आला अफसरों ने इस मामले को दबाने की साजिश की और इसके लिए नंगे झूठ की एक आलीशान इमारत खड़ा करने की कोशिश में लगा दी गयीं पुलिस की एक महानिदेशक सुतापा सान्‍याल। असल काण्‍ड को दरकिनार कर उन्‍होंने एक झूठी कानी बना दी। नतीजा यह कि उसके बाद अकेले लखनऊ में ही आधा दर्जन से ज्‍यादा युवतियों को नृशंस कर उनकी नंगी लाशों में तब्‍दील कर दिया गया।
आपको बता दें कि मोहनलालगंज के मारी गयी उस युवती दो बच्‍चों की मां थी, जिसका बड़ा बच्‍चा 7 साल का था, बेटी की उम्र 5 साल। पति का देहान्‍त गुर्दा की बीमारी में हुआ था, जिसे बचाने के लिए उसने अपना एक गुर्दा भी दान दे दिया था। वह युवती पीजीआई में ठेकेदारी पर चल रही लैब की कर्मचारी थी। वेतन पांच हजार। लेकिन कई महीनों तक वेतन नहीं देता था वह ठेकेदार। ऐसे में वह युवती कभी-कभी अपना शरीर तक बेचने पर मजबूर हो जाती थी, परिवार काे पालने के लिए।
जिस दिन उसकी हत्‍या हुई, उसे उसके ग्राहक ने महज चार सौ रूपयों के लिए अपनी देह का सौदा किया था। एक ग्राहक के लिए। लेकिन मुझे मिली सूचनाओं के अनुसार जब वहां मौके पर पहुंची तो वहां कई लोग मौजूद थे। उस युवती ने यह सौदा खारिज कर दिया और वापस लौटने लगी। इस पर वहां मौजूद लोगों ने उस पर जुल्‍म ढाना शुरू कर दिया। मारा-पीटा, नोंचा-खसोटा। और दरिंदगी का आलम यह तक रहा कि कम से दो हत्‍यारों ने उसकी टांग खींच कर झटके देकर कर वहां लगे इंडिया मार्क-टू का हत्‍था उसके जननांग में घुसेड़ दिया। जाहिर है कि इस असह्य पीडा को वह सहन नहीं कर पायी और उसकी मौत हो गयी।
लेकिन इसके बाद कई बड़े अफसरों ने असल काण्‍ड पर पर्दा डालने के लिए सुतापा सान्‍याल की आड़ ली। सुतापा को किसी दारोगा की तरह पेश किया और मीडिया को झुठ का पुलिन्‍दा थमा दिया। सुतापा पुलिस के आला अफसरों में एक हैं। उनके पास अपर मुख्‍य सचिव के अनुरूप हैसियत है।लेकिन वे केवल अपने सम्‍मान, वैभव और ऐश्‍वर्य तक ही सीमित रहीं। यह जानते हुए भी उन्‍हें एक
घिनौने मोहरे में तबदील किया जा रहा है, उन्‍होंने उफ तक नहीं किया और अपने आला अफसरों की जी-हुजूरी में ही जुटी रही। किसी बेहूदा रट्टू-ताेता की तरह। नतीजा यह हुआ कि एक साल के भीतर ही करीब आधा दर्जन युवतियों की लाशें राजधानी लखनऊ कें जहां-तहां बिखेर दी गयीं।
हे ईश्‍वर।
मैंने इस युवती को अपनी मेरी बिटिया क दर्जा दे दिया है। मेरे पास इसके लिए पुख्‍ता कारण-तर्क भी हैं। कम से कम उसने अपनी देह के बारे में स्‍वतंत्र सोचने और फैसले का प्रयोग किया। वह अडिग रही अपने फैसले पर,तनी रही अपनी रीढ़-मेरूदण्‍ड पर। खुद को झुकाया नहीं, भले ही प्राण निकल गये।
मैं आपसे पूछता हूं कि क्‍या आपके पास इतना जिगरा है? बहुत दूर जाने की भी कोई जरूरत नहीं, आप अपने आसपास ही टटोल लीजिए। केंचुए की तरह बिलबिलाते हुए इंसान हमेशा गिड़गिड़ाते ही दिख जाएंगे।
एक सामाजिक कार्यकर्ता विनीता सहगल का कहना है कि:- “उस युवती ने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग किया था। और इस अधिकार के लिए उसने जान तक दे दी। अब हमारे समाज में झांकिये ना, कि कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो अपनी “ना” के अधिकार को लेकर अपनी आवाज उठा सकती हैं, उसके लिए लड़ पड़ना या जान दे देना तो बहुत कोसों दूर की बात है। मेरी नजर में तो वह युवती तो स्‍त्री-सशक्‍तीकरण की श्रेष्‍ठतम जीवन्‍त घटना है।”
अब यहां कई सवाल हैं दोस्‍तों। वाकई, उस बिटिया ने अपने बाल-बच्‍चों जैसी घरेलू मजबूरी के चलते खुद के शरीर को एक दिन महज 400 रूपयों के लिए बेचना का सौदा किया, लेकिन केवल एक ग्राहक के लिए। जब उसने देखा कि वहां कई नर-पिशाच मौजूद हैं, तो उसने अपने ना के अधिकार का तत्‍काल प्रयोग कर लिया और उसी अधिकार के लिए प्राणोत्‍सर्ग कर दिया। उस पर नारकीय
जुल्‍म-सितम ढाते गये, लेकिन उसने अपने अधिकार के पालन में ऊफ तक नहीं किया।
अपने अधिकार के लिए जान तक लुटा देने वाली महिला, कम से कम मुझे तो अब तक नहीं मिली। मैं तो सैल्‍यूट करता हूं। मेरी नजर में तो वह बिलकुल भारत-रत्‍न से कम नहीं। इसीलिए तो मैं उसे अपनी मेरी बिटिया कहता हूं।
अब, असल सवाल पर आते हैं। महज पांच हजार रूपया पर महीना काटने वाले पुलिस महानिदेशक सुतापा सान्‍याल ने अपने एक भी अधिकार का इस्‍तेमाल नहीं किया। है कि नहीं? वह केवल अपने उच्‍चाधिकारी-उच्‍चाधिकारियों और आकाओं के हुक्‍म का ही पालन करती रहीं। आपसे कहा गया कि जाओ और इस मामले में साफ झूठ बोल दो मीडिया के सामने। और आपने ऐसा कर दिया बेहिचक। जबकि वे जानती थीं कि जो भी कराया जा रहा है, वह बिलकुल झूठ है और अपराध है। और ऐसे झूठ युगों की सत्‍यता को कलंकित कर देते हैं।
मगर उस मेरी बिटिया ने ऐसा नहीं किया था।उसने आखिरी दम तक संघर्ष किया। भले ही उसकी जान चली गयी। जबकि सुतापा सान्‍याल ने अवांछित, आपराधिक और षडयंत्री किलाबंदी में खुद को एक मोहरा ही बनना पसन्‍द किया, अपने “ना” अधिकार का कत्‍तई प्रयोग नहीं। इस पूरे दर्दनाक हादसे के बावजूद उन्‍होंने अपनी “ना” के अधिकार का प्रयोग नहीं किया। अगर कर लेतीं तो आज
वे स्‍त्री-सशक्‍तीकरण और महिला सम्‍मान की शिखर-पुरूष बन जाती होतीं।
और कहां वह दो-कौडी की मेरी बिटिया, जिसने औरत की खुद्दारी का एक नया आयाम-अध्‍याय लिखने के लिए अपना प्राण दे दिया। अब अपने बारे में आप खुदतय कर लीजिएगा, मगर इस मेरी बिटिया को मैं भारत-रत्‍न से श्रेष्‍ठ मानता हूं।
मेरी बिटिया जिन्‍दाबाद।
जाहिर है कि कोई भी नागरिक अब सुतापा सान्‍याल को अपना आदर्श नहीं मानेगी। इसीलिए मैं अब खोजना चाहता हूं ऐसे अफसरों को, जिन्‍होंने खुद को बिक जाने के बजाय अपने होने को साबित किया। भारी दुश्‍वारियों के बावजूद अपना पक्ष बिलकुल साफ रखा। इसमें से कुछ ने तो इसकी भारी कीमत भी चुकाई,लेकिन अडिग रहे। हमेशा। सिर तान कर।
हमारा यह अभियान आज से शुरू हो चुका है। नाम है:- “ना” कहने का अधिकार आन्‍दोलन। हम चाहते है कि इस अभियान कम से कम 20 जुलाई तक जरूर चले, जब एक आला शासकीय नौकर सुतापा सान्‍याल ने इस काण्‍ड को भयंकर विद्रूप शक्‍ल में तब्‍दील कर दिया था। इस अभियान में हम आपको रोजाना यह भी बतायेंगे कि किस तरह बड़े सरकारी नौकर अपने आकाओं की हां में खुद को खत्‍म कर देते हैं, और कैसे चंद लोग अपने ना कहने के अधिकार का प्रयोग कर खुद को
प्रकाश-स्‍तम्‍भ के तौर पर दमकते दिख जाते हैं।

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